नरक चतुर्दशी 2026: छोटी दीवाली 7 या 8 नवम्बर? दीये, अभ्यंग स्नान और दो दिन का जवाब
छोटी दीवाली 7 नवम्बर को है या 8 को? 2026 का जवाब: दोनों — दीये शनिवार 7 नवम्बर की शाम (चतुर्दशी प्रदोष में), अभ्यंग स्नान रविवार 8 नवम्बर की भोर 05:41–06:38, और उसी 8 नवम्बर की शाम लक्ष्मी पूजा 17:54–19:50। तिथि का पूरा गणित, भोर के तेल-स्नान की विधि, नरकासुर और सत्यभामा की कथा, चौदह दीयों का अर्थ और दक्षिण की दीपावली — सब एक जगह।
हर साल एक ही सवाल, और इस साल कुछ ज़्यादा ज़ोर से: छोटी दीवाली 7 नवम्बर को है या 8 को? 2026 का जवाब है — दोनों, पर अलग-अलग रस्म के लिए। दीये शनिवार, 7 नवम्बर की शाम जलेंगे, अभ्यंग स्नान रविवार, 8 नवम्बर की भोर 05:41 से 06:38 तक होगा — और उसी रविवार की शाम लक्ष्मी पूजा भी है (मुहूर्त 17:54–19:50)। यानी 8 नवम्बर एक ही दिन में स्नान भी, दीवाली भी।
उत्तर भारत में ज़्यादातर जगह इसे छोटी दीवाली कहते हैं, बड़ी रात से पहले कुछ दीयों वाली शाम। दक्षिण के बड़े हिस्से में यह छोटी दीवाली नहीं, यही दीपावली है। दोनों जगह असली काम अँधेरे में, जागने से भी पहले हो जाता है, और बाद का सब उसी स्नान से निकलता है। पर इस बार शाम और भोर दो अलग तारीख़ों पर पड़ रहे हैं, इसलिए पहले वही गुत्थी सुलझा लें।
छोटी दीवाली 7 या 8 नवम्बर? दो दिन का सीधा जवाब
गड़बड़ी की जड़ तिथि है। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी 7 नवम्बर की सुबह 10:48 पर लगती है और 8 नवम्बर की सुबह 11:28 पर उतर जाती है — किसी एक अंग्रेज़ी तारीख़ पर पूरी नहीं बैठती। और नरक चतुर्दशी की रस्में दिन के अलग-अलग पहर माँगती हैं, इसलिए वे दो दिनों में बँट जाती हैं:
- दीये और दीपदान शाम के हैं, प्रदोष काल में — और 7 नवम्बर की शाम चतुर्दशी चल रही होती है। इसलिए छोटी दीवाली के दीये शनिवार, 7 नवम्बर की शाम जलेंगे। उसी दिन मासिक शिवरात्रि भी है।
- अभ्यंग स्नान भोर का है, अरुणोदय में — और उस पहर चतुर्दशी 8 नवम्बर को मिलती है। स्नान रविवार, 8 नवम्बर की सुबह 05:41 से 06:38 तक; चंद्रोदय ठीक 05:41 पर।
- और उसी 8 नवम्बर की शाम दीवाली है। सुबह 11:28 पर अमावस्या लग जाती है (जो 9 नवम्बर दोपहर 12:32 तक रहती है), इसलिए लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त उसी रविवार शाम 17:54 से 19:50 का है (प्रदोष 17:31–20:09, वृषभ काल 17:54–19:50)। दीवाली 9 को नहीं, 8 को ही है — 9 की शाम तक अमावस्या बची ही नहीं रहती।
तो अगर कोई पूछे कि छोटी दीवाली कब है — दीयों के लिए 7, स्नान के लिए 8। कैलेंडर दो तारीख़ें दिखाए तो दोनों सही हैं; बस देखिए कि वह किस रस्म की बात कर रहा है।
अभ्यंग स्नान, सूर्योदय से पहले का स्नान
अभ्यंग यानी तेल लगाना, स्नान यानी नहाना। यह तेल-स्नान अँधेरे में होता है, और जहाँ ठीक से होता है वहाँ इसका क्रम है।
- पहले तेल। हल्का गरम तिल का तेल सिर की चोटी पर, फिर कंधे, बाँहें, पीठ, पैर, आख़िर में तलवे; महाराष्ट्र और गुजरात में बुज़ुर्ग यह बच्चों के सिर पर लगाते हैं, बड़े हाथ से छोटे सिर तक। कुछ देर लगा रहने दें।
- फिर उबटन। बेसन, हल्दी और थोड़ा चंदन, जिससे तेल छूटता है; महाराष्ट्र में यह उटणे है, बहुत घरों में आज भी घर पर पिसता है।
- फिर स्नान, गरम पानी से, सूरज निकलने से पहले; कुछ घर आख़िरी लोटे में गंगाजल मिलाते हैं।
