दिवाली 2026: तारीख, लक्ष्मी पूजा विधि और मुहूर्त

दिवाली रविवार, 8 नवंबर 2026 को है — कार्तिक कृष्ण अमावस्या। लक्ष्मी पूजा असल में कैसे की जाती है, चौकी पर क्या और किस क्रम में रखा जाता है, गणेश जी पहले क्यों, और प्रदोष का समय आपके अपने शहर के लिए तय कैसे होता है।

दिवाली 2026 रविवार, 8 नवंबर को है — कार्तिक कृष्ण अमावस्या, और गुजरात-महाराष्ट्र की अमांत गणना में यही रात आश्विन अमावस्या। तारीख का सवाल बस इतना है। बाकी जो है, वह सर्च के नतीजे में नहीं मिलता: पूजा असल में की कैसे जाती है, उसका शाम का समय आपके शहर के लिए तय कैसे होता है, और आमतौर पर ग़लत क्या होता है।

लक्ष्मी पूजा का समय तय कैसे होता है

पूरे देश के लिए एक ही घड़ी का समय सही नहीं होता। यह तीन बातों के मिलने से बनता है, और उनमें से दो आपके शहर के सूर्यास्त पर टिकी हैं।

  • अमावस्या चल रही हो, यह ज़रूरी है। तिथि रात बारह बजे नहीं बदलती; वह एक ही क्षण पर शुरू और एक ही क्षण पर ख़त्म होती है, और वह क्षण पूरे देश में एक ही होता है। शहर के साथ बदलता है सूर्यास्त — और उसी के साथ यह भी कि आपके प्रदोष तक अमावस्या रहेगी या नहीं। पूजा अमावस्या की है, इसलिए जिस समय आप बैठें उस समय अमावस्या चल रही हो — सिर्फ़ कैलेंडर में छपा होना काफ़ी नहीं।
  • प्रदोष काल — सूर्यास्त से लगभग दो घंटे चलने वाला संध्या का समय। लक्ष्मी को उसी समय बुलाया जाता है जब उजाला जा रहा होता है; इसीलिए दीये और पूजा एक ही घड़ी के हैं।
  • स्थिर लग्न — शाम को वृषभ, रात में आगे चलकर सिंह। मान्यता है कि स्थिर लग्न में जो बुलाया जाए वह ठहरता है, निकल नहीं जाता। घरेलू पूजा आमतौर पर वहाँ रखी जाती है जहाँ वृषभ लग्न और प्रदोष काल एक-दूसरे पर पड़ें; सिंह लग्न ज़्यादातर उनका है जो आधी रात में उपासना करते हैं।

सूर्यास्त, प्रदोष और लग्न आपके अपने शहर के हैं, और देश के दो छोरों के बीच इनमें लगभग दो घंटे का अंतर पड़ जाता है — इसलिए किसी बड़े अख़बार से उठाया हुआ मुहूर्त आपके शहर के लिए एक घंटे से भी ज़्यादा ग़लत बैठ सकता है। अपने शहर की तिथि, सूर्यास्त और लग्न दैनिक पंचांग में देखें।

चौकी पर क्या रखें

लकड़ी की नीची चौकी, धोकर सुखाई हुई; उस पर नया लाल या बिना सिला वस्त्र, नीचे थोड़े चावल। चौकी ऐसे रखें कि बैठने वालों का मुँह पूर्व या उत्तर की ओर हो।

  • गणेश और लक्ष्मी एक ही वस्त्र पर अगल-बगल। कौन किस ओर बैठें, इसमें घरों की अपनी परंपरा है; जो नहीं किया जाता वह है गणेश जी को लक्ष्मी जी के पीछे या उनसे ऊपर रखना।
  • स्वच्छ जल का कलश — भीतर सिक्का, सुपारी और थोड़े चावल, मुख पर आम के पत्ते, ऊपर नारियल।
  • आमतौर पर घी का दीपक लक्ष्मी जी के दाहिने और तेल का बाएँ रखा जाता है; साथ में द्वार, तुलसी तथा पानी रखने की जगह के लिए और दीये।
  • रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, कलावा, फूल — ख़ासकर कमल और गेंदा — गणेश जी के लिए दूर्वा, और फल।
  • नैवेद्य: घर की बनी खीर या मिठाई, बताशे, खील, पान-सुपारी; सिक्के या चाँदी, आभूषण, और बही-खाते यदि उनका भी पूजन करना हो।

