गणेशोत्सव 2026 विसर्जन तिथियाँ: डेढ़, 3, 5, 7 और 10 दिन — अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर
गणेशोत्सव 2026 का विसर्जन कैलेंडर: स्थापना 14 सितंबर, डेढ़ दिन 15, तीन दिन 16, पाँच दिन 18, सात दिन 20 और अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर। हर दिन की तिथि-स्थिति और राहुकाल, उत्तर-पूजा का क्रम, घर या घाट पर विसर्जन की विधि, निर्माल्य और पर्यावरण नियम।
गणेशोत्सव 2026 की स्थापना सोमवार, 14 सितंबर को है — भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी उस दिन 07:08 से लगकर मध्याह्न को घेरती है। पर विदा का दिन शास्त्र नहीं, घर की परंपरा तय करती है: डेढ़ दिन, तीन, पाँच, सात या पूरे दस दिन बाद अनंत चतुर्दशी पर। यह लेख सिर्फ़ उन पाँच तारीखों, हर दिन की तिथि-स्थिति, उत्तर-पूजा और विसर्जन की विधि पर है; स्थापना-मुहूर्त और अनंत व्रत अलग लेखों में हैं।
गणेश विसर्जन 2026: पाँचों तारीखें एक नज़र में
समय दिल्ली (IST) के हैं। तिथि पूरे भारत में एक ही घड़ी पर बदलती है; सूर्योदय और राहुकाल शहर के हिसाब से कुछ मिनट आगे-पीछे रहते हैं।
| विसर्जन | तारीख | वार | सूर्योदय पर तिथि | तिथि समाप्त | सूर्योदय – सूर्यास्त | राहुकाल (दिल्ली) |
|---|---|---|---|---|---|---|
| डेढ़ दिन | 15 सितंबर | मंगलवार | शुक्ल चतुर्थी | 07:45, फिर पंचमी | 06:07 – 18:25 | 15:20 – 16:53 |
| 3 दिन | 16 सितंबर | बुधवार | शुक्ल पंचमी | 09:00, फिर षष्ठी | 06:07 – 18:24 | 12:15 – 13:48 |
| 5 दिन | 18 सितंबर | शुक्रवार | शुक्ल सप्तमी | 13:01, फिर अष्टमी | 06:08 – 18:21 | 10:43 – 12:15 |
| 7 दिन | 20 सितंबर | रविवार | शुक्ल नवमी | 17:51, फिर दशमी | 06:09 – 18:19 | 16:48 – 18:19 |
| 10 दिन (अनंत चतुर्दशी) | 25 सितंबर | शुक्रवार | शुक्ल चतुर्दशी | 23:06 — पूरे दिन | 06:11 – 18:13 | 10:42 – 12:12 |
सूर्योदय हर शहर में अलग होता है; सीमा-रेखा वाले मामलों में अपने शहर का पंचांग और राहुकाल देखकर ही तय करें।
गिनती कैसे होती है — और इस बार “दस दिन” बारह क्यों हैं
गिनती स्थापना के दिन से: 14 सितंबर पहला दिन। इसी से तीसरा दिन 16, पाँचवाँ 18 और सातवाँ 20 सितंबर। “डेढ़ दिन” यानी स्थापना के अगले दिन, दोपहर की पूजा के बाद विदा। छपे पंचांग यही दिन-गणना देते हैं; जो घर तिथि से गिनते हैं, वे अपनी परंपरा मानें।
“दस दिन” नाम चतुर्थी से चतुर्दशी की दूरी से आया है, पर 2026 में स्थापना 14 और अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर — कैलेंडर पर बारह तारीखें। वजह: 14 सितंबर को सूर्योदय पर तृतीया थी, चतुर्थी 07:08 पर लगी; स्थापना मध्याह्न-व्यापिनी चतुर्थी से तय हुई, जबकि चतुर्दशी 25 को सूर्योदय पर ही मौजूद है। 14 क्यों, 15 क्यों नहीं — पूरा तर्क स्थापना-मुहूर्त वाले लेख में है।
