गीता में कर्म के बारे में क्या लिखा है?

गीता कहती है — काम करो, फल की चिंता छोड़ो। श्रीकृष्ण का सूत्र है 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' (2.47) — कर्म पर तुम्हारा हक़ है, फल पर नहीं। वजह साफ़ है — नतीजा कई चीज़ों पर टिका होता है, उसकी चिंता मन को आज ही थका देती है। पर गीता काम छोड़ने की भी मनाही करती है — 'मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि', निष्क्रियता में आसक्ति ठीक नहीं।

गीता का कर्म-उपदेश युद्ध के मैदान पर शुरू होता है, किसी शांत आश्रम में नहीं — यह याद रखिए तो बाक़ी सब खुल जाता है। महाभारत के भीष्म पर्व में अर्जुन काम छोड़कर हट जाना चाहता है। श्रीकृष्ण उसे हटने नहीं देते; वे उसके काम करने का तरीक़ा बदल देते हैं। इसी को कर्मयोग कहा गया, और तीसरे अध्याय का नाम ही कर्मयोग है।

2.47 — सबसे ज़्यादा पढ़ा, सबसे ज़्यादा ग़लत समझा गया श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ: कर्म करने पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर कभी नहीं; न ख़ुद को फल का कारण मानो, और न कर्म न करने में आसक्ति रखो। असली बात दूसरी पंक्ति में है, जिसे ज़्यादातर लोग छोड़ देते हैं। "फल की चिंता मत करो" का मतलब हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना नहीं — गीता उसी साँस में निष्क्रियता से भी मना करती है।

कर्म, विकर्म और अकर्म

चौथे अध्याय में कृष्ण कहते हैं — कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17) यानी कर्म को भी समझना है, विकर्म को भी और अकर्म को भी, क्योंकि कर्म की गति बहुत गहरी है। आम समझ में कर्म वह है जो आपका नियत कर्तव्य है, विकर्म वह जो निषिद्ध या ग़लत है, और अकर्म कर्म का न होना। शंकराचार्य अपने भाष्य में अकर्म का अर्थ कर्म का अभाव करते हैं, और अगले ही श्लोक (4.18) में कृष्ण "कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने" की बात कहते हैं — यानी काम करते हुए भी कर्तापन का बोझ न उठाना।

काम छोड़ना विकल्प नहीं है

तीसरे अध्याय में साफ़ लिखा है — नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥ (3.8) — अपना नियत कर्म करो, कर्म न करने से कर्म करना बेहतर है; कर्म के बिना तो शरीर का काम भी नहीं चलेगा। और तरीक़ा 2.48 में है — योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ — सफलता और असफलता, दोनों में एक-सा बने रहना; इसी समता का नाम योग है।

जो अक्सर ग़लत समझा जाता है

  • फल की आसक्ति छोड़ना और लक्ष्य छोड़ना, दो अलग बातें हैं। तीर निशाने पर ही चलता है; पकड़ नतीजे पर नहीं, कर्म पर रहती है।
  • कर्मयोग सिर्फ़ संन्यासियों का रास्ता नहीं। गीता का पूरा संवाद एक गृहस्थ योद्धा के साथ है, जिसे अपना काम करना ही है।
  • कर्म का विचार गीता की ईजाद नहीं — यह उससे पुराना है और उपनिषदों में भी मिलता है। गीता की देन उसका इलाज है: निष्काम भाव।

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