छठ पूजा
सूर्य व्रतों में सबसे कठिन और सबसे प्रिय — कार्तिक शुक्ल षष्ठी पर छठी मैया और सूर्य देव के लिए रखा जाने वाला व्रत। यह चार दिन चलता है — नहाय-खाय, खरना, डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य और उगते सूर्य को उषा अर्घ्य — और इसके केंद्र में लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास है। यह अकेला बड़ा पर्व है जिसमें उगते से पहले डूबते सूर्य की पूजा होती है, और यह संतान के लिए रखा जाता है — उनके जन्म, स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए। इसमें पुरोहित की आवश्यकता नहीं; व्रती, परिवार और एक साफ घाट — बस यही पूरी व्यवस्था है।
अगली तिथि: 2026-11-15
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नहाय-खाय (चतुर्थी): नदी या तालाब में स्नान करें — संभव न हो तो घर पर जल में गंगाजल मिलाकर — घर की पूरी सफाई करें, और व्रती दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करे: शुद्ध घी में बना कद्दू-भात यानी लौकी, चने की दाल और अरवा चावल।,खरना (पंचमी): दिनभर उपवास रखें; संध्या को पूजा के बाद साफ चूल्हे पर बनी गुड़ की खीर (रसियाव) और रोटी ग्रहण करें। इसी एक भोजन के बाद लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत आरंभ हो जाता है।,प्रसाद घर पर ही पूर्ण शुद्धता से बनाएँ — गेहूँ के आटे, गुड़ और घी का ठेकुआ तथा चावल के लड्डू (कसार) — साफ चूल्हे पर, स्नान के बाद, और बिना कुछ चखे।,सूप और दउरा सजाएँ: ठेकुआ, कसार, केले का घौद, पानी वाला नारियल, गन्ना, सिंघाड़ा, मूली, डाभ नींबू, पान-सुपारी और जलता दीपक। दउरा प्रायः घर का पुरुष सिर पर उठाकर घाट तक ले जाता है।,संध्या अर्घ्य (षष्ठी): कमर तक जल में खड़े हों; सूर्यास्त के समय लोटे से जल और कच्चा दूध अर्पित करें — दोनों हाथों में सूप उठाए धीरे-धीरे घूमते हुए, परिवार के लोग अर्घ्य डालते जाएँ।,रात को घर लौटकर, यदि मनौती हो, कोसी भराई करें — गन्नों के मंडप के नीचे मिट्टी के दीप जलाकर।,उषा अर्घ्य (सप्तमी): भोर से पहले उसी घाट पर पहुँचें और उगते सूर्य को ठीक उसी विधि से अर्घ्य दें।,प्रातः अर्घ्य के बाद छठी मैया का प्रसाद और जल लेकर पारण करें, और घाट पर उपस्थित सबको ठेकुआ बाँटें।katha
राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी के पास राज्य था, संतान नहीं। महर्षि कश्यप के परामर्श से यज्ञ हुआ और पुत्र जन्मा — पर निष्प्राण। राजा शिशु को लेकर ऐसे शोक में डूबे कि अपने ही प्राण त्यागने को उद्यत हो गए, तभी उनके सम्मुख एक देवी प्रकट हुईं: षष्ठी, ब्रह्मा की मानस पुत्री, जो बालकों की रक्षा करती हैं और उपासकों को संतान देती हैं। उन्होंने शिशु को स्पर्श किया और वह हिलकर रो पड़ा। प्रियव्रत ने कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को उनका व्रत रखा, और उनके घर से यह हर घर तक फैला — यही देवी व्रत में छठी मैया कहलाती हैं। व्रत का सूर्य-पक्ष इससे भी पुराना है। सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य देते और तभी दान करते थे; कहा जाता है कि पांडवों के सब कुछ हार जाने पर द्रौपदी ने यही व्रत रखा, और सीता ने मुंगेर के पास गंगा तट पर अर्घ्य दिया। छठी मैया सूर्य की बहन मानी जाती हैं, इसीलिए दोनों की पूजा साथ होती है — और इसीलिए व्रत का पहला अर्घ्य डूबते सूर्य को जाता है, उसे सम्मान देते हुए जिससे सारा संसार मुख फेर लेता है।mantra
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बाँस का सूप (दो-तीन) और दउरा या टोकरी,ठेकुआ के लिए गेहूँ का आटा, गुड़ और शुद्ध घी; कसार के लिए चावल,केले का घौद, पानी वाला नारियल, गन्ना, सिंघाड़ा, मूली और डाभ नींबू,पान, सुपारी, हल्दी-अदरक के पौधे और सिंदूर,अर्घ्य के लिए पीतल या ताँबे का लोटा और थोड़ा कच्चा दूध,मिट्टी के दीपक, घी या सरसों का तेल, बत्ती, धूप और माचिस,व्रती के लिए स्वच्छ नए वस्त्र — साड़ी अथवा धोती,गंगाजल और कलशआगामी तिथियां
- 2026-11-15