ऋषि पंचमी 2026 (15 सितंबर): सप्त ऋषि कौन हैं और यह व्रत किसे रखना चाहिए
ऋषि पंचमी 2026 में मंगलवार, 15 सितंबर को है; पंचमी सुबह 7:45 से अगले दिन सुबह 9:00 तक। संकल्प में लिए जाने वाले सात ऋषि कौन हैं, रजस्वला दोष की बात बिना लाग-लपेट के, अपामार्ग का दातुन, और यह व्रत परंपरा से कौन रखता है।
ऋषि पंचमी 2026 में मंगलवार, 15 सितंबर को है — गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन। तारीख और विधि हर जगह मिल जाती है। जो नहीं मिलता वह यह कि संकल्प में जिन सात ऋषियों का नाम लिया जाता है वे हैं कौन, देवता के बजाय ऋषियों के नाम पर व्रत क्यों, और रजस्वला दोष वाली भाषा का मतलब क्या है। विधि और कथा हमारे ऋषि पंचमी 2026 मुख्य लेख में है, यहाँ दोहराई नहीं गई।
तारीख 15 सितंबर ही क्यों, 16 क्यों नहीं
भाद्रपद शुक्ल पंचमी 2026 में मंगलवार 15 सितंबर की सुबह 7:45 बजे शुरू होकर बुधवार 16 सितंबर की सुबह 9:00 बजे समाप्त होती है (दिल्ली, भारतीय मानक समय)।
केवल तिथि देखें तो 16 सितंबर लगना चाहिए। 15 को दिल्ली में सूर्योदय सुबह 6:07 पर होता है और तब चतुर्थी ही चल रही होती है, जबकि 16 को उदयकालीन तिथि पंचमी है। फिर भी हर पंचांग ऋषि पंचमी 15 सितंबर को रखता है, क्योंकि इस व्रत की पूजा मध्याह्न में कही गई है — दिन के प्रकाश-काल के पाँच बराबर हिस्सों में से बीच वाला — सूर्योदय पर नहीं।
यही नियम फ़ैसला कर देता है। 15 को दिल्ली का मध्याह्न सुबह 11:02 से दोपहर 1:30 तक है और पंचमी पूरी अवधि पर है। 16 को मध्याह्न सुबह 11:02 से दोपहर 1:29 तक है, और पंचमी सुबह 9:00 बजे ही समाप्त हो चुकी होती है।
| विवरण | 15 सितंबर 2026 (दिल्ली) |
|---|---|
| वार | मंगलवार |
| तिथि | भाद्रपद शुक्ल पंचमी, सुबह 7:45 से 16 सितंबर सुबह 9:00 तक |
| नक्षत्र | स्वाति (चरण 3) |
| योग / करण | इन्द्र / विष्टि |
| चंद्र राशि | तुला |
| सूर्योदय / सूर्यास्त | सुबह 6:07 / शाम 6:25 |
| मध्याह्न (पूजा काल) | सुबह 11:02 से दोपहर 1:30 |
| राहुकाल | दोपहर 3:20 से शाम 4:53 |
| संवत् | विक्रम 2083, शक 1948 |
दो बातें पूजा-काल से टकराती नहीं, हट जाती हैं। राहुकाल दोपहर बाद पड़ता है, मध्याह्न बीत जाने के घंटों बाद। और सूर्योदय के समय जो विष्टि करण — भद्रा — चल रहा है, वह चतुर्थी के उत्तरार्ध का करण है, इसलिए चतुर्थी के साथ ही सुबह 7:45 पर समाप्त हो जाता है — पूजा शुरू होने से बहुत पहले।
सूर्योदय हर शहर में अलग है, इसलिए पूजा का समय भी
तिथि के दोनों क्षण पूरे देश के लिए एक ही हैं, क्योंकि भारत में एक ही समय क्षेत्र है। सूर्योदय ऐसा नहीं — पूर्व से पश्चिम तक उसमें लगभग एक घंटे का अंतर है, और मध्याह्न सूर्योदय-सूर्यास्त से निकलता है, इसलिए पूजा का समय भी खिसकता है।
| नगर | सूर्योदय | सूर्यास्त | मध्याह्न काल |
|---|---|---|---|
| दिल्ली | सुबह 6:07 | शाम 6:25 | सुबह 11:02 – दोपहर 1:30 |
| मुंबई | सुबह 6:26 | शाम 6:40 | सुबह 11:20 – दोपहर 1:46 |
| कोलकाता | सुबह 5:23 | शाम 5:39 | सुबह 10:17 – दोपहर 12:45 |
| चेन्नई | सुबह 5:58 | शाम 6:09 | सुबह 10:50 – दोपहर 1:17 |
| बेंगलुरु | सुबह 6:09 | शाम 6:19 | सुबह 11:01 – दोपहर 1:27 |
| हैदराबाद | सुबह 6:04 | शाम 6:17 | सुबह 10:57 – दोपहर 1:24 |
| अहमदाबाद | सुबह 6:27 | शाम 6:42 | सुबह 11:21 – दोपहर 1:48 |
