अनंत चतुर्दशी

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, भगवान विष्णु के अनंत रूप को समर्पित — शेष पर विश्राम करते अनंत। इस व्रत की पहचान है अनंत सूत्र — चौदह गाँठों वाला धागा, जो पूजा में अर्पित होकर बाँह पर बाँधा जाता है; चौदह गाँठें चौदह लोकों की प्रतीक हैं। परंपरा इसे चौदह वर्षों के संकल्प के रूप में लेती है, और इसकी कथा कौण्डिन्य की है — अभिमान में गँवाई और व्रत से फिर पाई गई समृद्धि की कथा। इसी दिन गणेश विसर्जन से गणेशोत्सव का समापन भी होता है, पर यह व्रत अपनी अलग और प्राचीन धारा है।

अगली तिथि: 2026-09-25

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प्रातः स्नान करें, स्वच्छ पीले वस्त्र पहनें, और विष्णु के समक्ष अनंत व्रत का संकल्प लें — यदि चौदह वर्षों का व्रत आरंभ कर रहे हैं तो संकल्प में उसका उल्लेख करें।,स्वच्छ चौकी पर कलश स्थापित करें और उस पर या पास में शेषशायी विष्णु का चित्र रखें; जहाँ परंपरा हो, वहाँ कुश से सात फनों वाले अनंत की आकृति बनाएँ।,अनंत सूत्र तैयार करें — कच्चा सूत या रेशमी धागा, हल्दी-कुमकुम से रँगा, चौदह गाँठों वाला — और उसे भगवान के समक्ष रखें।,चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, तुलसी दल, धूप और घी के दीपक से पूजा करें, और भोग अर्पित करें — खीर अथवा आटे-गुड़ का पकवान, साथ में ऋतुफल।,अनंत सूत्र का मंत्र पढ़कर धागा बाँधें — पुरुष दाहिनी भुजा पर, स्त्रियाँ बाईं पर।,कौण्डिन्य की कथा पढ़ें या सुनें और आरती करें।,पूजा के बाद व्रत का भोजन लें — परंपरा से एक समय, बिना नमक का; यदि पिछले वर्ष का सूत्र पहन रखा हो तो उसे अब उतारकर जल में प्रवाहित करें।

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ऋषि कौण्डिन्य अपनी नवविवाहिता पत्नी सुशीला के साथ यात्रा पर थे, जब सुशीला ने नदी किनारे स्त्रियों को अनंत — अनंत रूप विष्णु — की पूजा करते और बाँह पर चौदह गाँठों का धागा बाँधते देखा। उसने भी व्रत रखा, सूत्र बाँधा, और उसी दिन से दंपति का भाग्य चमकने लगा। जब कौण्डिन्य की दृष्टि धागे पर पड़ी और उन्होंने उसका प्रयोजन सुना, तो विवेक से पहले अभिमान बोल उठा: यह समृद्धि मेरी विद्या से अर्जित है, किसी धागे से नहीं — और उन्होंने सूत्र नोचकर आग में डाल दिया। जो कुछ था, गलता चला गया। जब समझ आया कि क्या जला बैठे हैं, तो कौण्डिन्य वन में निकल पड़े और रास्ते में मिले हर पेड़, पशु और नदी से पूछते रहे — अनंत कहाँ मिलेंगे? — यहाँ तक कि थककर गिर पड़े। तब विष्णु प्रकट हुए और दिखाया कि अनंत किसी एक स्थान पर नहीं मिलते, क्योंकि वे सबमें व्याप्त हैं; और कहा कि चौदह वर्ष यह व्रत करो। उन्होंने किया, और सब लौट आया। महाभारत में यही कथा कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी — राज्य खो चुके पांडवों को यही व्रत बताते हुए। यह व्रत उसे फिर खड़ा करने का है, जो हाथ से छूट गया हो।

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शेषशायी विष्णु का चित्र या प्रतिमा, अथवा अनंत की आकृति बनाने के लिए कुश,जल, आम के पत्तों और नारियल सहित कलश,अनंत सूत्र के लिए कच्चा सूत या रेशमी धागा, रँगने को हल्दी और कुमकुम,पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन और अक्षत,रुई की बाती वाला घी का दीपक और धूप,भोग के लिए खीर अथवा आटे-गुड़ का पकवान, और ऋतुफल,अभिषेक के लिए पंचामृत

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