आरती को गोल-गोल क्यों घुमाया जाता है? दीपक की दिशा, गिनती और भाव
घर की आरती में दीपक चरणों से शुरू होकर ऊपर तक जाता है, घड़ी की दिशा में घूमता है, और अंत में हम हाथ से ज्योति लेकर सिर पर रखते हैं। इन तीनों के पीछे परंपरा क्या कहती है, गिनती हर घर में अलग क्यों है, और कहाँ शास्त्र चुप है — यहाँ सीधी-सादी बात।
आरती के समय अक्सर घर में यही सवाल उठता है — दीपक को गोल-गोल घुमाना ज़रूरी क्यों है? सीधे सामने रख देने से क्या बिगड़ जाएगा? और अगर घुमाना ही है तो नीचे से ऊपर की ओर क्यों, और किस दिशा में?
ये सवाल पूछने वाले लोग श्रद्धा में कम नहीं होते। वे बस यह जानना चाहते हैं कि जो हाथ रोज़ यह क्रिया कर रहा है, उसके पीछे कोई भाव है या सिर्फ़ आदत। नीचे वही बात है — जितनी परंपरा में मिलती है उतनी, और जहाँ नहीं मिलती वहाँ साफ़ स्वीकार के साथ।
आरती शब्द आया कहाँ से है?
शब्द की व्युत्पत्ति पर दो व्याख्याएँ प्रचलित हैं। एक — आरात्रिक, यानी वह दीप-क्रिया जो संध्या या रात्रि के समय की जाती है; इसी से बोलचाल में "आरती" बना। दूसरी — आरार्तिक, जिसे "आ" (चारों ओर) और "आर्ति" (दुख, पीड़ा) से जोड़कर पढ़ा जाता है, अर्थात् जो चारों ओर से आर्ति हर ले।
इन दोनों में से कौन-सी मूल है, इस पर विद्वानों में एकमत नहीं है — और ईमानदारी यही है कि किसी एक को अंतिम कहकर बैठ जाना ठीक नहीं। पूजा-पद्धति के ग्रंथों में इस क्रिया का शास्त्रीय नाम प्रायः नीराजन मिलता है, और षोडशोपचार पूजा की सूची में यह एक उपचार के रूप में गिना जाता है। यानी आरती कोई अलग-थलग रस्म नहीं, पूजा के सोलह उपचारों में से एक है — वही जिसमें प्रकाश अर्पित किया जाता है।
दीपक चरणों से शुरू होकर मुख तक क्यों जाता है?
आरती में दीपक नीचे से ऊपर की ओर उठता है — पहले चरण, फिर नाभि, फिर मुख, और अंत में पूरा विग्रह। इसके पीछे का भाव सीधा है: दर्शन भी चरणों से शुरू होते हैं। भक्त पहले चरण छूता है, फिर आँख ऊपर उठाता है। दीपक उसी दृष्टि का प्रतिनिधि बनकर चलता है।
पूजा-पद्धति की पुस्तकों और घरेलू परंपरा में जो गिनती सबसे अधिक प्रचलित है, वह यह है:
- चार बार — चरणों के सामने
- दो बार — नाभि के सामने
- एक बार — मुख के सामने
- सात बार — सर्वांग, यानी पूरे विग्रह पर
कुल चौदह। पर यहाँ एक बात साफ़ कहनी ज़रूरी है — यह "नियम" नहीं, प्रचलित विधि है। यह गिनती किस मूल ग्रंथ में पहली बार आई, इसका कोई निर्विवाद स्रोत नहीं मिलता; यह पद्धति-ग्रंथों और गुरु-परंपरा से चली आई है। कई मंदिरों में गिनती इससे अलग है, कई घरों में गिनती रखी ही नहीं जाती और बस भाव से आरती उतारी जाती है। दोनों में कोई ग़लत नहीं।
घड़ी की दिशा में ही क्यों घुमाते हैं?
