घटस्थापना 2026: 11 अक्टूबर मुहूर्त, कलश स्थापना विधि और सामग्री सूची
प्रतिपदा 10 अक्टूबर रात 21:20 से 11 अक्टूबर रात 21:32 तक है, इसलिए रविवार की पूरी सुबह उपलब्ध है। यहाँ दिल्ली के लिए प्रातःकाल और अभिजित मुहूर्त, वैधृति योग पर ईमानदार स्थिति, पूरी सामग्री सूची और अखंड ज्योति के नियम दिए गए हैं।
शारदीय नवरात्रि 2026 का आरंभ रविवार, 11 अक्टूबर को है और घटस्थापना उसी सुबह की जाएगी। तारीख तय करने वाले आँकड़े ये हैं: आश्विन शुक्ल प्रतिपदा 10 अक्टूबर को 21:20 से शुरू होकर 11 अक्टूबर को 21:32 पर समाप्त होती है, और दिल्ली में सूर्योदय 06:20 बजे है। यानी रविवार का पूरा दिन प्रतिपदा में है। कई वर्षों में प्रतिपदा सुबह ही उतर जाती है और पंचांगों को चालीस मिनट की तंग खिड़की छापनी पड़ती है। इस बार तिथि बाधा नहीं है — सीमा सिर्फ इस नियम की है कि घटस्थापना दिन के किस भाग में हो।
10 अक्टूबर को घटस्थापना क्यों नहीं
- प्रतिपदा 10 अक्टूबर को लगती जरूर है, पर 21:20 बजे — अंधेरा होने के बाद। घटस्थापना दिन का कर्म है, रात में नहीं की जाती।
- 10 अक्टूबर का दिन अमावस्या का है — सर्व पितृ अमावस्या, पितृ पक्ष का अंतिम दिन। अमावस्या पर घटस्थापना का स्पष्ट निषेध है।
- उदया तिथि का नियम — जो तिथि सूर्योदय पर चल रही हो, वही दिन की तिथि — भी यही कहता है: प्रतिपदा सूर्योदय के समय सिर्फ 11 अक्टूबर को है।
11 अक्टूबर 2026 के मुहूर्त
सूर्योदय 06:20, सूर्यास्त 17:55 — यानी दिनमान 11 घंटे 35 मिनट। नीचे दिया हर समय इसी अवधि का एक अंश है।
| काल | दिल्ली समय | गणना |
|---|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त | 04:44 – 05:32 | सूर्योदय से 96 से 48 मिनट पहले |
| सूर्योदय | 06:20 | — |
| प्रातःकाल — घटस्थापना | 06:20 – 08:39 | दिनमान का पहला पंचमांश |
| दिन का पहला तिहाई | 06:20 – 10:12 | कुछ पंचांगों का चौड़ा नियम |
| अभिजित मुहूर्त | 11:44 – 12:31 | दिन के 15 मुहूर्तों में आठवाँ |
| स्थानीय मध्याह्न | 12:08 | सूर्योदय और सूर्यास्त का मध्य |
| यमगंड | 12:08 – 13:34 | आठ भागों में पाँचवाँ (रविवार) |
| गुलिक काल | 15:01 – 16:28 | आठ भागों में सातवाँ (रविवार) |
| राहुकाल | 16:28 – 17:55 | आठ भागों में आठवाँ (रविवार) |
| सूर्यास्त | 17:55 | — |
| प्रतिपदा समाप्त | 21:32 | पूरे भारत में एक ही क्षण |
तालिका की दो पंक्तियों को अलग-अलग पंचांग "घटस्थापना मुहूर्त" कहते हैं, और भ्रम यहीं से शुरू होता है। प्रातःकाल दिनमान के पाँच बराबर भागों — प्रातः, संगव, मध्याह्न, अपराह्न, सायाह्न — में से पहला है, यानी 06:20 से 08:39। ढीला नियम है "दिन का पहला तिहाई", जो 10:12 तक जाता है; 06:20–08:39 के भीतर काम निपटा लें तो दोनों पूरे हो जाते हैं। रविवार को राहुकाल दिन का आठवाँ भाग है, इसलिए पूरी सुबह उससे मुक्त है। अपने शहर के आँकड़े हमारे दैनिक पंचांग पर देखिए।
अभिजित मुहूर्त कैसे निकलता है
