गणेश चतुर्थी 2026: 14 सितंबर की गणपति स्थापना की तैयारी — सामग्री सूची, मूर्ति और घर की व्यवस्था

गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर 2026 को है। मुहूर्त से पहले की तैयारी: डेढ़/3/5/7/10 दिन का निर्णय, सही आकार-दिशा की मिट्टी की मूर्ति, मंडप, पूरी सामग्री सूची, क्या अभी खरीदें और क्या उसी सुबह।

गणेश चतुर्थी इस वर्ष सोमवार, 14 सितंबर 2026 को है — भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी। स्थापना का मुहूर्त, पूजा-विधि और चंद्र-दर्शन की बात हमारे गणेश चतुर्थी 14 सितंबर के लेख में पहले से है। यह लेख उससे एक कदम पीछे का है — वह सब जो स्थापना से पहले के दिनों में तय और तैयार करना होता है: बप्पा कितने दिन रहेंगे, मूर्ति कैसी और किस दिशा में, मंडप, सामग्री की पूरी सूची, और क्या अभी खरीदें, क्या आख़िरी सुबह।

सबसे पहले तय करें: डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन?

यही निर्णय बाकी तैयारी तय करता है — सामग्री की मात्रा, छुट्टी, विसर्जन का दिन। स्थापना के संकल्प में दिन बोले जाते हैं, इसलिए यह बात 14 तारीख से पहले घर में तय हो जाए। शास्त्र कोई एक अवधि अनिवार्य नहीं करता; डेढ़ दिन से अनंत चतुर्दशी तक सभी विकल्प परंपरा में हैं। जो अवधि बिना खिंचाव के निभे — सुबह-शाम आरती, रोज़ ताज़ा नैवेद्य, घर में कोई उपस्थित — वही सही है।

अवधिविसर्जन (2026)टिप्पणी
डेढ़ दिनमंगलवार, 15 सितंबर (दोपहर बाद)छोटे या कामकाजी परिवार; उसी दिन ऋषि पंचमी भी
3 दिनबुधवार, 16 सितंबरदो पूरे दिन आरती-नैवेद्य
5 दिनशुक्रवार, 18 सितंबरमहाराष्ट्र में प्रायः गौरी-विसर्जन के साथ — गौरी की तिथियाँ अपने पंचांग में देखें
7 दिनरविवार, 20 सितंबरपूरा सप्ताह; विसर्जन छुट्टी के दिन
10 दिन (अनंत चतुर्दशी तक)शुक्रवार, 25 सितंबरपूर्ण उत्सव; इस वर्ष 14 से 25 तक 12 कैलेंडर-दिन

“दस दिन” नाम है, गिनती नहीं — पूर्ण अवधि सदा अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होती है। इस बार बीच की तिथियाँ लंबी खिंची हैं, इसलिए पूरा प्रवास 12 दिन का है; छुट्टी और विसर्जन का वाहन उसी हिसाब से रखें। 25 सितंबर की विधि अनंत चतुर्दशी के लेख में है।

मूर्ति: मिट्टी, आकार और सूँड़

मिट्टी की लें। शाडू या साधारण चिकनी मिट्टी की मूर्ति पानी में घुल जाती है; प्लास्टर ऑफ पेरिस नहीं घुलता और कई नगरों में उसके विसर्जन पर रोक है। प्राकृतिक रंग या बिना रंग की मूर्ति सबसे अच्छी — विसर्जन के बाद वही मिट्टी गमले में जा सकती है। पुराणों में पार्थिव (मिट्टी के) गणेश का ही उल्लेख है; यह नियम पर्यावरण की बहस से पुराना है।

आकार उतना, जितना घर के दो लोग उठा सकें। घर के लिए एक से डेढ़ फुट पर्याप्त; छोटी मिट्टी की मूर्ति घर में ही टब में विसर्जित हो सकती है — यह खरीदते समय ही सोच लें, क्योंकि वही आकार तय करता है।

