नवरात्रि 2026 सातवां दिन: 17 अक्टूबर को मां कालरात्रि पूजा, और सप्तमी दो दिन क्यों

शारदीय नवरात्रि 2026 में शुक्ल सप्तमी दो सूर्योदय छूती है — 17 और 18 अक्टूबर, दोनों दिन सप्तमी। मां कालरात्रि की पूजा 17 अक्टूबर शनिवार को है। यहां तिथि का पूरा गणित, दूसरे दिन का अर्थ, गुड़ का भोग, मंत्र और विधि — दिल्ली के समय के साथ।

शारदीय नवरात्रि 2026 का आरंभ 11 अक्टूबर से है। सातवां दिन, यानी मां कालरात्रि का दिन, शनिवार 17 अक्टूबर 2026 को है। लेकिन इस साल पंचांग में एक पेच है जो बहुत से घरों में उलझन पैदा करेगा — आश्विन शुक्ल सप्तमी दो सूर्योदय छू रही है, इसलिए 17 और 18 अक्टूबर, दोनों तारीखों पर सप्तमी लिखी मिलेगी। ज़्यादातर कैलेंडर सातवां दिन दो बार छाप देंगे और बात वहीं छोड़ देंगे। नीचे यह है कि असल में हो क्या रहा है, पूजा किस दिन की है, और दूसरा दिन किस काम का है।

नवरात्रि 2026 का सातवां दिन: तारीखें एक जगह

नीचे दिए तिथि के आरंभ और समाप्ति के क्षण पूरे भारत में एक ही हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त और राहुकाल एक जैसे नहीं हैं — ये दिल्ली के हैं और शहर बदलने पर बदल जाते हैं। इस तरह के सीमारेखा वाले मामले में यही अंतर निर्णायक होता है, इसलिए कोई भी समय तय करने से पहले आख़िरी हिस्सा ज़रूर पढ़ लें।

विवरणशनिवार, 17 अक्टूबर 2026रविवार, 18 अक्टूबर 2026
सूर्योदयकालीन तिथिआश्विन शुक्ल सप्तमीआश्विन शुक्ल सप्तमी
सप्तमी आरंभ17 अक्टूबर, 05:54:58
सप्तमी समाप्त18 अक्टूबर, 08:28:28
सूर्योदय (दिल्ली)06:2406:24
सूर्यास्त (दिल्ली)17:4817:47
नक्षत्रमूल (चरण 4)पूर्वाषाढ़ा (चरण 3)
योगअतिगण्डसुकर्मा
राहुकाल (दिल्ली)09:15 – 10:4016:22 – 17:47
चंद्रोदय / चंद्रास्त12:22 / 22:3513:05 / 23:32
कालरात्रि पूजामुख्य दिनउसी तिथि का शेष भाग

सप्तमी दो तारीखों पर क्यों पड़ रही है

तिथि और दिन एक चीज़ नहीं हैं। तिथि वह अवधि है जिसमें चंद्रमा सूर्य से बारह अंश आगे निकलता है, और दोनों की चाल असमान होने के कारण एक तिथि लगभग बीस से छब्बीस घंटे तक कुछ भी हो सकती है। हमारी अंग्रेज़ी तारीख़ चौबीस घंटे की तय है। जब कोई लंबी तिथि इस चौबीस घंटे की जाली पर सही जगह गिरती है, तो वह लगातार दो सूर्योदयों पर मौजूद रहती है। दिन का नाम सूर्योदय के समय चल रही तिथि से पड़ता है — उदया तिथि से — इसलिए तब दो तारीखें एक ही नाम ढोती हैं। इसी को तिथि वृद्धि कहते हैं।

इस साल सप्तमी 17 अक्टूबर 05:54:58 से 18 अक्टूबर 08:28:28 तक चलती है — पूरे 26 घंटे 33 मिनट। दिल्ली में दोनों सुबह सूर्योदय 06:24 पर है। सप्तमी पहले सूर्योदय से 29 मिनट पहले शुरू हुई और दूसरे सूर्योदय के 2 घंटे 4 मिनट बाद समाप्त हुई। दोनों को छू लिया, वह भी शुरुआत में बहुत कम अंतर से। अगर यह आधा घंटा देर से लगती, तो वृद्धि होती ही नहीं।