| पुणे | सुबह 6:23 | शाम 6:36 | सुबह 11:16 – दोपहर 1:43 |
| लखनऊ | सुबह 5:52 | शाम 6:10 | सुबह 10:47 – दोपहर 1:15 |
| वाराणसी | सुबह 5:44 | शाम 6:01 | सुबह 10:39 – दोपहर 1:06 |
| पटना | सुबह 5:36 | शाम 5:53 | सुबह 10:31 – दोपहर 12:58 |
पटना में मध्याह्न 12:58 पर बंद होता है, और उसी मिनट अहमदाबाद में शुरू भी नहीं हुआ होता। दोनों अपने क्षितिज के हिसाब से सही हैं। दिल्ली का नहीं, अपने शहर का सूर्योदय देखिए — दैनिक पंचांग में वह स्थान के अनुसार मिलता है।
सप्तर्षि असल में कौन हैं
सात नाम, हर एक पर एक पंक्ति — केवल उतना जितना परंपरा उनसे जोड़ती है:
- कश्यप — पुराणों के प्रजापति, जिनसे देव, असुर, नाग और मनुष्य वंश निकले बताए जाते हैं; भारत का सबसे अधिक कहा जाने वाला गोत्र।
- अत्रि — ऋग्वेद के पाँचवें मंडल के द्रष्टा, जिन्हें सूक्तों जितना ही अनसूया के साथ गृहस्थ जीवन के लिए याद किया जाता है।
- भरद्वाज — छठे मंडल के द्रष्टा; महाभारत में द्रोणाचार्य के पिता, और बाद की परंपरा में आचार्य का पर्याय।
- विश्वामित्र — राजा, जो तप से ब्रह्मर्षि हुए; गायत्री मंत्र उन्हीं के तीसरे मंडल में है।
- गौतम — ऋग्वेद की गोतम परंपरा से; रामायण में अहल्या के पति, जिनका शाप और उसका निवारण महाकाव्य का प्रसिद्ध प्रसंग है।
- जमदग्नि — भृगुवंशी और परशुराम के पिता; उनके नाम से जुड़े सूक्त ऋग्वेद में सुरक्षित हैं।
- वसिष्ठ — सातवें मंडल के द्रष्टा, इक्ष्वाकु कुल के पुरोहित, और महाकाव्यों में विश्वामित्र के आजीवन प्रतिद्वंद्वी।
एक बात साफ़ कहना ज़रूरी है। यह ऋषि पंचमी के संकल्प की सूची है, संस्कृत की एकमात्र सप्तर्षि सूची नहीं। महाभारत और कई पुराणों में मरीचि, अंगिरा, पुलह, क्रतु और पुलस्त्य वाली दूसरी सूची मिलती है। पुरोहित कोई और क्रम बोलें तो वह पाठभेद है, भूल नहीं।
व्रत ऋषियों के नाम पर क्यों
इसे समझाने वाला ढाँचा त्रि-ऋण का सिद्धांत है। मनुष्य जन्म से ही देवताओं का देव-ऋण, पूर्वजों का पितृ-ऋण और ज्ञान सहेजकर आगे पहुँचाने वाले ऋषियों का ऋषि-ऋण लेकर आता है। लगभग पूरा त्योहार-कैलेंडर पहले दो को संबोधित करता है — देवताओं के व्रत, और पितृ पक्ष का श्राद्ध। ऋषि पंचमी उन गिने-चुने दिनों में है जो तीसरे को संबोधित करते हैं, इसीलिए इसका तर्पण किसी देवता को नहीं, सात मनुष्य-नामों को दिया जाता है।
अधिकांश व्रत-पद्धतियों में सातों के साथ अरुंधती का भी आवाहन होता है — वसिष्ठ की पत्नी, और सप्तर्षि मंडल में वसिष्ठ के पास दिखने वाला वही धुँधला तारा जो विवाह में वधू को दिखाते हैं। यह नियम है, अलंकरण नहीं।
रजस्वला दोष की बात, बिना लाग-लपेट के
व्रत-ग्रंथ इस दिन को प्रायश्चित्त कहते हैं — रजस्वला दोष का, यानी रजोकाल में पके भोजन, बर्तनों या व्यक्तियों से हुए स्पर्श का, उस संदर्भ में जब गृह्य नियम इन कामों से अलग रहने को कहते थे। शास्त्र यही कहता है। साथ में तीन बातें ईमानदारी से कही जानी चाहिए।
पहली, यह ढाँचा उस व्यवस्था का है जिसमें रजस्वला स्त्री रसोई और पूजा-कर्म से अलग रहती थी। वह व्यवस्था आज रखनी है या नहीं, यह परिवारों का अपना निर्णय है।
दूसरी, ग्रंथों में यह दोष लग जाने वाला है, किए जाने वाला नहीं — हर दूसरे कर्मकांडीय स्पर्श-नियम जैसा: अनजाने में, व्यक्ति-निरपेक्ष, विधि से निवृत्त हो जाने वाला। पाप और नैतिक अपराध की जो शब्दावली लोक-प्रचार में इस दिन से चिपक गई है, वह बाद का सामाजिक जमाव है, व्रत की भाषा नहीं।