दीपक को घड़ी की सुइयों की दिशा में घुमाया जाता है — यही वही भाव है जो प्रदक्षिणा का है। प्रदक्षिणा में हम देवता को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए परिक्रमा करते हैं; "दक्षिण" यहाँ दिशा नहीं, दाहिनी ओर का अर्थ रखता है। आरती में हमारा शरीर स्थिर रहता है और दीपक वह परिक्रमा हमारी ओर से पूरी करता है।
यानी घुमाना कोई तकनीक नहीं, संक्षिप्त परिक्रमा है। जो व्यक्ति भीड़ में या छोटे पूजा-घर में विग्रह के चारों ओर चल नहीं सकता, उसकी परिक्रमा वह छोटा-सा दीपक कर देता है।
यहाँ भी परंपरा एकरूप नहीं। कुछ परंपराओं में दीपक से हवा में ॐ या स्वस्तिक की आकृति बनाई जाती है, केवल वृत्त नहीं। कुछ जगह वृत्त और आकृति दोनों का मेल चलता है। इसे लेकर बहस करने से कोई लाभ नहीं — जिस घर में जो चला आ रहा है, वही उस घर के लिए सही है।
शंख, घंटा और आरती का समय
आरती प्रायः शंखनाद से आरंभ होती है और घंटे-झालर के साथ चलती है। परंपरा इसे मंगल-ध्वनि कहती है — वह नाद जो पूजा के आरंभ की घोषणा करता है और मन को इधर-उधर से समेटकर एक जगह टिकाता है। इससे आगे जाकर ध्वनि-तरंगों या कीटाणुओं जैसे दावे परंपरा नहीं करती, इसलिए हम भी नहीं करेंगे।
समय की बात करें तो घरों में सबसे अधिक प्रचलन प्रातःकाल और संध्या का है। संध्या की आरती को कई परंपराएँ प्रदोष-वेला से जोड़कर देखती हैं, जो सूर्यास्त के आसपास का समय है और स्थान तथा तिथि के अनुसार रोज़ बदलता है — अपने शहर का सटीक समय आज के पंचांग में देखा जा सकता है। मंदिरों में इससे कहीं अधिक आरतियाँ होती हैं — मंगला, शृंगार, राजभोग, संध्या, शयन — और यह क्रम हर संप्रदाय और हर मंदिर की अपनी सेवा-पद्धति से तय होता है।
कपूर की आरती और अंत में हाथ से ज्योति लेना
घी या तेल के दीपक से की गई आरती और कपूर की आरती का भाव थोड़ा अलग माना जाता है। कपूर जलकर पीछे कोई अवशेष नहीं छोड़ता — इसी को परंपरा प्रतीक की तरह पढ़ती है: जैसे कपूर पूरी तरह जलकर विलीन हो जाता है, वैसे ही साधक का अहंकार पूरी तरह गल जाए। दक्षिण भारत के मंदिरों में कर्पूर-आरती या दीपाराधना का यह क्षण दर्शन का चरम माना जाता है, और अक्सर आरती का समापन इसी से होता है।
आरती पूरी होने के बाद थाली भक्तों तक आती है और लोग हाथ ज्योति के ऊपर घुमाकर सिर या आँखों पर लगाते हैं। इसे प्रकाश का प्रसाद मानने की भावना है — जो दीप अभी भगवान के सामने घूमा, उसका स्पर्श अपने ऊपर ले लेना।
यह स्वीकार करना चाहिए कि इस विशेष क्रिया का विस्तृत विधान शास्त्रों में उतना स्पष्ट नहीं मिलता जितना लोक-परंपरा में इसका प्रचलन है। यह श्रद्धा से उपजी परंपरा है, और परंपरा होना ही इसके लिए पर्याप्त कारण है — इसके पीछे कोई गढ़ा हुआ "वैज्ञानिक कारण" जोड़ने की ज़रूरत नहीं।
जो लोग अक्सर ग़लत समझते हैं
कुछ धारणाएँ इतनी दोहराई जाती हैं कि नियम जैसी लगने लगती हैं। इन्हें अलग करके देखिए:
- "चौदह बार ही घुमाना अनिवार्य है।" — यह प्रचलित पद्धति है, अनिवार्यता नहीं। कई परंपराओं में गिनती अलग है और कहीं गिनती है ही नहीं।
- "दिशा उलट गई तो पूजा व्यर्थ।" — परंपरा प्रदक्षिणा-भाव के कारण घड़ी की दिशा कहती है, पर भूल हो जाने को दोष बताकर डराना कहीं नहीं लिखा। ध्यान आने पर सुधार लीजिए, बात वहीं ख़त्म।
- "आरती यानी सिर्फ़ दीपक।" — पंचारती में दीप के साथ जल, वस्त्र, पुष्प और धूप भी अर्पित करने की पद्धति है। दीपक उसका सबसे दिखने वाला हिस्सा भर है।
- "मंदिर वाली विधि ही असली है।" — मंदिर की सेवा-पद्धति विस्तृत होती है क्योंकि वह पूर्णकालिक सेवा है। घर की छोटी आरती उसका घटिया संस्करण नहीं, उसका अपना स्वरूप है।
- "हर क्रिया का कोई छिपा कारण होगा।" — कुछ का होता है, कुछ का नहीं। कई विवरण देश-काल के साथ जुड़ते चले गए। जहाँ कारण अज्ञात है, वहाँ "पता नहीं" कह देना श्रद्धा को कम नहीं करता।
सार यह है कि आरती का घुमाव एक संक्षिप्त प्रदक्षिणा है, और चरणों से मुख तक का क्रम वही है जो दर्शन का क्रम है। गिनती और शैली परंपरा-दर-परंपरा बदलती है, इसलिए अपने घर या गुरु-परंपरा की विधि पर टिके रहना ही ठीक है। जिस भाव से दीपक उठता है, अंततः वही आरती है।