पितृ पक्ष 2026 तर्पण विधि: कैसे करें, जल, तिल और सही समय (27 सितंबर - 10 अक्टूबर)
पितृ पक्ष 2026 का आरंभ 27 सितंबर और समापन 10 अक्टूबर को। तर्पण असल में है क्या, तीनों प्रकार और उनकी दिशाएँ, जनेऊ किस कंधे पर, जल अंगूठे और तर्जनी के बीच से ही क्यों, और दिल्ली सहित आठ शहरों का अपराह्न काल।
पितृ पक्ष 2026 का आरंभ रविवार, 27 सितंबर को हो रहा है और समापन शनिवार, 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या के साथ। यानी 14 दिन — सोलह नहीं, जितने आमतौर पर गिने जाते हैं। कारण साफ़ है: इस वर्ष कृष्ण अष्टमी 3 अक्टूबर को सुबह 08:00 बजे लगकर 4 अक्टूबर को सुबह 05:52 बजे समाप्त हो जाती है, यानी वह किसी सूर्योदय को छूती ही नहीं और उसे अपना अलग कैलेंडर दिन नहीं मिलता। तिथियाँ सब हैं; दिन कम हैं।
इन दिनों घरों में जो वास्तव में किया जाता है, वह पूरा श्राद्ध नहीं होता — वह तर्पण होता है, यानी जल का अर्पण। यह पृष्ठ केवल उसी पर है: तीन प्रकार, किस दिशा में मुँह, जनेऊ किस कंधे पर, जल में क्या, हथेली के किस भाग से जल गिरे, और समय तय करने वाला नियम। नीचे के सभी समय दिल्ली के हैं; सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, और उससे निकलने वाली हर अवधि भी।
तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान — तीनों अलग हैं
ये तीनों शब्द एक-दूसरे की जगह बोल दिए जाते हैं, जबकि तीनों अलग क्रियाएँ हैं।
- तर्पण — अंजलि से जल का अर्पण, देवताओं, ऋषियों और पितरों को। यह अकेले, घर पर, कुछ ही मिनटों में हो जाता है, और कई परिवारों में यह पूरे वर्ष प्रतिदिन किया जाता है।
- श्राद्ध — किसी नामित पितर के लिए निश्चित तिथि पर की जाने वाली पूरी विधि: संकल्प, आवाहन, ब्राह्मण भोजन। तर्पण उसी का एक अंग है।
- पिंडदान — चावल या जौ के आटे के पिंडों का अर्पण। यह अपनी अलग विधि वाला अलग कर्म है, और तर्पण के पूर्ण होने के लिए आवश्यक नहीं।
तीन तर्पण: देव, ऋषि और पितृ
तर्पण का क्रम निश्चित है, और तीनों की अपनी दिशा, अपनी जनेऊ-स्थिति और हथेली का अपना भाग है। क्रम उलटा नहीं किया जाता।
- देव तर्पण — मुख पूर्व दिशा में। जनेऊ सामान्य स्थिति में, बाएँ कंधे पर (सव्य या उपवीत)। जल अंगुलियों के अग्रभाग से गिराया जाता है, जिसे देव तीर्थ कहते हैं।
- ऋषि तर्पण — मुख उत्तर दिशा में। जनेऊ माला की तरह गले में, दोनों ओर बराबर लटकता हुआ (निवीत)। जल अंगुलियों के मूल से, यानी ऋषि या काय तीर्थ से।
- पितृ तर्पण — मुख दक्षिण दिशा में। जनेऊ दाएँ कंधे पर (अपसव्य या प्राचीनावीती)। जल अंगूठे और तर्जनी के बीच की संधि से, जो पितृ तीर्थ है।
सामान्य गणना यह है: प्रत्येक देव को एक अंजलि, प्रत्येक ऋषि को दो, और नाम लेकर प्रत्येक पितर को तीन अंजलि जल। ऋषि तर्पण पर एक ईमानदार बात — कुछ परंपराओं में वहाँ जनेऊ सव्य ही रहता है और उसे केवल पितृ तर्पण के लिए बदला जाता है। दोनों प्रचलित हैं; अपने परिवार या पुरोहित से पूछकर उसी पर टिके रहें।
पितृ तीर्थ अंगूठे और तर्जनी के बीच ही क्यों
हथेली चार तीर्थों में बँटी है, और यह लोक-प्रथा नहीं, मनुस्मृति 2.59 में निर्धारित है। अंगूठे के मूल में हथेली की ओर ब्रह्म तीर्थ, अंगुलियों के मूल में काय या प्राजापत्य तीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग पर देव तीर्थ, और इन दोनों के नीचे, अंगूठे तथा तर्जनी के बीच की संधि में पितृ तीर्थ।
श्लोक स्थान बता देता है, कारण नहीं बताता। नस-नाड़ी और ऊर्जा-प्रवाह वाली व्याख्याएँ आजकल बहुत सुनने को मिलती हैं, पर उनमें से कुछ भी मूल पाठ में नहीं है और हम उसे शास्त्र बताकर नहीं परोसेंगे। शास्त्र एक सटीक निर्देश देता है, और पालन इसीलिए होता है।
