दुर्गा सप्तशती पाठ विधि 2026: नवरात्रि में 13 अध्याय कैसे पढ़ें, 11 से 20 अक्टूबर

सात सौ श्लोक, तेरह अध्याय, तीन चरित्र। 11 से 19 अक्टूबर 2026 तक नौ सुबहों में क्या-क्या पढ़ना है, कवच-अर्गला-कीलक पहले क्यों आते हैं, न्यास कितना करें, और संस्कृत न आती हो तो गृहस्थ के लिए क्या विकल्प हैं।

घर में "नवरात्रि में पाठ हो रहा है" कहा जाए तो प्रायः दुर्गा सप्तशती का ही अर्थ होता है — जिसे चण्डी पाठ भी कहते हैं और मूल ग्रंथ में देवी माहात्म्य। सात सौ श्लोक, तेरह अध्याय। 2026 में शारदीय नवरात्रि की यह अवधि रविवार 11 अक्टूबर से मंगलवार 20 अक्टूबर तक है।

सप्तशती है क्या

यह स्वतंत्र ग्रंथ नहीं है। यह मार्कण्डेय पुराण के 81 से 93 तक के अध्याय हैं, जिन्हें अलग निकालकर पूरी पूजा-पद्धति की तरह बरता जाता है। कथा सीधी है — राज्य से हटाया गया राजा और अपनों से ठगा गया वैश्य मेधा ऋषि के पास पहुँचते हैं, और ऋषि देवी के तीन आख्यान सुनाते हैं — यह समझाने कि मोह उन्हें भी नहीं छोड़ता जिन्हें उजाड़ चुका है। इन तेरह अध्यायों के आसपास जो कुछ है — कवच, अर्गला, कीलक, न्यास, रहस्य — वह बाद की पद्धतियों का जोड़ा ढाँचा है। व्यवहार में छोड़ा नहीं जाता, पर पुराण के मूल पाठ से बाहर है, और विवाद वहीं से शुरू होते हैं।

नवरात्रि 2026: दस सुबहें, पाठ के लिए नौ

आरम्भ आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, रविवार 11 अक्टूबर, चित्रा नक्षत्र में। नीचे के समय दिल्ली के हैं।

दिनदिनांकसूर्योदय के समय तिथिसूर्योदय
1रविवार 11 अक्टूबरशुक्ल प्रतिपदा06:20
2सोमवार 12 अक्टूबरद्वितीया06:21
3मंगलवार 13 अक्टूबरतृतीया06:21
4बुधवार 14 अक्टूबरचतुर्थी06:22
5गुरुवार 15 अक्टूबरपंचमी06:22
6शुक्रवार 16 अक्टूबरषष्ठी06:23
7शनिवार 17 अक्टूबरसप्तमी06:24
7 (पुनः)रविवार 18 अक्टूबरसप्तमी फिर06:24
8सोमवार 19 अक्टूबरअष्टमी; 10:52 से नवमी06:25
दशमीमंगलवार 20 अक्टूबरनवमी; 12:50 से दशमी06:25

सप्तमी 17 अक्टूबर की 05:55 से 18 अक्टूबर की 08:28 तक रहती है, इसलिए दिल्ली में वह लगातार दो सूर्योदय छू लेती है। यही तिथि वृद्धि है, और इसी कारण अंत में तिथियाँ सिमट जाती हैं — दुर्गाष्टमी और महानवमी दोनों सोमवार 19 अक्टूबर को, विजयादशमी मंगलवार 20 अक्टूबर को। देखें दुर्गाष्टमी और महानवमी तथा नवरात्रि 2026 का पूरा कैलेंडर

पाठ के लिए यह सुविधा है, अड़चन नहीं: 11 से 19 अक्टूबर तक ठीक नौ सुबहें मिलती हैं, और विजयादशमी हवन तथा कन्या पूजन को खाली रह जाती है। सूर्योदय हर शहर में अलग होता है — 1 सितम्बर 2026 को कोलकाता में 05:19 और मुंबई में 06:24, यानी पैंसठ मिनट का अंतर — इसलिए अपना समय दैनिक पंचांग में देखें।