दिनमान के पंद्रह बराबर मुहूर्तों में आठवाँ अभिजित कहलाता है — वही जो स्थानीय मध्याह्न के दोनों ओर पड़ता है। दिल्ली में 11 अक्टूबर का दिनमान 41,700 सेकंड है; पंद्रह से भाग देने पर हर मुहूर्त 46 मिनट 20 सेकंड का बैठता है, और आठवाँ मुहूर्त 11:44 से 12:31 तक चलता है। स्थानीय मध्याह्न 12:08 पर है, यानी लगभग इसके बीच में — जैसा होना ही चाहिए।
प्रातःकाल में स्थापना संभव न हो, तभी अभिजित का सहारा लिया जाता है। बुधवार को परंपरा इसे छोड़ देती है; यह रविवार है, इसलिए प्रश्न नहीं उठता। इस दिन यमगंड 12:08 पर शुरू होकर अभिजित के उत्तरार्ध से टकराता है — परंपरा अभिजित को स्वयंसिद्ध मानती है। यह तर्क संतोष न दे, तो प्रातःकाल की खिड़की पर कोई दोष नहीं है।
वैधृति योग और चित्रा नक्षत्र
11 अक्टूबर को सूर्योदय के समय नक्षत्र चित्रा है और नित्य योग वैधृति — ठीक वे दो, जिन्हें कई पंचांग घटस्थापना के लिए वर्ज्य बताते हैं।
यह निर्देश असली है। पर यह बिना कारण दिया गया है: ग्रंथ नहीं बताते कि चित्रा या वैधृति अनुपयुक्त क्यों हैं, और हम कोई कारण गढ़ेंगे नहीं। वे यह भी नहीं कहते कि घटस्थापना किसी और दिन कर ली जाए — की भी नहीं जा सकती, क्योंकि यह कर्म प्रतिपदा से बँधा है और प्रतिपदा सिर्फ 11 अक्टूबर को है। इसलिए व्यावहारिक हल वही है जो पंचांग खुद निकालते हैं: प्रतिपदा वाली सुबह के भीतर रहिए, और चेतावनी मन पर बैठती हो तो अभिजित लीजिए। हमारा स्रोत सूर्योदयकालीन योग दर्ज करता है, बदलने का मिनट नहीं — इसलिए वैधृति के समाप्त होने का समय हम नहीं छाप रहे। इतना तय है कि 06:20 पर वैधृति है और 12 अक्टूबर के सूर्योदय से पहले विष्कम्भ आ चुका होता है।
पूरी सामग्री सूची
कलश के लिए
- मिट्टी, तांबे या पीतल का कलश — स्टील या प्लास्टिक नहीं; लोहा वर्ज्य
- शुद्ध जल और थोड़ा गंगाजल
- एक साबुत सुपारी, एक सिक्का, थोड़े अक्षत, कुछ दूर्वा
- कलश के मुख पर रखने के लिए आम या अशोक के पाँच पत्ते
- जटा वाला नारियल और उसे लपेटने के लिए लाल कपड़ा या चुनरी
- कलश के गले में बाँधने के लिए मौली
जौ के लिए
- चौड़े मुँह का मिट्टी का पात्र या सकोरा, कंकड़-रहित छनी हुई साफ मिट्टी, और भरपूर साबुत जौ
पूजा और ज्योति के लिए
- लकड़ी की चौकी, लाल कपड़ा, दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र
- रोली, कुमकुम, हल्दी, चंदन, अक्षत
- लाल फूल — गुड़हल और गेंदा — तथा एक माला
- फल, मिठाई, पान, लौंग, इलायची; धूप, अगरबत्ती, कपूर
- सोलह श्रृंगार — चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, काजल, कंघी, शीशा, महावर, इत्र
- घी के लिए पीतल का दीपक या तेल के लिए मिट्टी का, शुद्ध घी या सरसों तेल, लंबी गोल बत्तियाँ
- दुर्गा सप्तशती, आसन, घंटी, शंख, थाली और आचमनी
जौ कैसे बोएँ
पात्र में दो-तीन इंच मिट्टी भरिए, जौ को ढेर करने के बजाय पूरी सतह पर बराबर बिखेरिए, ऊपर मिट्टी की पतली परत डालिए और इतना जल छिड़किए कि मिट्टी भीग जाए। दिन में एक बार हल्का जल दीजिए और पात्र छाया में रखिए। अंकुरों को सबसे पहले ज्यादा पानी मारता है, फिर सीधी धूप। दूसरे-तीसरे दिन अंकुर निकल आते हैं और अष्टमी तक तीन से पाँच इंच के हो जाते हैं। लोकाचार गहरे हरे उगने को शुभ मानता है — पर हल्के रंग का अंकुर पानी और रोशनी का परिणाम है, कोई संकेत नहीं।