सिर्फ़ लंबी होना काफ़ी नहीं है

यही वह बात है जो अकसर छूट जाती है। लंबी तिथि अपने आप दो तारीखें नहीं पा जाती — वह कहां शुरू होती है, यह उसकी लंबाई से ज़्यादा मायने रखता है। इस साल अष्टमी सप्तमी जितनी ही लंबी है, 26 घंटे 23 मिनट, फिर भी उसे एक ही तारीख़ मिलती है। वह 18 अक्टूबर को 08:28 पर लगती है, यानी उस सुबह के सूर्योदय के दो घंटे बाद, इसलिए 18 तारीख़ छूट जाती है और वह केवल 19 अक्टूबर के सूर्योदय पर मिलती है।

इसका उल्टा उदाहरण षष्ठी है। वह 17 अक्टूबर को 05:54:58 पर समाप्त हुई — ठीक उसी क्षण जब सप्तमी लगी — और इसी 29 मिनट से दूसरा सूर्योदय चूक गई। एक ही क्षण ने दोनों का फ़ैसला किया: षष्ठी से दूसरी तारीख़ छीनी और सप्तमी को पहली तारीख़ दे दी। पूरी शारदीय नवरात्रि 2026 में केवल सप्तमी ही ऐसी तिथि है जिसे दो सूर्योदय मिले हैं। तिथि और तारीख़ का यह फ़र्क़ विस्तार से समझना हो तो तिथि और अंग्रेज़ी तारीख़ में क्या अंतर है पढ़िए।

तो कालरात्रि पूजा किस दिन करें

17 अक्टूबर को। कारण, महत्व के क्रम में:

  1. क्रम टूटना नहीं चाहिए। नवरात्रि प्रतिपदा से आगे की गिनती है, एक तिथि पर एक स्वरूप। षष्ठी और कात्यायनी 16 अक्टूबर को थीं; अष्टमी का अपना सूर्योदय 19 अक्टूबर को है। कालरात्रि को 18 तारीख़ पर खिसकाएं तो अगली ही सुबह अष्टमी से टकराव हो जाएगा। दो में से पहला सूर्योदय लेने पर नौ स्वरूप अपने क्रम में बने रहते हैं।
  2. कालरात्रि रात्रि का स्वरूप हैं। नाम स्वयं यही कहता है। 17 और 18 अक्टूबर की पूरी रात सप्तमी के भीतर है — तिथि अगले सूर्योदय के भी काफ़ी बाद तक चलती है। 18 और 19 की रात अष्टमी की है। अगर आप रात में जप करते हैं, जैसा इस देवी के लिए कई परिवार करते हैं, तो दो में से एक ही रात सप्तमी की है।
  3. प्रचलित व्यवहार। घरेलू पंचांग, और जो आपके रिश्तेदार देख रहे होंगे, सातवां दिन 17 तारीख़ को ही रखते हैं।

एक बात साफ़ कह देना ज़रूरी है: शास्त्र हर वृद्धि तिथि के लिए एक ही यांत्रिक नियम नहीं देता। अलग-अलग सम्प्रदाय और अलग-अलग क्षेत्रीय पंचांग दोहरी तिथि को अलग ढंग से सुलझाते हैं, और कुछ व्रतों में दूसरा दिन ही लिया जाता है। ऊपर जो लिखा है वह नवरात्रि के क्रम में अपनाए जाने वाले सामान्य निर्णय के पीछे का तर्क है, कोई सार्वभौमिक विधान नहीं। आपके कुल पंचांग या कुलपुरोहित का कहना अलग हो तो उसी का पालन कीजिए — यह समझौता नहीं, परंपरा का अपना तरीक़ा है।