एक बात साफ़: डेढ़, तीन, पाँच, सात — ये विषम संख्याएँ किसी शास्त्र-वचन से नहीं आतीं; ये कुल-परंपरा और सुविधा की रीतियाँ हैं। दस दिन वाला सार्वजनिक स्वरूप भी 1893 के बाद का है। “कौन-सा दिन ज़्यादा शुभ” — इसका शास्त्रीय उत्तर नहीं है; जो दिन आपके घर में चला आया है, वही सही है।
डेढ़ दिन (15 सितंबर) और तीन दिन (16 सितंबर)
15 सितंबर, मंगलवार: सूर्योदय 06:07 पर चतुर्थी ही है, 07:45 तक; फिर पंचमी — इसी दिन ऋषि पंचमी भी। चतुर्थी के उत्तरार्ध का करण विष्टि (भद्रा) है, जो तिथि के साथ 07:45 पर ही समाप्त हो जाता है; दिन की पूजा और विसर्जन इससे बाहर हैं। राहुकाल 15:20 – 16:53 छोड़ दें; सूर्यास्त 18:25 है, इसलिए उसके बाद भी उजाला बचा रहता है।
16 सितंबर, बुधवार: पंचमी 09:00 तक, फिर षष्ठी। राहुकाल 12:15 – 13:48, ठीक दोपहर में — उससे पहले या बाद में विदा करें।
पाँच दिन (18 सितंबर) — और गौरी-विसर्जन का पेच
18 सितंबर, शुक्रवार: सप्तमी 13:01 तक, फिर अष्टमी। राहुकाल 10:43 – 12:15 — सुबह 10:43 से पहले या दोपहर 12:15 के बाद।
महाराष्ट्र और आसपास के घरों में यहाँ एक पेच है। ज्येष्ठा गौरी का आवाहन अनुराधा नक्षत्र में, पूजन ज्येष्ठा में और विसर्जन मूल में होता है। 2026 में सूर्योदय पर अनुराधा 17 सितंबर (गुरुवार), ज्येष्ठा 18 (शुक्रवार) और मूल 19 सितंबर (शनिवार) को है। जिन घरों में गणपति गौरी के साथ विदा होते हैं, वहाँ विसर्जन 18 नहीं, 19 सितंबर को होगा। नक्षत्र का सटीक आरंभ-समाप्ति अपने पंचांग में देख लें।
सात दिन (20 सितंबर) और अनंत चतुर्दशी (25 सितंबर)
20 सितंबर, रविवार: नवमी 17:51 तक, फिर दशमी। राहुकाल 16:48 – 18:19 — और सूर्यास्त 18:19 पर ही। यानी शाम का राहुकाल सीधे सूर्यास्त से जुड़ा है; दिन में विदा करनी हो तो 16:48 से पहले, वरना रात का विसर्जन।
25 सितंबर, शुक्रवार: चतुर्दशी सूर्योदय से रात 23:06 तक — पूरा दिन उपलब्ध। राहुकाल 10:42 – 12:12। नक्षत्र शतभिषा, चंद्रमा कुंभ राशि में। इसी दिन चौदह गाँठ का अनंत-सूत्र और अनंत व्रत भी है; उसकी विधि अनंत चतुर्दशी वाले लेख में है।
क्या विसर्जन के लिए मुहूर्त चाहिए? शास्त्र में विसर्जन का वैसा बाध्यकारी मुहूर्त नहीं जैसा स्थापना का। लोक-व्यवहार इतना है: दिन के उजाले में, राहुकाल छोड़कर; चौघड़िया देखने वाले शुभ, लाभ, अमृत या चर चुनते हैं।
उत्तर-पूजा: विदा से पहले की विधि
विसर्जन के दिन की अंतिम पूजा उत्तर-पूजा कहलाती है। क्रम:
- स्नान कर रोज़ की तरह षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा; नैवेद्य में मोदक या जो घर में बनता हो।
- आरती, फिर हाथ में अक्षत लेकर क्षमा-प्रार्थना — पूजा में जो कमी रह गई हो, उसके लिए।