कलश की स्थापना — दिशा और क्रम
चौकी को पूर्व या ईशान की दीवार से लगाइए ताकि पूजा में आपका मुख पूर्व या ईशान की ओर रहे; घट का परंपरागत स्थान ईशान कोण ही है। जगह धोकर, सुखाकर लाल कपड़ा बिछाइए। फिर क्रम से: कलश के गले में मौली बाँधिए; शुद्ध जल और थोड़ा गंगाजल भरिए; सुपारी, सिक्का, अक्षत और दूर्वा डालिए; मुख पर आम के पाँच पत्ते ऐसे लगाइए कि सिरे बाहर रहें; नारियल लाल कपड़े में लपेटकर मुख पर रखिए। कलश जौ के पात्र के बीच रखा जाता है या पास में चावल की ढेरी पर — दोनों प्रचलित हैं।
नारियल की जटा ऊपर हो या साधक की ओर — घरों में सचमुच दो परंपराएँ हैं। ग्रंथ निपटारा नहीं करते; अपने घर की रीत मानिए, वह न हो तो जटा ऊपर रखिए।
अखंड ज्योति के नियम
- घी का दीपक देवी के दाहिनी ओर, तेल का दीपक बाईं ओर।
- लंबी हाथ से बनी गोल बत्ती लीजिए; चपटी बत्ती तेल ज्यादा पीती है और बार-बार ध्यान माँगती है।
- दीपक को अक्षत की ढेरी पर, धातु की थाली में रखिए — सीधे कपड़े पर कभी नहीं।
- घी या तेल खत्म होने से पहले किनारे से धीरे-धीरे डालिए ताकि लौ न हिले।
- काँच की चिमनी से ढकिए और पर्दों तथा हवा से उड़ने वाली हर चीज से दूर रखिए।
- फूँक मारकर कभी न बुझाएँ; नौ दिन बाद उसे स्वयं शांत होने दीजिए।
ज्योति बुझ जाए — नौ दिनों में कभी-कभी हो जाता है — तो क्षमा माँगकर फिर जला लीजिए। इसके लिए ग्रंथों में कोई सर्वमान्य प्रायश्चित्त नहीं है, और यह कहने का कोई आधार नहीं कि दीपक बुझना अनिष्ट का संकेत है। एक बात पंचांग नहीं कहते, हम कहेंगे: नौ दिन बिना देखरेख जलती खुली लौ असली खतरा है। घर लंबे समय खाली रहने वाला हो तो पूजा के समय छोटा दीपक जलाना स्वीकृत विकल्प है।
आपके शहर का सूर्योदय दिल्ली जैसा नहीं है
यहाँ के सारे समय दिल्ली के हैं, भारतीय मानक समय में। भारत के पूर्वी और पश्चिमी छोर के बीच सूर्योदय में लगभग आधे घंटे का अंतर है, और प्रातःकाल, अभिजित तथा राहुकाल स्थानीय दिनमान के अंश हैं, इसलिए उतना ही खिसकते हैं। आपके यहाँ सूर्योदय बीस मिनट बाद हो तो पूरी तालिका बीस मिनट आगे कर लीजिए। जो नहीं खिसकता वह है 21:32 पर प्रतिपदा का अंत — तिथि सूर्य के सापेक्ष चंद्रमा की स्थिति है, स्थानीय घटना नहीं, इसलिए वह गुवाहाटी और अहमदाबाद में एक ही क्षण समाप्त होती है।
नवरात्रि 2026 का बाकी कैलेंडर
| दिनांक | सूर्योदयकालीन तिथि | पर्व |
|---|---|---|
| रविवार 11 अक्टूबर | प्रतिपदा | घटस्थापना, पहला दिन |
| शनिवार 17 व रविवार 18 अक्टूबर | दोनों दिन सप्तमी | सातवाँ दिन दो बार |
| सोमवार 19 अक्टूबर | अष्टमी | दुर्गा अष्टमी और महानवमी साथ |
| मंगलवार 20 अक्टूबर | नवमी | विजयादशमी |
17 और 18, दोनों दिन सूर्योदय पर सप्तमी है, इसलिए सातवाँ दिन दोहराया जाता है और नौ तिथियाँ दस तारीखों में फैल जाती हैं। इसी कारण दुर्गा अष्टमी और महानवमी इस बार एक ही सोमवार को पड़ रही हैं। दिन-प्रतिदिन का पूरा विवरण हमारे नवरात्रि नौ दिन के कैलेंडर में है।