व्यवहार में: हथेली नीचे और थोड़ी अपनी तरफ़ झुकी हुई, अंगूठा अंगुलियों से हटाकर ताकि रास्ता खुले, और जल उसी संधि से बहकर दक्षिण की ओर गिरे।
जल में क्या पड़ता है — तिल, जौ, कुश
- कुश (दर्भ) — पूरे समय हाथ में, और दाहिने हाथ की अनामिका में पवित्री के रूप में। समस्त पितृ कर्म में कुश विहित है; सूत्र-ग्रंथ उसे आवश्यक बताते हैं, उसका कारण नहीं गिनाते।
- काला तिल — केवल पितृ तर्पण में। पुराण तिल को पितरों को प्रिय कहते हैं और उसकी उत्पत्ति की कथा देते हैं; कोई कार्य-कारण नहीं देते।
- जौ और अक्षत — कई परंपराओं में देव तर्पण में, कुछ में केवल शुद्ध जल।
- जल स्वच्छ और शीतल हो। कहीं-कहीं थोड़ा दूध, सफ़ेद पुष्प या गंगाजल मिलाया जाता है — ये क्षेत्रीय जोड़ हैं, सर्वमान्य नियम नहीं।
ताँबे या काँसे का पात्र श्रेष्ठ माना गया है; स्टील का प्रयोग व्यापक है और उससे अर्पण अपूर्ण नहीं होता।
अपराह्न काल: नियम और उसकी वास्तविक गणना
श्राद्ध और तर्पण अपराह्न का कर्म है, और अपराह्न का अर्थ अस्पष्ट दोपहर बाद नहीं है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक की अवधि को पाँच बराबर भागों में बाँटिए — चौथा भाग अपराह्न है। पंद्रह मुहूर्त वाली गणना में यही दसवाँ से बारहवाँ मुहूर्त है।
इससे ठीक पहले दो नामित अवधियाँ आती हैं, जिनमें आरंभिक क्रियाएँ की जाती हैं। कुतुप मुहूर्त दिन का आठवाँ मुहूर्त है — वही अवधि जिसे आपका पंचांग अभिजित मुहूर्त के नाम से देता है। रौहिण मुहूर्त नवाँ है। मुख्य अर्पण इसके बाद अपराह्न में चलता है।
शास्त्रीय आधार यह है कि दिन का पूर्वार्ध देवताओं का और उत्तरार्ध पितरों का भाग माना गया है, और अपराह्न पितरों का हिस्सा है। यह शास्त्र का विभाजन है, संसार का कोई प्रेक्षण नहीं — इतना कह देना ही ईमानदारी है।
दिल्ली: कुतुप और अपराह्न, दिन-प्रतिदिन
| तारीख | वार | सूर्योदय | सूर्यास्त | कुतुप मुहूर्त | अपराह्न काल |
|---|---|---|---|---|---|
| 27 सितंबर | रविवार | 06:12 | 18:11 | 11:48 – 12:35 | 13:23 – 15:47 |
| 28 सितंबर | सोमवार | 06:13 | 18:09 | 11:47 – 12:35 | 13:23 – 15:46 |
| 29 सितंबर | मंगलवार | 06:14 | 18:08 | 11:47 – 12:35 | 13:22 – 15:45 |
| 30 सितंबर | बुधवार | 06:14 | 18:07 | 11:47 – 12:34 | 13:22 – 15:44 |
| 1 अक्टूबर | गुरुवार | 06:15 | 18:06 | 11:47 – 12:34 | 13:22 – 15:44 |
| 2 अक्टूबर | शुक्रवार | 06:15 | 18:05 | 11:46 – 12:34 | 13:21 – 15:43 |
| 3 अक्टूबर | शनिवार | 06:16 | 18:04 | 11:46 – 12:34 | 13:21 – 15:42 |
| 4 अक्टूबर | रविवार | 06:16 | 18:02 | 11:45 – 12:33 | 13:20 – 15:41 |
| 5 अक्टूबर | सोमवार | 06:17 | 18:01 | 11:46 – 12:32 | 13:19 – 15:40 |
| 6 अक्टूबर | मंगलवार | 06:17 | 18:00 | 11:45 – 12:32 | 13:19 – 15:39 |
| 7 अक्टूबर | बुधवार | 06:18 | 17:59 | 11:45 – 12:32 | 13:19 – 15:39 |
| 8 अक्टूबर | गुरुवार | 06:18 | 17:58 | 11:45 – 12:31 | 13:18 – 15:38 |
| 9 अक्टूबर | शुक्रवार | 06:19 | 17:57 | 11:45 – 12:31 | 13:18 – 15:37 |
| 10 अक्टूबर | शनिवार | 06:19 | 17:56 | 11:44 – 12:31 | 13:17 – 15:37 |
सभी समय भारतीय मानक समय में, दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से निकाले गए। किस तारीख को किस तिथि का श्राद्ध पड़ेगा, यह अलग प्रश्न है और उसे हमने पितृ पक्ष 2026 की पूरी तिथि-सूची में विस्तार से लिया है।