तीसरी, बहुत सी स्त्रियाँ अशुद्धि वाले पाठ को माने बिना ऋषि पंचमी रखती हैं — ऋषि-तर्पण और कृतज्ञता के दिन के रूप में। यह उसी कर्म के भीतर बैठता है, क्योंकि पूजा सप्तर्षियों और अरुंधती को संबोधित है, दोष को नहीं। और यह काम्य व्रत है; न रखने का कोई निर्धारित परिणाम शास्त्र ने नहीं बताया।
अपामार्ग का दातुन, और जो शास्त्र नहीं बताता
इस दिन की सबसे विशिष्ट परंपरा अपामार्ग से किया जाने वाला स्नान है — वही पौधा जिसे चिरचिटा, लटजीरा या ओंगा कहते हैं। टहनी से दातुन होता है और पत्तियाँ स्नान में ली जाती हैं, परंपरा से 108 की गिनती के साथ, प्रायः मिट्टी और तुलसी सहित।
अपामार्ग ही क्यों? व्रत-पद्धतियाँ विधान करती हैं, कारण नहीं बतातीं — और हम कारण गढ़ेंगे नहीं। बिना गढ़े दो बातें कही जा सकती हैं। एक, इस व्रत से बहुत पहले से अपामार्ग वैदिक शुद्धि-कर्म का सामान्य उपकरण रहा है, गृह्य और श्रौत विधियों में मिलता है। दूसरी, नाम ही एकमात्र स्पष्टीकरण है जो परंपरा देती है — अप और मार्ज, यानी पोंछकर हटाना। यह व्युत्पत्ति है, औषधि-विज्ञान नहीं; अपामार्ग के दातुन का वैज्ञानिक लाभ गिनाने वाला पन्ना वह अपनी ओर से जोड़ रहा है।
ज़्यादातर शहरों में ताज़ा अपामार्ग मिलता नहीं। न मिलने पर घरों में नीम की टहनी ली जाती है, या केवल मिट्टी और तुलसी से स्नान कर लिया जाता है। यह विकल्प आम भी है और स्वीकृत भी।
हल के अन्न का नियम
पूरा व्रत रखने वाले उस अन्न से बचते हैं जो हल चलाकर उपजा हो — जिसमें बैल जुता हो। तर्क सीधा है: दिन का भोजन पशु के श्रम से न चुकाया जाए। उसकी जगह बिना जोते उगने वाला अन्न लिया जाता है — समा या मोरधन, कई घरों में चुनकर लाया गया साग, और दूध, दही, फल; भोजन एक ही बार, मध्याह्न पूजा के बाद। नमक जहाँ लिया जाता है वहाँ प्रायः सेंधा।
नियम अपने भीतर संगत है: परंपरा ऋषियों को हल की उपज पर नहीं, वन जो दे उस पर जीने वाला बताती है — और एक दिन घर वैसा ही खाता है।
यह व्रत परंपरा से कौन रखता है
मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ, और कई समाजों में रजोदर्शन के बाद अविवाहित कन्याएँ भी। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पूरे हिंदी क्षेत्र में यह व्यापक है; दक्षिण में गृहस्थ व्रत के रूप में बहुत कम, यद्यपि वैदिक कर्म करने वाले परिवार इस तिथि पर ऋषि-तर्पण करते हैं। विधवाएँ भी कई घरों में रखती हैं। पुरुष प्रायः उपवास नहीं करते, पर तर्पण किसी ग्रंथ में स्त्रियों तक सीमित नहीं।
2026 में यह दिन भरे हुए हफ़्ते में पड़ रहा है — गणेश चतुर्थी और हरतालिका तीज दोनों सोमवार 14 सितंबर को हैं, यानी अगली सुबह ऋषि पंचमी आते समय गणपति विराजमान हो चुके होंगे। टकराव नहीं है, बस व्रत का भोजन उस रसोई में बनेगा जो पहले से मोदक में लगी है।
2026 में क्या करें
व्रत रखना हो तो: 15 सितंबर 2026, पूजा अपने शहर के मध्याह्न में, अपामार्ग स्नान या उसका विकल्प, फिर बिना हल के उपजे अन्न का एक भोजन, और सप्तर्षियों तथा अरुंधती के नाम तर्पण। यदि आप इसे इसलिए रखती हैं कि घर की स्त्रियाँ सदा रखती आई हैं, तो यही पर्याप्त कारण है। और यदि उस दोष की बात खटकती है जिसे आप अपना अपराध नहीं मानतीं, तो दिन ऋषियों के नाम रखकर उस हिस्से को छोड़ देना आपका अधिकार है। दोनों ही ऋषि पंचमी हैं।