नवरात्रि 2026 छठा दिन: 16 अक्टूबर को माँ कात्यायनी पूजा विधि, भोग, मंत्र और रंग
नवरात्रि 2026 का छठा दिन 16 अक्टूबर, शुक्रवार को है। आश्विन शुक्ल षष्ठी प्रातः 03:26 पर शुरू होकर 17 अक्टूबर 05:54 पर समाप्त होगी। माँ कात्यायनी की पूजा विधि, शहद का भोग, मंत्र, दिन का रंग और विवाह से जुड़ी परंपरा, सब दिल्ली के समय के साथ।
नवरात्रि 2026 का छठा दिन शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को है। इस दिन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि रहेगी और नवदुर्गा के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी की पूजा होगी।
यहाँ दिए गए सारे समय दिल्ली के और भारतीय मानक समय में हैं। सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पूजा का समय तय करने से पहले अपने शहर का दैनिक पंचांग देख लीजिए।
16 अक्टूबर 2026 का पूरा पंचांग
| विवरण | शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 (दिल्ली) |
|---|---|
| नवरात्रि दिन | छठा दिन, माँ कात्यायनी |
| तिथि | आश्विन शुक्ल षष्ठी |
| षष्ठी आरंभ | 16 अक्टूबर 2026, प्रातः 03:26 |
| षष्ठी समाप्त | 17 अक्टूबर 2026, प्रातः 05:54 |
| नक्षत्र | ज्येष्ठा, चौथा चरण |
| योग | शोभन |
| करण | कौलव |
| चंद्र राशि | वृश्चिक |
| सूर्य राशि | कन्या |
| सूर्योदय और सूर्यास्त | प्रातः 06:23 और सायं 17:49 |
| चंद्रोदय और चंद्रास्त | दिन में 11:34 और रात्रि 21:40 |
| राहुकाल | 10:40 से 12:06 |
छठा दिन 16 अक्टूबर ही क्यों है, 17 क्यों नहीं
तिथि कोई पूरा दिन नहीं होती। चंद्रमा जितने समय में सूर्य से बारह अंश आगे बढ़ता है, वही एक तिथि है, और वह घड़ी के किसी भी घंटे शुरू या समाप्त हो सकती है। भारत के लगभग सभी पंचांग उदया तिथि का नियम मानते हैं, यानी सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, दिन उसी के नाम से जाना जाता है। 16 अक्टूबर को दिल्ली में सूर्योदय प्रातः 06:23 पर है और षष्ठी 03:26 से चल रही है, इसलिए यह दिन पहली किरण से ही षष्ठी का है।
17 अक्टूबर को षष्ठी प्रातः 05:54 पर समाप्त हो जाती है, यानी दिल्ली के सूर्योदय 06:24 से लगभग आधा घंटा पहले। यह अंतर इतना कम है कि एक बात साफ कह देनी चाहिए। जिन जगहों पर सूर्योदय 05:54 से पहले हो जाता है, यानी देश के पूर्वी छोर पर, वहाँ 17 अक्टूबर की सुबह भी षष्ठी चल रही होगी और वहाँ का पंचांग दोनों तारीखों पर षष्ठी दिखा सकता है। पूर्वी भारत में हों तो दिल्ली की तालिका नहीं, अपना स्थानीय पंचांग मानिए। दो भरोसेमंद पंचांगों में एक दिन का फर्क अक्सर इसी वजह से होता है।
इस साल आगे की तारीखें कैसे चलेंगी
2026 में नौ दिन नौ तारीखों पर नहीं बँटते। सप्तमी दो सूर्योदय तक खिंचती है, इसलिए सातवाँ दिन दो बार आता है, और अष्टमी तथा नवमी एक ही तारीख में सिमट जाती हैं।
| तारीख | सूर्योदय की तिथि | पर्व |
|---|---|---|
| शुक्रवार, 16 अक्टूबर | षष्ठी | छठा दिन, माँ कात्यायनी |
| शनिवार, 17 अक्टूबर | सप्तमी | सातवाँ दिन, माँ कालरात्रि |
