धनतेरस 2026: तिथि, पूजा विधि और क्या ख़रीदें

धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है, तिथि कृष्ण त्रयोदशी। इस दिन की शुरुआत धन्वंतरि और स्वास्थ्य से हुई थी, सोने से नहीं। पूरी पूजा विधि, द्वार पर यम का दीपक, परंपरा में क्या ख़रीदा जाता है और क्या नहीं, और आठ शहरों का सूर्यास्त — ताकि अपना प्रदोष समय निकाल सकें।

धनतेरस इस बार शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है। तिथि है कृष्ण त्रयोदशी, जिससे पुराना नाम धनत्रयोदशी आया — उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, और गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र तथा तमिलनाडु की अमांत गणना में यही तिथि आश्विन कृष्ण त्रयोदशी। यह शुक्रवार सुबह क़रीब 10:30 बजे लगकर शनिवार सुबह क़रीब 10:50 तक रहती है, इसलिए शुक्रवार की पूरी संध्या पूरे भारत में इसी तिथि में है।

यहीं से उत्तर भारत के गिने पाँच दिन शुरू होते हैं, जो इस बार एक-एक तारीख़ पर नहीं बैठते। शनिवार 7 नवंबर की संध्या चतुर्दशी की है, पर नरक चतुर्दशी का भोर वाला स्नान और दिवाली दोनों रविवार 8 नवंबर को — अमावस्या उसी दिन दोपहर से पहले लगकर संध्या तक रहती है। गोवर्धन पूजा मंगलवार 10 नवंबर को, भाई दूज बुधवार 11 नवंबर को; महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ हिस्सों में यह क्रम एक दिन पहले गोवत्स द्वादशी से शुरू होता है।

वैद्य से धातु तक

धनतेरस की शुरुआत ख़रीदारी से नहीं, धन्वंतरि से होती है — समुद्र मंथन से अमृत-कलश लिए प्रकट हुए देवताओं के वैद्य। आयुर्वेद उन्हीं से जुड़ा है, और उनके प्रकट होने का दिन यही त्रयोदशी है। दिन का स्वभाव स्वास्थ्य है, सोना नहीं।

दो बातों ने इसे धातु की ओर मोड़ा। पहली, वही कलश — उनके सम्मान का अर्थ हुआ घर में नया पात्र लाना; पात्र यानी धातु। दूसरी, नाम — धन्वंतरि का धन्व संपत्ति वाला धन नहीं है, पर इतने मिलते-जुलते हैं कि इसी नज़दीकी को अक्सर दिन के संपत्ति की ओर मुड़ने का कारण बताया जाता है। यह अनुमान है, दर्ज इतिहास नहीं। लक्ष्मी और कुबेर उस संध्या में वैद्य के साथ ज़रूर जुड़े, और जुड़ाव पुराना है।

इसके बाद जो जुड़ा, वह पुराना नहीं। यह विचार कि धनतेरस पर ख़र्च अनिवार्य है, कि दुकान का प्रचारित समय मुहूर्त है, कि बड़ी ख़रीद बेहतर साल ख़रीद लेती है — यह सब त्योहार पर चढ़ाई हुई विज्ञापन की परत है। परंपरा आशीर्वाद को बिल से नहीं तौलती। मन लगाकर ख़रीदा एक स्टील का चम्मच पूरी परंपरा का पालन है; उधार लेकर धातु ख़रीदना दिन को उल्टा कर देता है।

क्या ख़रीदा जाता है, क्या नहीं

प्रथा हर क्षेत्र और हर घर में अलग है; नीचे जो है वह ज़्यादातर उत्तर भारत का है।

  • बर्तन — पीतल, ताँबा, या आज के चलन में स्टील। सबसे आम रूप, और कहा जाता है सबसे पुराना भी।
  • चाँदी, प्रायः एक छोटा सिक्का या छोटी वस्तु।
  • सोना, जहाँ सामर्थ्य हो — अक्सर आभूषण की जगह प्रतीक भर वज़न में।
  • नई झाड़ू, जिसे उत्तर भारत के बड़े हिस्से में घर आती लक्ष्मी का रूप माना जाता है — सप्ताह की सबसे सस्ती ख़रीद, और सबसे गंभीर भाव वाली।
  • धनिया के बीज, जो उत्तर भारत और बिहार के कुछ हिस्सों में पूजा के बाद वृद्धि के प्रतीक रूप में बोए जाते हैं।