तीन चरित्र और उनकी देवी

तेरह अध्याय तीन चरित्रों में बँटे हैं। हर चरित्र का अपना विनियोग है — अपना ऋषि, छन्द और देवी। इसीलिए एक चरित्र से दूसरे में जाते समय न्यास दोहराया जाता है।

चरित्रअध्यायदेवीऋषिछन्दआख्यान
प्रथम1महाकालीब्रह्मागायत्रीमधु-कैटभ वध
मध्यम2–4महालक्ष्मीविष्णुउष्णिक्महिषासुर वध
उत्तम5–13महासरस्वतीरुद्रअनुष्टुप्शुम्भ-निशुम्भ वध

लोग कामना के अनुसार चरित्र चुन लेते हैं — रक्षा को महाकाली, धन को महालक्ष्मी, विद्या को महासरस्वती। अकेला चरित्र पढ़ने की अनुमति पद्धतियाँ देती हैं; पर कोई नहीं कहती कि वह पूरे की जगह ले लेता है।

तेरह अध्याय और 700 का हिसाब

अध्यायविषयश्लोक
1मधु-कैटभ वध104
2महिषासुर की सेना का वध69
3महिषासुर वध44
4शक्रादि स्तुति42
5देवी और दूत का संवाद129
6धूम्रलोचन वध24
7चण्ड-मुण्ड वध27
8रक्तबीज वध62
9निशुम्भ वध40
10शुम्भ वध32
11नारायणी स्तुति55
12फलश्रुति41
13सुरथ और वैश्य को वरदान31
कुल700

यह सात सौ पारम्परिक गणना है — इसमें उवाच वाली पंक्तियाँ और कुछ अर्धश्लोक अलग इकाई गिने जाते हैं। केवल पूरे श्लोक गिनें तो संख्या कम बैठती है। छपी प्रतियों में यह रेखा अलग-अलग जगह खिंचती है, इसलिए दो पुस्तकें सात सौ कहकर भी श्लोक-दर-श्लोक एक जैसी नहीं मिलतीं।

कवच, अर्गला, कीलक पहले क्यों

पहले अध्याय से पहले तीन स्तोत्र निश्चित क्रम में पढ़े जाते हैं — देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक। परम्परा कारण एक ही चित्र में देती है, उससे आगे कुछ नहीं। कहा जाता है कि शिव ने सप्तशती को कीलित कर दिया था, ताला लगा दिया था, ताकि वह जिस-किसी के उठाने भर से फल न दे। कीलक ताला खोलता है, अर्गला सिटकिनी हटाती है, और कवच पाठक को उस द्वार में जाने से पहले पहनाया जाता है। शास्त्र इससे अधिक नहीं कहता; क्रम ऐसा क्यों है, इसका कोई और तर्क वहाँ नहीं मिलता — यह मान लेना गढ़े कारण से बेहतर है। कई पद्धतियाँ पहले रात्रि सूक्त और बाद में देवी सूक्त भी जोड़ती हैं।

न्यास कितना करें

न्यास मंत्र के अंगों को शरीर पर रखना है — ऋषि सिर पर, छन्द मुख पर, देवता हृदय पर, फिर करन्यास और षडंगन्यास। हर चरित्र का अपना ऋषि, छन्द और देवता होने से पूरे पाठ में तीन बार लगता है, एक बार नहीं। घरेलू पाठ में अधिकांश पुरोहित आरम्भ में संक्षिप्त अंगन्यास कराते हैं और हर चरित्र पर विनियोग दोहरा देते हैं; विस्तृत क्रम अनुष्ठान के लिए।

नौ दिन में पाठ कैसे बाँटें

छपी प्रतियों में जो विभाजन वास्तव में मिलता है वह सात दिन का है। नौ दिन वाला उसी के दो खण्ड तोड़कर बनता है, और अलग-अलग पद्धतियाँ अलग खण्ड तोड़ती हैं। एक व्यवहार्य नौ-दिवसीय क्रम, श्लोक-भार सहित:

दिनदिनांकअध्यायश्लोक
111 अक्टूबर1104
212 अक्टूबर2–3113
313 अक्टूबर442
414 अक्टूबर5–6153
515 अक्टूबर7–889
616 अक्टूबर9–1072
717 अक्टूबर1155
818 अक्टूबर1241
919 अक्टूबर1331

कवच-अर्गला-कीलक और अंत की क्षमा प्रार्थना हर दिन पढ़े जाते हैं, केवल पहले और आख़िरी दिन नहीं। और यदि घर में रोज़ पूरे तेरह अध्याय पढ़ने की परम्परा है तो वही पुरानी रीति है — नौ दिन का विभाजन उनके लिए है जो एक बैठक में सात सौ श्लोक नहीं निभा सकते।

संस्कृत नहीं आती तो

  • नवार्ण मंत्र। नौ अक्षर — ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे, अधिकांश पद्धतियों में आगे लगाकर। पाठ सम्भव न हो तो प्रतिदिन 108 की एक माला, या जितना गुरु कहें।
  • श्रवण। बारहवें अध्याय की फलश्रुति पढ़ने वाले के साथ सुनने वाले की भी बात करती है। पुरोहित पढ़ें और घर के लोग सुनते हुए पूजा करें — यह व्यवस्था ग्रंथ स्वयं देता है।
  • हिन्दी पाठ। अच्छा हिन्दी अनुवाद अर्थ पहुँचा देता है, और अधिकांश घरों में यही होता है। कड़ा मत यह है कि मंत्र का प्रभाव संस्कृत ध्वनि में है। दोनों ओर गम्भीर लोग हैं; कोई प्रमाण इसे तय नहीं करता।
  • सिद्ध कुंजिका स्तोत्र। स्तोत्र स्वयं कहता है कि उसे कवच, अर्गला, कीलक, न्यास या रहस्य की आवश्यकता नहीं, और वह पाठ का फल देता है।

अधिकार का प्रश्न, बिना घुमाव के

सप्तशती पौराणिक है, श्रुति नहीं। इसी आधार पर अधिकांश सम्प्रदायों का मत है कि इसे सब पढ़ सकते हैं — स्त्री, पुरुष, हर वर्ण — और सदियों से घरेलू व्यवहार यही मानकर चला है। असली मतभेद इंटरनेट की बहस से छोटा है, और वह तेरह अध्यायों पर नहीं, ढाँचे पर है: नवार्ण बीज मंत्र होने से दीक्षा माँगता है या नहीं; सबके लिए है या नहीं; बिना दीक्षा पूरा न्यास हो या नहीं। कोई पक्ष ऐसा प्रमाण नहीं देता जो बात समाप्त कर दे, और पद्धतियाँ नियम बता देती हैं, तर्क नहीं। घर में कोई न बता सके कि परम्परा क्या कहती है, तो तेरह अध्याय पढ़िए, न्यास संक्षिप्त रखिए, नवार्ण गुरु से लीजिए।

छोटे नियम जो छूट जाते हैं

  • स्वर मध्यम रखें — इतना कि अपने कान सुन लें, उससे ऊँचा नहीं।
  • अध्याय बीच में न छोड़ें, पूरा करके रुकें। उवाच वाली पंक्तियाँ भी पढ़ी जाती हैं।
  • पुस्तक चौकी पर रखें, भूमि पर नहीं; नौ दिन एक ही आसन और समय रखें।
  • तीनों रहस्य — प्राधानिक, वैकृतिक, मूर्ति — अंतिम दिन तेरहवें अध्याय के बाद आते हैं।
  • राहुकाल नए कार्य के आरम्भ का नियम है, संकल्प लेकर चल रहे नित्य पाठ का नहीं। फिर भी बचना हो तो 11 अक्टूबर को दिल्ली में राहुकाल 16:28 से 17:55 है — यह हर दिन और हर शहर में बदलता है, अपना आज का राहुकाल देखें।

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