| रविवार, 18 अक्टूबर | सप्तमी दोबारा | सातवाँ दिन जारी |
| सोमवार, 19 अक्टूबर | 10:52 तक अष्टमी, फिर नवमी | दुर्गा अष्टमी और महानवमी एक साथ |
| मंगलवार, 20 अक्टूबर | 12:50 तक नवमी, फिर दशमी | विजयादशमी |
व्रत रख रहे हैं तो रंग से ज्यादा मायने यही सिमटाव रखता है, क्योंकि इसी से तय होता है कि पारण कब होगा और कन्या पूजन किस दिन। ब्योरा दुर्गा अष्टमी और महानवमी 2026 में है।
माँ कात्यायनी कौन हैं
दुर्गा सप्तशती के देवी कवच में नवदुर्गा के नाम क्रम से गिनाए गए हैं और छठा नाम सीधे आता है: पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। यह नाम पिता के नाम से बना है। परंपरा कहती है कि कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन ने इसी कामना से तपस्या की थी कि देवी उनके घर पुत्री रूप में जन्म लें। देवी ने वर दिया, और कात्यायन की होने से वे कात्यायनी कहलाईं। ऋषि ने आश्विन शुक्ल की सप्तमी, अष्टमी और नवमी को उनकी पूजा की, और दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया।
यही कारण है कि उनकी पूजा नवरात्रि में ठीक इसी जगह बैठती है। पूरा नवरात्रि महिषासुर के विरुद्ध संघर्ष की स्मृति है, और कात्यायनी वह स्वरूप हैं जिसमें वह संघर्ष पूरा हुआ। 20 अक्टूबर की विजयादशमी उसी कथा का दसवाँ दिन है। स्वरूप पर ध्यान श्लोक इतना ही कहता है कि वे चमकती तलवार लिए सिंह पर सवार हैं। चार और दस भुजाओं वाली मूर्तियाँ एक ही दुकान में मिल जाती हैं; भुजाओं की गिनती चित्रकार की परंपरा है, नियम नहीं।
छठे दिन का रंग: दो सूचियाँ, दो जवाब
नवरात्रि के रंग आधुनिक परंपरा हैं। किसी पुराण, सप्तशती के श्लोक या धर्मशास्त्र में छठे दिन का कोई रंग तय नहीं है। यह चलन महाराष्ट्र और गुजरात से पिछले कुछ दशकों में फैला, और आज इसके दो अलग रूप चल रहे हैं, इसीलिए एक ही सवाल के दो पक्के जवाब मिलते हैं।
पुराना रूप रंग को वार से जोड़ता है, इसलिए वह हर साल बदलता है। 2026 में छठा दिन शुक्रवार है, और उस सूची में शुक्रवार का रंग हरा है। नया रूप रंग को दिन की संख्या से जोड़ता है, और ऐसी ज्यादातर सूचियों में छठे दिन का रंग स्लेटी है। दोनों के पीछे रिवाज के अलावा कोई प्रमाण नहीं। साफ और बिना फटा वस्त्र, किसी भी रंग का, परंपरा इतना ही माँगती है।
भोग में शहद, और शास्त्र की चुप्पी
छठे दिन माँ कात्यायनी को मधु यानी शहद अर्पित किया जाता है। यह घरों में जमी हुई परंपरा है और इसे निभाना चाहिए। पर इसके साथ कोई कारण नहीं आता। ऐसा कोई शास्त्रीय स्रोत नहीं मिलता जो बताए कि शहद ही क्यों। वाणी में मिठास या विवाह में सफलता जैसी जो व्याख्याएँ इंटरनेट पर घूमती हैं, वे बाद की जोड़ी बातें हैं, शास्त्र नहीं। एक चम्मच शहद, या सादे हलवे और फल पर थोड़ा शहद, पर्याप्त है, और उसे प्रसाद के रूप में बाँट दीजिए।
छठे दिन के मंत्र
- नाममंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः। माला पर जप के लिए यही लीजिए।