सूँड़ को लेकर परंपरा है कि घर के लिए बाईं ओर मुड़ी सूँड़ (वाममुखी) ली जाती है और दाईं ओर मुड़ी मूर्ति के लिए कठोर नियम-पालन माना जाता है। इसका स्पष्ट कारण ग्रंथों में नहीं मिलता — यह लोक-परंपरा है; जो घर में चली आ रही हो, वही रखें। मूर्ति बैठी, मूषक सहित, बिना दरार की हो — खंडित मूर्ति स्थापित नहीं की जाती।

मंडप: जगह, दिशा और सुरक्षा

ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूर्व की दीवार का साफ़ कोना चुनें। चौकी ऐसे रखें कि पूजक पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठे; मूर्ति का मुख प्रायः पश्चिम या पूर्व की ओर, दक्षिण की ओर नहीं। वास्तु ये दिशाएँ बिना कारण बताए देता है और क्षेत्रीय भेद है — जो घर में चलता आया है, वही मानें। शौचालय की दीवार से सटी जगह टालें।

चौकी इतनी ऊँची कि बैठकर आरती सहज हो; उस पर लाल या पीला वस्त्र, आसन के नीचे थोड़े अक्षत। सजावट में ताज़े फूल, आम की बंदनवार, केले के खंभे, दीपमाला — थर्मोकोल और प्लास्टिक टालें, विसर्जन के दिन वही कचरा बनता है। बिजली की लड़ियाँ कपड़े से दूर; दीपक की जगह पक्की और आग से सुरक्षित — जितने दिन की अवधि, उतने दिन यहाँ लौ जलेगी।

सामग्री की पूरी सूची

एक बार कागज़ पर उतारें; आधी चीज़ें रसोई में पहले से होती हैं।

आसन और कलश

  • चौकी/मंडप, लाल या पीला वस्त्र, अक्षत
  • कलश, जल, आम के पत्ते, नारियल, मौली; गंगाजल

पूजन

  • रोली (स्वस्तिक के लिए भी), कुमकुम, हल्दी, सिंदूर, चंदन, इत्र
  • जनेऊ, कलावा, गणपति के लिए नया वस्त्र
  • दूर्वा (कम से कम 21 दल), लाल फूल — जासवंद विशेष, माला
  • पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • धूप, अगरबत्ती, कपूर, घी का दीपक, बत्ती, माचिस
  • आरती की थाली, घंटी, शंख (घर में हो तो)
  • पान, सुपारी, लौंग, इलायची, दक्षिणा

नैवेद्य

  • मोदक — परंपरा में 21; घर के उकडीचे मोदक हों तो उत्तम
  • लड्डू, केला और मौसमी फल, नारियल
  • प्रवास के हर दिन सादे सात्त्विक नैवेद्य की योजना

क्या अभी खरीदें, क्या आख़िरी दिन

खरीद तीन हिस्सों में बाँट लें, तो आख़िरी सुबह शांत रहती है।

अभी — स्थापना से एक से तीन सप्ताह पहले

  • मूर्ति का ऑर्डर या चयन — अच्छी मिट्टी की मूर्तियाँ पहले बिक जाती हैं
  • चौकी/मंडप, वस्त्र, सजावट, दीपक, बिजली की लड़ियाँ
  • सूखी सामग्री: अक्षत, रोली, हल्दी, सुपारी, लौंग-इलायची, कलावा, जनेऊ, कपूर, अगरबत्ती, धूप, घी, बत्ती
  • आरती-संग्रह, अथर्वशीर्ष या गणेश चालीसा; घर में विसर्जन हो तो बड़ा टब

एक दिन पहले — रविवार, 13 सितंबर

  • फूल, माला, दूर्वा — गीले कपड़े में लपेटें तो अगली दोपहर तक ताज़ी रहती है
  • आम-केले के पत्ते, नारियल, फल, पान; मंडप सजा लें, मूर्ति आ चुकी हो तो ढककर रखें

