सोमवार को शिवलिंग पर जल क्यों चढ़ाते हैं?

शिव को ठंडक पहुँचाने के लिए। समुद्र मंथन का हलाहल विष जब महादेव ने कंठ में रोक लिया, उनका शरीर तपने लगा — देवताओं ने जल चढ़ाकर उन्हें शीतल किया, वही जलाभिषेक बन गया। सोमवार इसलिए कि 'सोम' यानी चंद्रमा शिव के मस्तक पर विराजते हैं, यह दिन उन्हीं का माना गया। जल सादा अर्पण है — शिव आशुतोष हैं, थोड़े में मान जाते हैं।

सोमवार का जलाभिषेक एक ही भाव पर टिका है — तपन को शांत करना। कथा के अनुसार देवताओं और असुरों के समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसकी आग से तीनों लोक झुलसने लगे। शिव ने वह विष पी लिया और कंठ में ही रोक लिया — इसीलिए वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में मिलता है।

देवताओं ने जल क्यों चढ़ाया

विष की गर्मी से शिव का शरीर तपने लगा, तो देवताओं ने उन पर लगातार जल की धारा डाली — यह लोक-प्रचलित कथा है, भागवत का शब्द-प्रमाण नहीं। भक्त आज भी वही दोहरा रहा है: पतली, अटूट धारा, ताकि ठंडक बनी रहे। इसे "ऐसा न किया तो अशुभ होगा" वाला विधान समझना गलत है; यह भाव की परंपरा है।

सोमवार ही क्यों

'सोम' चंद्रमा का नाम है, और चंद्रमा शिव के मस्तक पर विराजते हैं — इसी से वे चंद्रशेखर कहलाते हैं। शिवपुराण की कथा है कि दक्ष के शाप से क्षीण होते चंद्रमा ने प्रभास क्षेत्र में शिव की आराधना की और राहत पाई; वही स्थान आज सोमनाथ है, बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला। परंपरा में 'सोम' का एक अर्थ 'स-उमा', यानी उमा सहित शिव, भी लिया जाता है। श्रावण के सोमवार और सोलह सोमवार व्रत इसी नाते शिव-भक्ति के केंद्र में हैं।

जल, दूध और क्षेत्र का फर्क

परंपरा में शिव को 'अभिषेकप्रिय' कहा गया है — उन्हें सजावट नहीं, धारा भाती है। उत्तर भारत में सादा जल या गंगाजल मुख्य है; श्रावण में कांवड़िए यही लेकर चलते हैं। कई घरों में जल के साथ थोड़ा कच्चा दूध मिला लिया जाता है। दक्षिण भारत के मंदिरों में पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर — और नारियल पानी से अभिषेक ज़्यादा दिखता है। रुद्राभिषेक में भी नियम यही है कि पंचामृत के बाद अंत शुद्ध जल से होता है। यानी दूध विकल्प है, अनिवार्यता नहीं।

जो अक्सर गलत समझा जाता है

  • दूध चढ़ाना ज़रूरी नहीं — केवल जल से किया अभिषेक अधूरा नहीं माना जाता।
  • लोटा एक झटके में उलटने के बजाय धीमी, लगातार धारा की परंपरा है।
  • परिक्रमा जलधारी (सोमसूत्र) तक जाकर लौटने की है, उसे लांघकर पूरी नहीं।
  • जलाभिषेक सिर्फ सोमवार का नियम नहीं — सोमवार को इसका महत्व विशेष माना जाता है, बस।

अभिषेक करते समय बहुत लोग महामृत्युंजय मंत्र जपते हैं — "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥" यह ऋग्वेद (7.59.12) का मंत्र है। सीधा अर्थ: तीन नेत्रों वाले, सुगंधित, पोषण देने वाले शिव को हम पूजते हैं; जैसे पकी ककड़ी अपनी बेल से सहज छूट जाती है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से छुटकारा मिले — अमरता से नहीं।

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