- फिर साफ़ या नए कपड़े, और तब रसोई और दीये।
महाराष्ट्र में स्नान से पहले करीट नाम का कड़वा फल पाँव तले फोड़ते हैं, असुर का वध छोटे रूप में। तमिल घरों में उस सुबह का अभिवादन ही है गंगा स्नानम् आच्चा, यानी गंगा स्नान हो गया क्या; वहाँ मानते हैं कि उस सुबह पानी में गंगा हैं, तेल में लक्ष्मी।
समय कैसे तय होता है
यह स्नान कहीं-कहीं अभ्यंग स्नान मुहूर्त के नाम से घड़ी के समय सहित मिलता है। उसे तीन बातें तय करती हैं। पहली, स्नान चतुर्दशी तिथि के भीतर पड़े; 2026 में यह तिथि 8 नवम्बर की सुबह 11:28 पर ख़त्म होती है, एक ही क्षण, पूरे देश में वही। दूसरी, रात के अंतिम प्रहर में, सूर्योदय से पहले। तीसरी, परंपरा में इसे चंद्रोदय के बाद माना गया है, क्योंकि कृष्ण पक्ष में चंद्रमा देर रात उगता है।
तीसरी शर्त ही सबसे कसकर बाँधती है, और इसी से समय उतना लंबा नहीं रहता जितना लोग मानते हैं। अवधि चंद्रोदय से सूर्योदय तक की है। 8 नवम्बर 2026 को दिल्ली में चंद्रोदय 05:41 पर है और स्नान की खिड़की 05:41 से 06:38 — एक घंटे से भी कम। शहर बदलते ही चंद्रोदय और सूर्योदय दोनों खिसकते हैं, और कहीं-कहीं यह खिड़की सिमटकर कुछ ही मिनट रह जाती है। अपने शहर का चंद्रोदय, सूर्योदय और तिथि-समाप्ति का समय रोज़ के पंचांग में मिलेगा।
नरकासुर और सत्यभामा का बाण
दिन का नाम नरकासुर से है, प्राग्ज्योतिषपुर (आज का असम) का राजा, जिसने सोलह हज़ार एक सौ स्त्रियाँ बंदी बना रखी थीं। कृष्ण उससे युद्ध करने गए, और जिस कथा पर यह दिन टिका है उसमें अकेले नहीं। वरदान था कि मृत्यु केवल माता के हाथों होगी, और माता थीं भूदेवी, यानी पृथ्वी। सत्यभामा, जो उनका रथ हाँकती हैं, भूदेवी का ही पुनर्जन्म हैं; कृष्ण के बेहोश होते ही धनुष वही उठाती हैं और बाण चलाती हैं। भागवत पुराण में कृष्ण स्वयं सुदर्शन चक्र से असुर का वध करते हैं, सत्यभामा गरुड़ पर साथ; शास्त्र में वही मुख्य, पर यह दिन दूसरी कथा से बना।
मृत्यु के साथ एक माँग भी जुड़ी है, दो तरह से कही जाती है। कहीं मरता असुर स्वयं माँगता है कि उसकी मृत्यु का दिन शोक से नहीं, स्नान और दीपों से मने; कहीं यह माँग भूदेवी की है, कि बेटे को आँसुओं में नहीं, रोशनी में याद करें। तेल का कारण भी यहीं है: मुक्त स्त्रियों ने बंदी जीवन की मैल धोने के लिए स्नान किया, और कृष्ण ने नरकासुर का रक्त धोने के लिए तेल-स्नान।
चौदह दीये क्यों — और इस बार किस शाम
चतुर्दशी यानी चौदहवीं, और इस शाम घर में चौदह दीये रखे जाते हैं: तुलसी, देहरी, पानी का स्थान, रसोई, अनाज की जगह, मंदिर या पीपल के नीचे। 2026 में यह शाम शनिवार, 7 नवम्बर की है, क्योंकि दीपदान प्रदोष का काम है और प्रदोष में चतुर्दशी उसी दिन मिलती है — 8 की शाम तो लक्ष्मी पूजा की है। इन दिनों का दूसरा दीया है यम दीपदान, दक्षिण की ओर रखा, जिसे बहुत घर यम का दीया कहते हैं; कुछ इसे धनतेरस (इस बार शुक्रवार, 6 नवम्बर) की शाम जलाते हैं, कुछ छोटी दीवाली की; अपने घर की परंपरा निभाइए।
दक्षिण में यही दीपावली है