पूजा का क्रम

  1. स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें, पहला दीपक जलाएँ, और फूल या दूर्वा से अपने ऊपर तथा चौकी पर जल छिड़कें।
  2. संकल्प लें — स्थान, तिथि, और किसके लिए तथा किस भाव से पूजा हो रही है, स्पष्ट कहें।
  3. पहले गणेश जी — दूर्वा, अक्षत और मोदक या लड्डू के साथ।
  4. फिर कलश, फिर लक्ष्मी जी: जल से, या जहाँ घर की रीति हो वहाँ पंचामृत से स्नान कराएँ; पोंछकर वस्त्र पहनाएँ, फिर कुमकुम, अक्षत, पुष्प, वस्त्र, आभूषण और माला अर्पित करें।
  5. धूप, फिर दीप, फिर नैवेद्य — या घर की अपनी पद्धति के अनुसार।
  6. जिन घरों में सरस्वती और कुबेर का भी पूजन होता है, वहाँ यह लक्ष्मी जी के बाद होता है — सरस्वती का कलम, पुस्तकों और अपने काम के औज़ारों के रूप में; कुबेर का तिजोरी या गल्ले पर, जिसे खोलकर, स्वस्तिक बनाकर वहीं पूजा जाता है।
  7. लक्ष्मी जी और गणेश जी की आरती, फिर जो छूट गया या अधूरा रह गया उसके लिए क्षमा-प्रार्थना।
  8. दीपक लेकर पूरे घर में एक-एक कमरे में जाएँ — रसोई और देहरी सहित। बहुत से घरों में एक दीपक रातभर जलता है।

गणेश पहले, लक्ष्मी बाद में — क्यों

गणेश जी लगभग हर संस्कार में पहले पूजे जाते हैं, विघ्नहर्ता के रूप में, जिन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान मिला। पर इस रात इसका एक अलग अर्थ भी है। लक्ष्मी समृद्धि हैं; गणेश बुद्धि हैं — जो आए उसे सँभालने की क्षमता। विवेक के बिना घर में आया धन इस परंपरा में आशीर्वाद माना ही नहीं जाता। पहले मन को ठिकाने पर लाया जाता है, तभी लक्ष्मी से बैठने के लिए कहा जाता है।

कुबेर और बही-खाते

कुबेर देने वाले नहीं, रखने वाले माने जाते हैं — बहुत से घरों में उनकी पूजा वहीं होती है जहाँ धन रखा जाता है, चौकी पर नहीं। गुजरात में और मारवाड़ी व्यापारी परिवारों में इसी शाम बही-खातों का पूजन होता है, जिसे चोपड़ा पूजन कहते हैं: पुराने खाते कृतज्ञता के साथ बंद, नए पर स्वस्तिक, कुमकुम और शुभ लाभ। पर साल का पहला लिखा इस रात नहीं होता — वह बेस्तु वरस यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होता है, जो 2026 में मंगलवार, 10 नवंबर है, और कई परिवारों में लाभ पंचमी को। महाराष्ट्र में व्यापारियों के लिए यही शाम लक्ष्मी पूजन है, इसी भाव से। बंगाल और असम में इसी अमावस्या की रात काली पूजा होती है — प्रदोष में नहीं, आधी रात में। जहाँ रीति अलग हो, वहाँ अपने घर की परंपरा मानें।

आमतौर पर क्या ग़लत होता है

  • शाम व्यस्त लग रही थी, इसलिए पूजा सुबह कर लेना। सुबह सफ़ाई, रंगोली और रसोई की है; पूजा प्रदोष की है।
  • किसी और शहर के लिए छपा मुहूर्त इस्तेमाल करना। देश के दो छोरों के सूर्यास्त में लगभग दो घंटे का अंतर है, और प्रदोष उसी के साथ खिसकता है।
  • पूजा-स्थल का अस्वच्छ या भरा हुआ होना। दिवाली से पहले की सफ़ाई सजावट नहीं है — पूजा वहीं से शुरू हो जाती है।
  • दीये केवल बाहर, गली को दिखाने के लिए जलाना और घर भीतर से अँधेरा छोड़ देना।
  • आरती के दौरान और उसके तुरंत बाद पटाखे — इस शोर में पूजा का सारा ध्यान बिखर जाता है, गली के जानवरों को कष्ट होता है, और दीये के पास इसका कोई स्थान नहीं।

यह रात

इस अमावस्या के पीछे दो कथाएँ हैं: लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्रकट होना, और अयोध्या का दीपों की पंक्तियाँ सजाना, उस रात जब राम चौदह वर्ष बाद लौटे। दोनों एक ही बात कहती हैं — महीने की सबसे अँधेरी रात पर जान-बूझकर रखा गया प्रकाश, और यह तिथि ठीक वही रात है। दीपक उस अँधेरे पर सजावट नहीं; वह उसका उत्तर है।

8 नवंबर 2026 को अपने शहर की तिथि, सूर्यास्त, प्रदोष और लग्न के लिए उस दिन का पंचांग देखें। जो मुहूर्त आपकी अपनी कुंडली से मेल खाता हो — नई दुकान, खाते का पहला लिखा — उसके लिए परामर्श बुक करें

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