18 अक्टूबर असल में किस काम का है

यह दूसरी कालरात्रि पूजा नहीं है और न ही कोई नया स्वरूप है। यह उसी सप्तमी का बचा हुआ हिस्सा है, जो सुबह 08:28 पर समाप्त हो जाएगा। व्यवहार में इसका मतलब तीन बातें हैं। अगर आप नवरात्रि का व्रत रख रहे हैं तो नियम बिना टूटे आगे चलते रहेंगे। अगर 17 तारीख़ को कुछ गड़बड़ हो गई — यात्रा में थे, कोई बीमार था, पूजा पूरी नहीं हो पाई — तो 18 की सुबह के शुरुआती घंटे अब भी सप्तमी हैं और उसे पूरा करने का वैध समय हैं। और 08:28 बीत जाने के बाद दिन एक सामान्य नवरात्रि दिवस की तरह चलता है, अखंड ज्योति और नित्य पाठ के साथ, और आप 19 की सुबह अष्टमी के सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं। इस दिन के लिए कोई नया अनुष्ठान गढ़ने की ज़रूरत नहीं है।

मां कालरात्रि का स्वरूप और गर्दभ वाहन

देवी कवच उन्हें नौ में सातवां बताता है — सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्। नवदुर्गा में रूप की दृष्टि से वे सबसे उग्र हैं: वर्ण उसी रात्रि जैसा श्याम जिससे नाम पड़ा, केश खुले और बिखरे, तीन नेत्र, चार भुजाएं। ऊपर का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में और नीचे का वरद मुद्रा में — निर्भयता और वरदान दोनों। बाएं हाथों में वज्र या लौह अंकुश और खड्ग। उनका वाहन गर्दभ यानी गधा है, और यही वह विवरण है जिसके बारे में लोग सबसे ज़्यादा पूछते हैं।

ग्रंथ गर्दभ का वर्णन करते हैं। उसका कारण नहीं बताते। बाद के टीकाकारों ने अर्थ निकाले हैं — कि यह भार वहन का प्रतीक है, या दिखावे के त्याग का — पर ये बाद में जोड़ी गई व्याख्याएं हैं, मूल श्लोक इनके पक्ष में कोई तर्क नहीं देते। यह कह देना ज़्यादा ईमानदार है कि स्वरूप दिया गया है और उसका कारण नहीं दिया गया, बजाय इसके कि कोई अर्थ गढ़ लिया जाए।

परंपरा जिस बात पर ज़ोर देती है वह यह संतुलन है: इतने भयंकर रूप के बावजूद वे शुभंकरी कहलाती हैं, शुभ करने वाली। उग्रता बाहर की ओर है, उस पर जो भक्त के लिए संकट है, भक्त पर नहीं। सातवीं रात्रि का पूरा भाव यही है, और इसीलिए छोटे बच्चों वाले घरों में कहा जाता है कि इस चित्र से डरने की कोई बात नहीं।

रंग और गुड़ का भोग — और जहां व्याख्या ख़त्म होती है

कालरात्रि के दिन से सबसे अधिक जोड़ा जाने वाला रंग गहरा नीला है; कुछ सूचियों में इसकी जगह धूसर मिलता है। यहां साफ़ कह देना चाहिए कि नौ रंगों की ये सूचियां आधुनिक लोकप्रिय चलन हैं, मुख्यतः अख़बारों और पश्चिमी भारत की परंपरा से आई हुई। ये शास्त्रविधान नहीं हैं, अलग-अलग जगह अलग क्रम छपता है, और इस जैसे साल में तो सूचियां आपस में ही असहमत हैं कि 18 अक्टूबर को वही रंग दोहराया जाए या अगला ले लिया जाए। मन हो तो पहनिए। पूजा का कोई अंग इस पर निर्भर नहीं है।

भोग गुड़ का है — सादा गुड़, या गुड़ का हलवा, मालपुआ, गुड़ की रोटी। देवी को अर्पित करने के बाद इसे प्रायः रखा नहीं जाता, दे दिया जाता है: पुरोहित को, किसी बच्चे को, जो द्वार पर आए उसे। प्रचलित कथन इसके साथ एक फल जोड़ते हैं, आमतौर पर आकस्मिक शोक और भय से मुक्ति। यह परंपरा का कथन है, कोई ऐसी क्रिया नहीं जिसे वह समझाती हो, और इसे किसी वैज्ञानिक लाभ का जामा पहनाने की कोई ज़रूरत नहीं। इस दिन गुड़ चढ़ता है — दावा बस इतना ही है।

