स्कंद षष्ठी 2026: 15 नवंबर को मुरुगन व्रत, सूरसंहारम और तिरुक्कल्याणम — छठ के ही दिन
स्कंद षष्ठी 2026 रविवार, 15 नवंबर को है — कार्तिक शुक्ल षष्ठी 14 नवंबर रात 11:24 से 16 नवंबर देर रात 2:01 तक। छह दिन का कंद षष्ठी व्रत 10 नवंबर से, शाम को सूरसंहारम, 16 नवंबर को तिरुक्कल्याणम। उसी दिन पूर्वी भारत में छठ पूजा है।
स्कंद षष्ठी 2026 रविवार, 15 नवंबर को है। हमारे पंचांग इंजन के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि 14 नवंबर की रात 11:24 से 16 नवंबर की देर रात 2:01 तक है। 15 नवंबर के सूर्योदय पर षष्ठी होने से व्रत इसी दिन है। उसी शाम सूरसंहारम होगा और अगले दिन, 16 नवंबर को, तिरुक्कल्याणम। छह दिन का कंद षष्ठी व्रत 10 से 15 नवंबर तक चलता है। उसी 15 नवंबर को पूर्वी भारत में छठ पूजा है।
स्कंद षष्ठी 2026 की तारीखें एक नज़र में
| क्या | कब | तिथि / नोट |
|---|---|---|
| कंद षष्ठी व्रत का पहला दिन | मंगलवार, 10 नवंबर 2026 | कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (अमावस्या के अगले दिन) |
| स्कंद षष्ठी — मुख्य दिन | रविवार, 15 नवंबर 2026 | कार्तिक शुक्ल षष्ठी; सूर्योदय पर षष्ठी |
| सूरसंहारम | 15 नवंबर, शाम | षष्ठी तिथि शाम तक चलती रहती है |
| तिरुक्कल्याणम | सोमवार, 16 नवंबर 2026 | अगले दिन |
| वृश्चिक संक्रांति / कार्तिगै 1 | 17 नवंबर 2026 | तमिल सौर मास कार्तिगै की शुरुआत |
षष्ठी 14 नवंबर की रात से है, तो व्रत 15 को क्यों?
यह सवाल हर साल उठता है, इसलिए तिथि का हिसाब साफ़ समझ लें। तिथि यानी पंचांग की "तारीख" — महीने के तीस चांद्र दिनों में से एक, जो सूर्य और चंद्र के बीच के कोण से तय होती है। यह आधी रात को नहीं बदलती; घड़ी के किसी भी समय शुरू और खत्म हो सकती है।
व्रत के लिए नियम सरल है। जिस दिन सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, वह दिन उसी तिथि का माना जाता है। इसे उदया तिथि कहते हैं।
- 14 नवंबर: सूर्योदय पर पंचमी है; षष्ठी रात 11:24 पर आती है। इसलिए यह दिन नहीं।
- 15 नवंबर: सूर्योदय (दिल्ली में सुबह 6:44) पर षष्ठी चल रही है। यही स्कंद षष्ठी है।
- 16 नवंबर: षष्ठी देर रात 2:01 पर खत्म हो चुकी; सूर्योदय (6:45) पर सप्तमी है।
एक और बात यहाँ काम की है। 15 नवंबर को षष्ठी सूर्यास्त (दिल्ली में शाम 5:26) के बाद भी देर रात तक चलती रहती है। इसीलिए सूरसंहारम, जो शाम का अनुष्ठान है, व्रत के ही दिन पड़ता है, किसी दूसरे दिन नहीं।
इंजन डेटा: 10, 15 और 16 नवंबर (दिल्ली)
| तारीख | सूर्योदय पर तिथि | तिथि की अवधि | नक्षत्र | सूर्योदय | सूर्यास्त | चंद्रोदय |
|---|---|---|---|---|---|---|
| मंगलवार, 10 नवंबर | शुक्ल प्रतिपदा | 9 नवंबर 12:32 → 10 नवंबर 14:01 | विशाखा (पद 4) | 06:40 | 17:29 | 07:33 |
| रविवार, 15 नवंबर | शुक्ल षष्ठी | 14 नवंबर 23:24 → 16 नवंबर 02:01 | उत्तराषाढ़ा (पद 2) | 06:44 | 17:26 | 11:40 |
| सोमवार, 16 नवंबर | शुक्ल सप्तमी | 16 नवंबर 02:01 → 17 नवंबर 04:19 | श्रवण (पद 2) | 06:45 | 17:26 | 12:16 |
ये समय दिल्ली के हैं; आपके शहर में सूर्योदय-सूर्यास्त कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। तीनों दिन सूर्य तुला राशि में है। चंद्र 10 नवंबर को वृश्चिक में और 15-16 नवंबर को मकर राशि में है।
स्कंद यानी मुरुगन कौन हैं?