आम तौर पर लोहा नहीं ख़रीदा जाता, कई घरों में काँच और काली चीज़ें भी नहीं; चाकू-कैंची उपहार में नहीं दी जातीं। नियम में लोहे का अर्थ कच्चा लोहा है, स्टील नहीं — जिसे परंपरा जानती ही नहीं थी और जो आज बर्तन की सामान्य धातु है। इस दिन लाया बर्तन देहरी पर ही जल, चावल या अनाज से भरा जाता है।

यम दीपदान: द्वार पर रखा दीपक

शाम का बाक़ी हिस्सा ख़रीदारी से जुड़ा ही नहीं है, हालाँकि इसकी कथा वही है जो अक्सर ख़रीदारी के समर्थन में सुनाई जाती है। एक युवा राजकुमार की मृत्यु विवाह की चौथी रात सर्पदंश से लिखी थी। पत्नी ने किसी को सोने नहीं दिया — घर के सारे आभूषण द्वार पर ढेर किए, चारों ओर दीपक जलाए और गीतों से सबको जगाए रखा। यम सर्प रूप में आए तो धातु की रोशनी ने आँखें चौंधिया दीं, और वे भोर में ख़ाली लौटे। कथा में कुछ ख़रीदा नहीं जाता — आभूषण घर में पहले से थे, और बचाने वाले दीपक तथा जागरण हैं।

इसी से यम दीपदान चला: मिट्टी का दीपक, परंपरा में तिल के तेल का, सूर्यास्त के बाद मुख्य द्वार पर या दक्षिण की ओर, घर की रक्षा के भाव से। यह भीतर नहीं जलाया जाता, और लाँघा नहीं जाता। कुछ परिवार इसे त्रयोदशी की संध्या को करते हैं, कुछ चतुर्दशी की — इस बार शुक्रवार और शनिवार।

पूजा कैसे की जाती है

  1. घर साफ़ करें, विशेषकर देहरी; प्रथा हो तो रंगोली बनाएँ।
  2. सूर्यास्त के बाद साफ़ कपड़ा बिछाकर चौकी लगाएँ, धन्वंतरि, लक्ष्मी तथा कुबेर स्थापित करें। दिन में लाई वस्तु धोकर, भरकर सामने रखें।
  3. दीपक और धूप जलाएँ। जल, अक्षत, रोली, पुष्प और मिठाई का नैवेद्य अर्पित करें।
  4. घर में जो मंत्र कहे जाते हैं वही कहें; न हों तो दीपक के साथ बैठ जाएँ। ध्यान ही अर्पण है।
  5. यम का दीपक भीतर की पूजा के बाद द्वार पर ही जलाया जाता है, भीतर जलाकर बाहर नहीं ले जाया जाता।

सूर्यास्त, प्रदोष और आपका शहर

पूजा प्रदोष काल में होती है — सूर्यास्त से शाम के पहले हिस्से तक। त्रयोदशी शुक्रवार की पूरी संध्या में है, इसलिए बस अपने शहर का सूर्यास्त चाहिए। 6 नवंबर को सूर्यास्त, भारतीय समय:

  • दिल्ली — 17:33
  • मुंबई — 18:03
  • कोलकाता — 16:56
  • चेन्नई — 17:41
  • बेंगलुरु — 17:52
  • हैदराबाद — 17:43
  • अहमदाबाद — 17:59
  • गुवाहाटी — 16:38

अहमदाबाद और गुवाहाटी के बीच क़रीब अस्सी मिनट का अंतर है — इसीलिए कोई ईमानदार वेबसाइट पूरे देश के लिए एक ही समय नहीं छापती। लक्ष्मी वाले भाग के लिए जहाँ स्थिर लग्न देखा जाता है, वहाँ प्रायः वृषभ; लग्न का उदय देशांतर के साथ अक्षांश से भी तय होता है, इसलिए एक ही देशांतर के दो शहरों में भी वह एक समय नहीं होता। बाक़ी शहरों का सूर्यास्त दैनिक पंचांग में देखिए।

सबसे आम भूलें

  • प्रचारित ख़रीद-मुहूर्त को शास्त्र मान लेना; ख़रीदना पूजा नहीं है।
  • व्यस्तता के कारण दोपहर में पूजा कर लेना; यह प्रदोष काल का विधान है।
  • यम का दीपक घर के भीतर जलाना; उसका स्थान द्वार है।
  • ऐसे दिन उधार का ख़र्च, जिस दिन का पहला देवता एक वैद्य था।

ख़रीद बड़ी हो — ज़मीन, गाड़ी, या प्रतीक भर से ज़्यादा सोना — और उसका समय अपनी कुंडली पर चुनवाना हो, तो परामर्श ले सकते हैं

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