तमिलनाडु, कर्नाटक और गोवा में दीपावली का मुख्य दिन नरक चतुर्दशी है, अमावस्या नहीं; पहले दो राज्यों में सरकारी अवकाश भी इसी दिन का है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अलग हैं: वहाँ चतुर्दशी की सुबह तेल-स्नान होता है, पर मुख्य दीपावली उत्तर की तरह अमावस्या को ही रहती है, और तेलुगु पंचांग भी उसी दिन। 2026 में इससे अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि स्नान भी 8 की भोर का है और अमावस्या भी उसी दिन 11:28 पर लग जाती है — दक्षिण और उत्तर, दोनों की दीवाली एक ही रविवार पर आ मिलती है।
तमिल घरों में दिन तेल-स्नान से शुरू होता है, फिर नए कपड़े, और किसी मिठाई से पहले दीपावली मरुंदु, घर का बना लेह्यम। गोवा में सप्ताह भर नरकासुर के पुतले बनते हैं, और इसी भोर जलाए जाते हैं। कर्नाटक में दीपावली तीन दिन की है, पर गिनती एक-सी नहीं: बहुत घर इसे त्रयोदशी की शाम नीरु तुंबुव हब्बा से शुरू मानते हैं, जब पानी के बर्तन भरकर सजाए जाते हैं और अगली सुबह उसी पानी से स्नान; समापन बलि पाड्यमी पर। कोई गणना ग़लत नहीं, बस ज़ोर अलग दिन पर है।
दीवाली सप्ताह 2026 एक नज़र में
- 1 नवम्बर (रविवार): अहोई अष्टमी (पूजा मुहूर्त 17:36–18:54, तारों का दर्शन लगभग 18:00) — और उसी दिन रवि पुष्य योग व सर्वार्थ सिद्धि: पुष्य नक्षत्र रविवार को, धनतेरस से पहले सोना, वाहन या निवेश की बोहनी का सबसे बड़ा ख़रीदारी-योग।
- 5 नवम्बर (गुरुवार): रमा एकादशी।
- 6 नवम्बर (शुक्रवार): धनतेरस — पूजा मुहूर्त 18:02–19:57 (प्रदोष 17:32–20:09); धन्वंतरि जयंती और प्रदोष व्रत भी इसी शाम।
- 7 नवम्बर (शनिवार): छोटी दीवाली के दीये (चतुर्दशी प्रदोष में) + मासिक शिवरात्रि।
- 8 नवम्बर (रविवार): भोर में अभ्यंग स्नान 05:41–06:38, शाम को दीवाली लक्ष्मी पूजा 17:54–19:50।
- 9 नवम्बर (सोमवार): ख़ाली दिन — अमावस्या दोपहर उतर जाती है, कोई पर्व नहीं।
- 10 नवम्बर (मंगलवार): गोवर्धन पूजा / अन्नकूट — प्रातःकाल मुहूर्त 06:40–08:50।
- 11 नवम्बर (बुधवार): भाई दूज — अपराह्न 13:10–15:20; उस दिन अमृत सिद्धि और सर्वार्थ सिद्धि योग भी।
कार्तिक के व्रतों की यह कड़ी करवा चौथ से चलकर यहाँ पहुँचती है — पिछला पड़ाव करवा चौथ 2026 की तिथि, चंद्रोदय और व्रत विधि में विस्तार से है, और उससे पहले के सारे व्रत-त्योहार अक्टूबर 2026 के पूरे पंचांग में। आगे देखें तो 20 नवम्बर की देव उठनी एकादशी से चातुर्मास समाप्त होकर विवाह-सीज़न खुलता है — पर विवाह का मुहूर्त पंचांग भर से नहीं, व्यक्तिगत कुंडली से तय होता है।
जो सबसे ज़्यादा ग़लत होता है
- 7 और 8 में से एक तारीख़ चुनकर दूसरी रस्म छोड़ देना। इस साल दीये 7 की शाम के हैं और स्नान 8 की भोर का — एक तारीख़ पर दोनों नहीं सिमटते।
- 7 नवम्बर की सुबह स्नान कर लेना। उस भोर चतुर्दशी लगी ही नहीं थी — वह 10:48 पर आती है।
- सूर्योदय के बाद नहाना। पानी वही है, पर यह क्रिया भोर से पहले की है।
- यह मान लेना कि 8 नवम्बर पूरे दिन चतुर्दशी रहती है; वह दिन चढ़ते ही 11:28 पर पूरी हो जाती है।
- दीवाली 9 नवम्बर लिख लेना। अमावस्या 9 की दोपहर 12:32 पर उतर जाती है और प्रदोष 8 की शाम ही मिलता है — लक्ष्मी पूजा 8 को है।
- बाज़ार का उबटन लेकर तेल छोड़ देना। तेल ही अभ्यंग है, उबटन उसे उतारता भर।
7 और 8 नवम्बर 2026 को अपने शहर का सूर्योदय, चंद्रोदय और तिथियों के समय उस दिन के पंचांग में देखिए। जिन घरों में भोर का स्नान और शाम की लक्ष्मी पूजा दोनों होनी हैं, उन्हें इस बार दोनों एक ही रविवार में बिठाने पड़ेंगे; अगर यह क्रम आपके घंटों में नहीं बैठ रहा, तो परामर्श ले सकते हैं।