परंपरा के अनुसार स्कंद शिव और पार्वती के पुत्र हैं। उत्तर भारत में उन्हें कार्तिकेय कहते हैं; तमिलनाडु में मुरुगन, सुब्रह्मण्य, कंदन और अरुमुगम — छह मुख वाले — नामों से पूजते हैं। उनका अस्त्र वेल (भाला) है, वाहन मोर है, और कथा के अनुसार वे देवताओं की सेना के सेनापति हैं।
नवरात्रि के पाँचवें दिन जिन स्कंदमाता की पूजा होती है, वे इन्हीं स्कंद की माता हैं — पार्वती का मातृ-रूप। स्कंदमाता की पूजा विधि हमारे नवरात्रि पेज पर अलग से है।
कंद षष्ठी का छह दिन का व्रत क्या है?
तमिल परंपरा में स्कंद षष्ठी सिर्फ़ एक दिन नहीं, छह दिन का अनुष्ठान है। यह कार्तिक अमावस्या के अगले दिन — प्रतिपदा — से शुरू होकर षष्ठी को पूरा होता है। 2026 में यह मंगलवार 10 नवंबर से रविवार 15 नवंबर तक है। हमारे इंजन में 10 नवंबर उत्तर भारत में गोवर्धन पूजा का भी दिन है।
व्रत कितना कड़ा रखें, यह भक्त अपनी क्षमता से चुनते हैं। कुछ लोग पूरे छह दिन फलाहार या एक समय भोजन करते हैं; कुछ केवल षष्ठी के दिन उपवास रखते हैं। रोज़ मंदिर दर्शन और कंद षष्ठी कवसम का पाठ इस व्रत का मुख्य अंग है।
कंद षष्ठी कवसम एक तमिल भक्ति-काव्य है। "कवसम" का अर्थ है कवच — यानी यह मुरुगन से रक्षा माँगने वाली स्तुति है। तमिल घरों में इसे इन छह दिनों में विशेष रूप से पढ़ा या सुना जाता है। जिन्हें तमिल नहीं आती, वे मुरुगन या कार्तिकेय का नाम-जप कर सकते हैं।
सूरसंहारम क्या है?
शब्द को तोड़कर देखें: सूर यानी सूरपद्मन नाम का असुर, संहारम यानी संहार। कथा के अनुसार सूरपद्मन ने देवताओं को बंदी बना लिया था। स्कंद ने देवसेना का नेतृत्व किया और छह दिन के युद्ध के बाद षष्ठी के दिन उसका अंत किया।
कथा का अंत मुरुगन की करुणा दिखाता है। अंतिम क्षण में सूरपद्मन आम के वृक्ष का रूप लेता है; वेल उसे दो भागों में बाँट देता है। एक भाग मोर बनकर मुरुगन का वाहन बनता है, दूसरा मुर्गा बनकर उनके ध्वज पर स्थान पाता है। यानी शत्रु का नाश नहीं, रूपांतरण।
तमिलनाडु के मुरुगन मंदिरों में, और सबसे प्रसिद्ध रूप में समुद्र किनारे बसे तिरुचेंदूर में, षष्ठी की शाम इस कथा का नाट्य रूप दिखाया जाता है। मुरुगन की उत्सव-मूर्ति बाहर लाई जाती है और असुरों के रूपों के साथ युद्ध का दृश्य रचा जाता है। भक्त तट पर खड़े होकर इसे देखते हैं। यही सूरसंहारम है।
तिरुक्कल्याणम क्या है?
तिरु यानी पवित्र, कल्याणम यानी विवाह। सूरसंहारम के अगले दिन — 2026 में 16 नवंबर को — मंदिरों में मुरुगन और देवसेना (तमिल में देइवानै) का दिव्य विवाह मनाया जाता है। युद्ध के ठीक बाद विवाह का यह क्रम शांति और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है। पंचांग इसका कोई निश्चित समय नहीं देता; हर मंदिर अपनी परंपरा से इसे आयोजित करता है।
मुरुगन के प्रमुख मंदिर कौन-से हैं?
