विजयादशमी (दशहरा)
आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी, नवरात्रि के ठीक अगले दिन — विजय का ही पर्व। इसी तिथि पर दुर्गा ने महिषासुर का वध किया और राम ने रावण पर विजय पाई। दिन के अपने विधान हैं — अपराह्न में अपराजिता पूजा, शमी पूजा, अपने औज़ारों-उपकरणों की शस्त्र पूजा और सीमोल्लंघन। साढ़े तीन मुहूर्तों में गिना जाने वाला यह दिन अबूझ मुहूर्त है — शुभ आरंभ के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं मानी जाती। संध्या का रावण-दहन प्रिय क्षेत्रीय परंपरा है, स्वयं पूजा नहीं।
अगली तिथि: 2026-10-21
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स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें; नवरात्रि का व्रत रखा हो तो अपनी कुल-परंपरा के अनुसार पारण पहले पूर्ण करें।,अपराह्न में घर या आँगन के ईशान कोण में स्थान शुद्ध करें, चावल के घोल या चंदन से अष्टदल कमल बनाएँ, और उस पर देवी अपराजिता का आवाहन करें — दाएँ जया, बाएँ विजया।,अपराजिता को पुष्प, अक्षत, हल्दी-कुमकुम, धूप और घी का दीपक अर्पित करें, अपराजिता मंत्र पढ़ें, और सामने खड़े कार्य में विजय की प्रार्थना स्पष्ट शब्दों में करें।,शमी वृक्ष के पास जाएँ — या घर में शमी की टहनी रखें — जड़ के पास दीपक जलाएँ, अक्षत-पुष्प चढ़ाएँ, और कुछ पत्ते घर लाकर बड़ों-मित्रों से 'सोना' कहकर उनका आदान-प्रदान करें।,अपनी आजीविका के उपकरण — औज़ार, वाहन, मशीन, पुस्तकें, जहाँ परंपरा हो वहाँ शस्त्र — पहले से स्वच्छ करें, हल्दी-कुमकुम का तिलक करें, पुष्प-धूप अर्पित करें और उस दिन उन्हें विश्राम दें।,सूर्यास्त से पहले अपनी बस्ती की सीमा ईशान दिशा में लाँघें — यही सीमोल्लंघन है, विजय के लिए प्रस्थान का प्रतीक; मार्ग में नीलकंठ का दिखना शुभ माना जाता है।,अपराह्न के विजय मुहूर्त में वह कार्य आरंभ करें जो टलता आ रहा हो — बच्चे का विद्यारंभ, नया व्यवसाय, पहली यात्रा।,संध्या को घर में दुर्गा और राम की आरती करें, और जहाँ रावण-दहन की परंपरा हो वहाँ उसमें सम्मिलित हों।katha
इस एक दिन पर तीन कथाएँ मिलती हैं। पहली दुर्गा की। वरदान से देवताओं और मनुष्यों के लिए अवध्य हुए महिषासुर ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था; उन्हीं के एकत्र तेज से देवी प्रकट हुईं। नौ रात्रि युद्ध चला, और दसवें दिन उन्होंने महिष रूपधारी असुर का वध किया — विजय की दशमी। दूसरी राम की। लंका के अंतिम युद्ध से पहले राम ने असमय देवी को जगाकर — अकाल बोधन — शक्ति की आराधना की; दशमी को रावण गिरा। उत्तर भारत में हर वर्ष जलते पुतले उसी एक बाण की स्मृति हैं। तीसरी कथा शमी वृक्ष की है। अज्ञातवास में जाते पांडवों ने अपने शस्त्र बाँधकर शमी पर टाँग दिए; वर्ष पूरा होने पर विजयादशमी के दिन उन्हें उतारा, उनकी पूजा की, और उसी दिन अर्जुन ने विराट में अकेले कौरव सेना को बिखेर दिया। यहीं से शमी पूजा और शस्त्र पूजा आई — और वह पुरानी रीति भी, जिसमें राजा इसी दिन सीमोल्लंघन कर अभियान पर निकलते थे, क्योंकि इस एक दिन विजय निश्चित मानी गई है।mantra
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तिलक और पूजा के लिए हल्दी, कुमकुम, चंदन और अक्षत,अपराजिता पूजा के अष्टदल कमल हेतु चावल का घोल या चंदन,ताजे पुष्प और गेंदे की माला,शमी के पत्ते, या वृक्ष पास न हो तो छोटी टहनी (जहाँ परंपरा हो वहाँ आपटा के पत्ते),आरती के लिए घी का दीपक, धूप और कपूर,भोग और बाँटने के लिए गुड़, जलेबी या खीर,अपने काम के औज़ार-उपकरण, पहले से साफ किए हुए,संकल्प के लिए जल का लोटा, सुपारी और कुछ सिक्केआगामी तिथियां
- 2026-10-21