उसी सुबह — सोमवार, 14 सितंबर

  • मोदक-मिठाई ताज़े; पंचामृत के लिए दूध-दही
  • मूर्ति उसी सुबह लानी हो तो: दिल्ली में इस सोमवार राहुकाल 07:39 से 09:11 तक है। मूर्ति लाना शास्त्र में राहुकाल-वर्जित नहीं, पर यात्रा-आरंभ के लिए बहुत लोग इसे टालते हैं — जिनकी यह रीति हो, वे 07:39 से पहले या 09:11 के बाद निकलें। स्थापना स्वयं मध्याह्न में है, इससे दूर।
  • इस वर्ष उसी दिन हरतालिका तीज भी है। घर की महिलाएँ निर्जला व्रत में हों तो नैवेद्य का भार पहले बाँट लें — मोदक 13 को बन जाएँ या घर का दूसरा सदस्य सँभाले।

स्थापना मध्याह्न में है, सूर्योदय पर नहीं

गणेश चतुर्थी मध्याह्न-व्यापिनी है — स्थापना और प्राणप्रतिष्ठा दिन के मध्य भाग में होती है। दिल्ली में 14 सितंबर को यह खिड़की लगभग 11:02 से 13:30 तक है; चतुर्थी उस सुबह सात के कुछ बाद लगती है और 15 की सुबह लगभग 07:45 तक रहती है, इसलिए 14 का पूरा मध्याह्न चतुर्थी में है। तर्क मुख्य लेख में है; तैयारी के लिए अर्थ एक ही — 11 बजे तक स्नान, मंडप, सामग्री, नैवेद्य तैयार, और पहले आई मूर्ति मुहूर्त तक ढकी रहे। सूर्योदय, और इसलिए मध्याह्न, हर शहर में थोड़ा अलग पड़ता है — अपने शहर का समय पंचांग में देखें।

बप्पा के रहते: क्या करें, क्या न करें

  • प्राणप्रतिष्ठा के बाद मूर्ति हिलाई नहीं जाती; जगह पहले पक्की कर लें।
  • सुबह-शाम आरती, रोज़ ताज़ा नैवेद्य; नैवेद्य रखा न रह जाए, प्रसाद बाँट दें।
  • परंपरा है कि मूर्ति अकेली नहीं छोड़ी जाती — घर में कोई रहे, दीपक जलता रहे। अखंड दीप हो तो घी-तेल और अग्नि-सुरक्षा की योजना पहले।
  • सात्त्विक भोजन — प्याज़-लहसुन, मांस, मद्य अधिकतर घरों में बाहर रहते हैं; यह आचार का नियम है, स्वास्थ्य का दावा नहीं।
  • स्थापना की शाम चंद्रमा न देखें — दिल्ली में 14 की शाम चंद्रास्त 20:08 पर है, उसके बाद टालने को कुछ नहीं। 15 को चतुर्थी समाप्त होने के बाद चंद्रोदय है, इसलिए दूसरे दिन यह प्रश्न नहीं।
  • उतरे फूल-पत्ते नाली या नदी में नहीं, गमले या निर्माल्य-कलश में।
  • विसर्जन से पहले उत्तरपूजा — विधि अनंत चतुर्दशी वाले लेख में है।

सार

सोमवार, 14 सितंबर 2026; स्थापना मध्याह्न में, दिल्ली में लगभग 11:02–13:30। पहले अवधि तय करें — पूर्ण अवधि 25 सितंबर तक, इस वर्ष 12 कैलेंडर-दिन। मिट्टी की, बैठी, उठाने लायक मूर्ति; पूजक का मुख पूर्व/उत्तर। सूखी सामग्री और मूर्ति अभी; फूल-दूर्वा 13 को; मोदक 14 की सुबह। राहुकाल 07:39–09:11; चंद्रास्त 20:08।

समय दिल्ली/IST के हैं; सूर्योदय शहर-शहर बदलता है, सीमावर्ती स्थितियाँ अपने पंचांग में जाँचें। क्षेत्र-परंपरा के अनुसार विधि में अंतर संभव है।

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