- ध्यान श्लोक: चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
- कवच पंक्ति: पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
एक सौ आठ जप सामान्य गिनती है। मन भटकते हुए एक सौ आठ से बेहतर है ध्यान से किए गए ग्यारह।
पूजा विधि
- स्नान करके पूजा स्थान साफ कीजिए। 11 अक्टूबर प्रतिपदा को स्थापित कलश और अखंड ज्योति वैसे ही रहेंगे; छठे दिन नई स्थापना नहीं होती।
- छोटा संकल्प बोलिए: अपना नाम, गोत्र यदि मालूम हो, स्थान और उद्देश्य।
- जल, अक्षत, रोली, लाल या पीली चुनरी, गेंदा और लाल गुड़हल अर्पित कीजिए।
- दीपक और धूप जलाकर शहद का भोग लगाइए।
- ध्यान श्लोक पढ़िए, फिर नाममंत्र का जप कीजिए।
- दुर्गा सप्तशती, देवी कवच या दुर्गा चालीसा, जो नियम से पढ़ते हैं वही पढ़िए।
- आरती, प्रणाम, फिर प्रसाद वितरण। हो सके तो घर के बाहर किसी एक को खिलाइए।
विवाह के लिए कात्यायनी व्रत: परंपरा और उसका स्रोत
इस दिन से जुड़ी सबसे प्रचलित मान्यता यह है कि कुँवारी कन्याएँ कात्यायनी की पूजा करें तो मनचाहा वर मिलता है और विवाह की अड़चनें दूर होती हैं। इसे उसी रूप में कहिए जो यह है, यानी परंपरा, न कि नवरात्रि से जुड़ा शास्त्रीय विधान।
जिस संदर्भ पर यह मान्यता टिकी है, वह असली और निश्चित है। श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में व्रज की कुँवारी गोपियाँ कात्यायनी व्रत रखती हैं। हेमंत के पहले महीने भर वे भोर में कालिंदी में स्नान करती हैं, तट की रेत से देवी की मूर्ति बनाती हैं और प्रार्थना करती हैं: कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥ अर्थात हे कात्यायनी, हे महामाया, हे महायोगिनी, हे अधीश्वरी, नंद के पुत्र को मेरा पति बनाइए।
इसमें दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। वह व्रत मार्गशीर्ष का है, आश्विन नवरात्रि का नहीं; और गोपियाँ किसी एक विशेष व्यक्ति के लिए प्रार्थना कर रही थीं। छठे दिन की परंपरा उस कथा का संबंध लेती है, पूरा कर्मकांड नहीं। यह सुंदर परंपरा है, इसे छोड़ने का कोई कारण नहीं, पर यह गारंटी नहीं है। कोई शुल्क लेकर यह व्रत कराने और विवाह की अड़चन दूर करने का दावा करे तो वह आपको कुछ बेच रहा है।
राहुकाल और शहर का अंतर
16 अक्टूबर, शुक्रवार को दिल्ली में राहुकाल 10:40 से 12:06 तक है। शास्त्रीय गणना में यह अशुभ समय है और नया काम शुरू करने के लिए इसे टाला जाता है।
नवरात्रि की पूजा पर यह लागू होता है या नहीं, इस पर विद्वानों में सचमुच मतभेद है, और मनगढ़ंत फैसला सुनाने के बजाय यही कहना ठीक है। आम मत यह है कि नित्य पूजा, जो आप प्रतिपदा से रोज कर रहे हैं, राहुकाल से नहीं रुकती; यह समय नए काम, यात्रा और खरीद के लिए मायने रखता है। फिर भी बहुत से घर मुख्य पूजा इस अवधि से हटा लेते हैं, जिसमें कोई हानि नहीं। राहुकाल स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त से निकलता है, इसलिए हर शहर में इसका समय अलग होता है।
पूरे नौ दिनों का क्रम एक जगह देखना हो तो नवरात्रि 2026 का पूरा कैलेंडर और पूजा गाइड देखिए।