- विसर्जन-प्रार्थना: यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥ — “मेरी पूजा स्वीकार कर सब देवगण जाएँ, और फिर आएँ।”
- अक्षत मूर्ति पर छोड़ें और मूर्ति को स्थान से थोड़ा सरकाएँ। यह “चलन” प्रस्थान का संकेत है; शास्त्र इसका कारण नहीं देता, यह परंपरा है।
- कई घरों में दही-पोहा या लड्डू की छोटी पोटली “शिदोरी” (रास्ते का भोजन) साथ रखी जाती है — क्षेत्रीय रीति, विधान नहीं।
विसर्जन की विधि — घाट पर या घर पर
घाट या कृत्रिम तालाब पर: मूर्ति सावधानी से ले जाएँ; वहाँ एक बार फिर आरती, तीन परिक्रमा, फिर धीरे से जल में प्रवाह। थाली, दीया और वस्त्र वापस घर लाएँ। “पुढच्या वर्षी लवकर या” — अगले बरस जल्दी आना — यही इस दिन की भावना है: विदा नहीं, अगली बार का न्योता।
घर पर: मूर्ति शाडू या प्राकृतिक मिट्टी की हो तो साफ़ टब या बाल्टी में विसर्जन करें। मिट्टी कुछ घंटों में घुल जाती है; यह पानी-मिट्टी गमलों या बगीचे में डालें, नाली में नहीं। जगह न हो तो साथ रखी सुपारी या छोटी प्रतीक-मूर्ति का विसर्जन भी परंपरा में मान्य है।
निर्माल्य का क्या करें
चढ़े फूल, दूर्वा, बेलपत्र, हार, धूप की राख — यह सब निर्माल्य है; इसे नदी-तालाब में न डालें।
- घाट पर रखे निर्माल्य-कलश में दें — नगर निगम अब इसकी खाद बनाते हैं।
- घर में गमले या बगीचे की मिट्टी में दबा दें, या कंपोस्ट में डालें।
- हार का प्लास्टिक-धागा, थर्मोकोल और चमकीली पन्नी निर्माल्य नहीं — उन्हें सूखे कचरे में अलग करें।
- वस्त्र, मुकुट, आभूषण अगले वर्ष के लिए रखें या दान करें; पानी में न बहाएँ।
पर्यावरण के नियम
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2020 के संशोधित दिशा-निर्देश प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्तियों और रासायनिक रंगों को विसर्जन से बाहर रखते हैं; राज्य और नगर निगम इन्हें अपने ढंग से लागू करते हैं।
- मूर्ति मिट्टी, शाडू या कागज़-लुगदी की; रंग प्राकृतिक।
- नदी-समुद्र की जगह नगर निगम का कृत्रिम तालाब; बड़े शहर सूची और समय पहले जारी करते हैं।
- जुलूस और ढोल-ताशे की समय-सीमा स्थानीय प्रशासन तय करता है — पहले देख लें।
सार
स्थापना 14 सितंबर (सोमवार)। विसर्जन: डेढ़ दिन 15, तीन दिन 16, पाँच दिन 18 (गौरी के साथ 19), सात दिन 20, और दस दिन — अनंत चतुर्दशी — 25 सितंबर, जब चतुर्दशी रात 23:06 तक पूरे दिन है। सबसे ध्यान देने लायक 20 सितंबर, जहाँ राहुकाल सूर्यास्त तक चलता है। मूर्ति मिट्टी की, विसर्जन टब या कृत्रिम तालाब में, निर्माल्य खाद में — यही इस वर्ष की सही विदा है।
अस्वीकरण: तिथियाँ और समय दिल्ली के पंचांग पर आधारित हैं; क्षेत्र-परंपरा और कुल-आचार के अनुसार विसर्जन के दिन और विधि में अंतर हो सकता है।