सप्तमी के मंत्र

  • नाम मंत्र — ॐ देवी कालरात्र्यै नमः
  • नवार्ण मंत्र, नौ दिन चलने वाला — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
  • ध्यान श्लोक — एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धनमूर्ध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥ यही श्लोक एक वेणी, श्याम वर्ण और गर्दभ का आधार है; छपे हुए पाठों में एक-दो शब्द का अंतर मिलता है।
  • स्तुति — या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ जान लेना उचित है कि यह लोकप्रिय रूपांतर है: मूल टेक दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय की है, जहां बीच में शक्ति, मातृ, बुद्धि आदि आते हैं। कालरात्रि वाला रूप बाद का और भक्तिपरक है — इससे पाठ ग़लत नहीं हो जाता, बस इसे सही नाम से जानना ठीक है।

पूजा विधि, क्रम से

  1. स्नान कर पूजा स्थान शुद्ध करें। प्रतिपदा को स्थापित कलश और अखंड ज्योति यथावत रहेंगे — तेल और जल देख लें।
  2. पहले गणेश स्मरण, फिर संकल्प, जिसमें दिन का नाम लें: आश्विन शुक्ल सप्तमी, शनिवार।
  3. गंध, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें। गहरे या नीले पुष्प प्रचलित हैं; जहां उपलब्ध हो वहां रात की रानी।
  4. जल के साथ गुड़ का भोग अर्पित करें।
  5. ध्यान श्लोक पढ़ें, फिर नवार्ण मंत्र का जप, या दुर्गा सप्तशती का सप्तम अध्याय, या कुल परंपरा हो तो पूरा पाठ।
  6. आरती, फिर जो छूट गया या जाने-अनजाने ग़लत हुआ उसके लिए क्षमा प्रार्थना, और अंत में गुड़ का वितरण या दान।
  7. रात्रि उपासना करते हों तो 17 की शाम सूर्यास्त के बाद जप करें। दिल्ली के सूर्यास्त 17:48 और अगले सूर्योदय 06:24 से निकाला जाए तो उस रात का मध्य लगभग 00:06 पर पड़ता है — और वह पूरी रात सप्तमी है।

समय, शहर का फ़र्क़, और आगे क्या

ऊपर के सारे समय दिल्ली के हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त, रात्रि की लंबाई और राहुकाल — सब शहर के साथ बदलते हैं, देश के पूर्वी और पश्चिमी छोर के बीच डेढ़ घंटे से भी ज़्यादा, और यह उस 29 मिनट से कहीं ज़्यादा है जिससे इस बार सप्तमी का फ़ैसला हुआ। तिथि के क्षण नहीं बदलते, पर वे किस सूर्योदय पर पड़ते हैं यह बदल सकता है। कोई समय तय करने से पहले अपने शहर का पंचांग और राहुकाल हर शहर में अलग क्यों होता है देख लें। यह भी ध्यान रहे कि पूर्वी परंपरा में महासप्तमी को नवपत्रिका स्नान होता है और बंगाली पंचांग वृद्धि का निर्णय अपने ढंग से करते हैं — वहां स्थानीय पंचांग ही मान्य है।

तारीख़सूर्योदयकालीन तिथि (दिल्ली)पंचांग में क्या
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026शुक्ल अष्टमी (18 अक्टूबर 08:28:28 → 19 अक्टूबर 10:52:04)दुर्गा अष्टमी और महानवमी एक साथ
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026शुक्ल नवमी (19 अक्टूबर 10:52:04 → 20 अक्टूबर 12:50:40)विजयादशमी (दशहरा)
बुधवार, 21 अक्टूबर 2026शुक्ल दशमी (20 अक्टूबर 12:50:40 → 21 अक्टूबर 14:11:35)नवरात्रि समाप्त

अंत में जो सिकुड़न आ रही है, उसे अभी से जान लेना ठीक रहेगा: अष्टमी और नवमी एक ही तारीख़, 19 अक्टूबर को हैं, क्योंकि 20 अक्टूबर के अपराह्न में दशमी है और विजयादशमी वहीं तय हो जाती है। जो घर अष्टमी और नवमी दोनों को कन्या पूजन करते हैं उन्हें दो सुबह नहीं, एक सुबह की तैयारी करनी होगी। इस पर अलग से दुर्गा अष्टमी और महानवमी 2026 में लिखा है, और पूरे नौ दिन एक साथ नवरात्रि 2026 कैलेंडर में हैं।

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