कृष्ण जन्माष्टमी

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में मथुरा के कारागार में विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्म हुआ — यह पर्व उसी घड़ी का उत्सव है। व्रत दिनभर चलता है और मुख्य पूजा निशिता काल में होती है, जब लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक कर उन्हें नई पोशाक पहनाकर झूले में झुलाया जाता है और माखन-मिश्री का भोग लगता है। तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र भी देखा जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यह जागरण का पर्व है — घर और मंदिर मध्यरात्रि की आरती तक जागते हैं।

अगली तिथि: 2026-09-04

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प्रातः स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें, और श्रीकृष्ण के समक्ष दिनभर के व्रत का संकल्प लें; दिन में फल और दूध का फलाहार लिया जा सकता है।,दिन में झूले और पूजा की चौकी को फूलों और वस्त्रों से सजाएँ, और लड्डू गोपाल की नई पोशाक, मुकुट और छोटी बाँसुरी तैयार रखें।,दिन कृष्ण-स्मरण में बिताएँ — भजन, भागवत के जन्म-प्रसंग का पाठ, या जब भी अवकाश मिले ॐ क्लीं कृष्णाय नमः का जप।,मध्यरात्रि से कुछ पहले लड्डू गोपाल को पंचामृत से और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ, और पोंछकर पूरी तरह सुखाएँ।,नई पोशाक पहनाएँ, मुकुट और मोरपंख सजाएँ, चंदन का तिलक करें और उन्हें झूले में विराजित करें।,निशिता काल में भोग लगाएँ — माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी और तुलसी दल — और घी का दीपक तथा धूप जलाएँ।,ठीक मध्यरात्रि में जन्म की आरती करें, 'नंद के घर आनंद भयो' गाते हुए झूला धीरे-धीरे झुलाएँ, और प्रसाद बाँटें।,मध्यरात्रि की पूजा के बाद फलाहार या प्रसाद से व्रत खोलें, अथवा अपनी कुल-परंपरा के अनुसार अगली सुबह पारण करें।

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मथुरा में कंस अपनी बहन देवकी को विदा कर रहा था, तभी आकाशवाणी हुई — देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसका काल होगा। उसी घड़ी उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनकी पहली छह संतानों को जन्म लेते ही मार डाला। सातवाँ गर्भ रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हुआ — वही बलराम हुए। फिर भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात, रोहिणी नक्षत्र में, आठवें पुत्र का जन्म हुआ। कारागार प्रकाश से भर गया, बेड़ियाँ खुल गईं, पहरेदार गहरी नींद में डूब गए और द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव नवजात को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल की ओर चले; शेषनाग ने बालक के ऊपर फनों का छत्र ताना, और यमुना उनके चरण छूकर पीछे हट गई। गोकुल में उन्होंने शिशु को यशोदा के पास अभी-अभी जन्मी कन्या से बदल लिया और लौट आए। कंस ने उस कन्या को पटकना चाहा तो वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में योगमाया रूप में प्रकट हुई और बोली — तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है, और सुरक्षित है। व्रत उसी रात की प्रतीक्षा को दोहराता है — इसीलिए उपवास मध्यरात्रि के जन्म तक चलता है।

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लड्डू गोपाल की प्रतिमा और झूला,अभिषेक के लिए पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद और शक्कर,नई पोशाक, मुकुट, मोरपंख और छोटी बाँसुरी,भोग के लिए माखन-मिश्री और धनिया पंजीरी,तुलसी दल — कृष्ण का भोग इनके बिना अधूरा माना जाता है,पुष्प, चंदन, अक्षत और रोली,घी का दीपक, धूप और आरती के लिए कपूर,खीरा — जिन परिवारों में मध्यरात्रि में उसे काटकर जन्म कराने की परंपरा है

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