आपका शहर दिल्ली नहीं है, और अंतर बड़ा है
चूँकि अपराह्न पूरी तरह सूर्योदय और सूर्यास्त से निकलता है, वह देशांतर के साथ खिसकता है। कोलकाता में यह अवधि दिल्ली से लगभग पैंतालीस मिनट पहले खुलती है और अहमदाबाद में लगभग उन्नीस मिनट बाद।
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त | कुतुप मुहूर्त | अपराह्न काल |
|---|---|---|---|---|
| दिल्ली | 06:11 | 18:13 | 11:48 – 12:36 | 13:24 – 15:49 |
| कोलकाता | 05:26 | 17:29 | 11:03 – 11:52 | 12:40 – 15:04 |
| पटना | 05:40 | 17:42 | 11:17 – 12:05 | 12:53 – 15:18 |
| वाराणसी | 05:48 | 17:50 | 11:25 – 12:13 | 13:01 – 15:26 |
| चेन्नई | 05:58 | 18:02 | 11:36 – 12:24 | 13:12 – 15:37 |
| बेंगलुरु | 06:09 | 18:12 | 11:47 – 12:35 | 13:23 – 15:47 |
| मुंबई | 06:28 | 18:31 | 12:05 – 12:54 | 13:42 – 16:06 |
| अहमदाबाद | 06:30 | 18:32 | 12:07 – 12:55 | 13:43 – 16:08 |
ये आँकड़े 25 सितंबर 2026 के हैं — पक्ष शुरू होने से दो दिन पहले के, क्योंकि लिखते समय हमारा नगर-स्तरीय इंजन इससे आगे नहीं जाता। शहरों के बीच का अंतर पूरे पक्ष भर बना रहता है; हर शहर की अपनी अवधि फिर दिन छोटे होने के साथ कुछ मिनट पहले खिसकती जाती है, ठीक जैसे ऊपर दिल्ली की खिसकी है। अंतर को सीधे समझिए: कोलकाता में दिल्ली की सारणी देखकर बैठें तो आप पौन घंटा पीछे हैं, और दिल्ली की अवधि का आखिरी हिस्सा कोलकाता का अपराह्न बंद हो जाने के बाद पड़ता है। अपनी तारीख और शहर के लिए दैनिक पंचांग देख लें।
तर्पण कहाँ करें — नदी, घाट या घर की छत
बहती नदी या तीर्थ श्रेष्ठ स्थान है — गया, प्रयाग, हरिद्वार, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, बदरीनाथ का ब्रह्म कपाल, त्र्यंबकेश्वर और रामेश्वरम पितृ कर्म में अपना अलग महत्व रखते हैं। वहाँ घुटनों तक जल में दक्षिणाभिमुख खड़े होकर तर्पण किया जाता है।
घर पर करने से कर्म घट नहीं जाता। साफ़ छत, आँगन या पूजा-कक्ष के कोने में कुश या ऊन के आसन पर दक्षिणाभिमुख बैठें, और जल सामने रखी चौड़ी थाली या ताँबे के पात्र में गिराएँ — बेसिन या नाली में नहीं। बाद में वह जल पीपल, तुलसी या किसी वृक्ष की जड़ में डाल दें।
कौन कर सकता है, और विधि में अंतर कहाँ है
परंपरागत रूप से ज्येष्ठ पुत्र तर्पण करता है, उसके बाद क्रमशः भाई, पौत्र और पुत्र की संतति। पुत्र न हो तो शास्त्र और प्रथा दोनों पत्नी, पुत्री, दौहित्र और अन्य संबंधियों को अनुमति देते हैं; आज बहुत से परिवारों में पुत्रियाँ तर्पण करती हैं और उसका शास्त्रीय आधार मौजूद है।
माता-पिता जीवित हों तो भी देव और ऋषि तर्पण किया जा सकता है; पितृ भाग उन्हीं पूर्वजों के लिए है जो नहीं रहे। यदि एक-दो पीढ़ी से आगे के नाम याद न हों तो जितने ज्ञात हैं उन्हें अर्पित करके अंत में सामान्य अर्पण कर दें — 10 अक्टूबर की सर्व पितृ अमावस्या उन्हीं पितरों के लिए है जिनकी तिथि अज्ञात है या छूट गई।
और विधि के बारे में सीधी बात: वह क्षेत्र, संप्रदाय और परिवार के अनुसार बदलती है। दिशाएँ, जनेऊ की स्थितियाँ, हथेली के तीर्थ और अपराह्न का नियम — यही स्थिर केंद्र है जो लगभग सब जगह एक-सा है। अंजलियों की संख्या, मंत्र, जौ या अक्षत, ऋषि तर्पण में निवीत — ये भिन्न हैं, और कोई भी रूप ग़लत नहीं है। अपने परिवार की विधि सीख लें। और यदि भीतर की चिंता कुंडली के पितृ दोष की है, तो वह अलग विषय है, जिसे हमने पितृ दोष की मार्गदर्शिका में लिया है — तर्पण में अतिरिक्त क्रियाएँ जोड़कर उसे नहीं सुलझाया जाता।