तमिल परंपरा में मुरुगन के छह प्रमुख धाम हैं, जिन्हें अरुपडै वीडु कहते हैं — अरु यानी छह, पडै यानी सेना, वीडु यानी घर; यानी "छह सैन्य-शिविर"। ये हैं तिरुचेंदूर, पलनी, स्वामिमलै, तिरुत्तणि, तिरुप्परंकुंड्रम और पळमुदिरचोलै।
इनमें तिरुचेंदूर समुद्र तट पर है, और कथा के अनुसार सूरपद्मन से युद्ध समुद्र में ही हुआ था। इसीलिए सूरसंहारम का सबसे प्रसिद्ध आयोजन वहीं होता है। बाकी मंदिरों में, और तमिलनाडु के बाहर जहाँ भी तमिल समाज बसा है, षष्ठी की शाम यही कथा मंचित होती है।
छठ और स्कंद षष्ठी एक ही दिन कैसे?
दोनों की तिथि एक ही है — कार्तिक शुक्ल षष्ठी। पूर्वी भारत में — बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश — इस षष्ठी को छठ मनाया जाता है, जिसमें सूर्य और छठी मैया की पूजा होती है। तमिलनाडु में यही षष्ठी स्कंद षष्ठी है। एक तिथि, दो देवता, दो बिल्कुल अलग परंपराएँ।
इसलिए 15 नवंबर 2026 की शाम दो तस्वीरें एक साथ बनेंगी। गंगा और गंडक के घाटों पर व्रती डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य देंगे। तिरुचेंदूर के तट पर मुरुगन और सूरपद्मन का युद्ध मंचित होगा। नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक छठ का पूरा क्रम (13 से 16 नवंबर) हमारे छठ पूजा 2026 पेज पर है।
एक तारीख और जोड़ लें। 17 नवंबर को सूर्य तुला से वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा। यह वृश्चिक संक्रांति है, और तमिल सौर पंचांग में कार्तिगै मास का पहला दिन। यानी स्कंद षष्ठी के दो दिन बाद तमिल कार्तिगै शुरू हो रहा है।
स्कंद षष्ठी के दिन क्या करें?
- सुबह स्नान के बाद मुरुगन या कार्तिकेय के चित्र के सामने दीप जलाएँ। चित्र न हो तो शिव-पार्वती के साथ उनका स्मरण भी पर्याप्त है।
- उपवास अपनी सेहत के अनुसार रखें — फलाहार, एक समय भोजन, या केवल सात्विक भोजन। बीमार, गर्भवती और बुज़ुर्ग संकल्प और पूजा से भी व्रत निभा सकते हैं।
- कंद षष्ठी कवसम का पाठ करें या सुनें। तमिल न आती हो तो मुरुगन का नाम-जप करें।
- शाम को दीप जलाकर सूरसंहारम की कथा याद करें। मुरुगन मंदिर पास हो तो दर्शन करें।
- सूरसंहारम के बाद अपनी घर-परंपरा के अनुसार व्रत खोलें, और 16 नवंबर को तिरुक्कल्याणम की खुशी में घर पर कुछ मीठा बनाएँ।
15 नवंबर का पूरा पंचांग — तिथि, नक्षत्र, और आपके शहर के अनुसार सूर्योदय-सूर्यास्त — हमारे दैनिक पंचांग पेज पर मिलेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
स्कंद षष्ठी 2026 कब है?
रविवार, 15 नवंबर 2026 को। कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि 14 नवंबर रात 11:24 से 16 नवंबर देर रात 2:01 तक है, और 15 नवंबर के सूर्योदय पर षष्ठी चल रही है।
छह दिन का व्रत कब से शुरू होगा?
मंगलवार, 10 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) से। यह 15 नवंबर को षष्ठी के दिन पूरा होता है।
सूरसंहारम कितने बजे होता है?
15 नवंबर की शाम को। सटीक समय हर मंदिर अपनी परंपरा से तय करता है; पंचांग केवल यह बताता है कि षष्ठी उस शाम चलती रहेगी।
तिरुक्कल्याणम कब है?
अगले दिन, सोमवार 16 नवंबर 2026 को।
क्या छठ और स्कंद षष्ठी की तिथि एक ही है?
हाँ। दोनों कार्तिक शुक्ल षष्ठी को होते हैं, इसलिए 2026 में दोनों 15 नवंबर को हैं।
क्या उत्तर भारत में रहने वाले भी यह व्रत रख सकते हैं?
हाँ। स्कंद यानी कार्तिकेय पूरे भारत में पूजे जाते हैं। घर पर दीप, नाम-जप और सादा उपवास पर्याप्त है; तमिल विधि या कवसम का पाठ जानना ज़रूरी नहीं।