एकादशी लगभग हर 15 दिन में क्यों आती है?
एक ही महीने में एकादशी दो बार क्यों दिखती है, साल में चौबीस कैसे और अधिक मास में छब्बीस क्यों — तिथि की गिनती, चातुर्मास, पारण का नियम और छूट किसे मिलती है, सब एक जगह।
पंचांग खोलिए तो एक ही महीने में एकादशी दो बार दिखाई देती है — एक कृष्ण पक्ष में, एक शुक्ल पक्ष में। दोनों के बीच का अंतर लगभग चौदह-पंद्रह दिन का रहता है। यह न संयोग है, न किसी की सुविधा के लिए बनाया गया नियम। यह सीधे तिथि की गिनती से निकलता है, और एक बार समझ में आ जाए तो पूरे साल का व्रत-कैलेंडर अपने आप साफ हो जाता है।
तिथि क्या है, और ग्यारहवीं ही क्यों
तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच की कोणीय दूरी से बनती है। जैसे-जैसे चंद्रमा सूर्य से आगे बढ़ता है, हर बारह अंश की दूरी पर एक तिथि पूरी होती है। अमावस्या से पूर्णिमा तक पंद्रह तिथियाँ, पूर्णिमा से अमावस्या तक फिर पंद्रह — कुल तीस तिथियों का एक चंद्रमास।
- शुक्ल पक्ष — अमावस्या के बाद चंद्रमा बढ़ता है, प्रतिपदा से पूर्णिमा तक।
- कृष्ण पक्ष — पूर्णिमा के बाद चंद्रमा घटता है, प्रतिपदा से अमावस्या तक।
- दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि एकादशी कहलाती है।
इसीलिए एक चंद्रमास में दो एकादशी आती हैं और दोनों के बीच लगभग पंद्रह दिन का फासला रहता है। “लगभग” इसलिए, क्योंकि तिथि की लंबाई स्थिर नहीं होती — चंद्रमा की गति के अनुसार एक तिथि उन्नीस घंटे की भी हो सकती है और छब्बीस घंटे की भी। यही कारण है कि कभी अंतर चौदह दिन का पड़ता है, कभी सोलह का।
साल में चौबीस — और अधिक मास में छब्बीस
बारह चंद्रमास, हर मास में दो एकादशी, यानी सामान्य वर्ष में चौबीस एकादशी। हर एक का अपना नाम है — उत्पन्ना, मोक्षदा, षट्तिला, कामदा, निर्जला, देवशयनी, पुत्रदा, इंदिरा, प्रबोधिनी और बाकी।
पर चंद्रवर्ष लगभग 354 दिन का होता है और सौरवर्ष लगभग 365 दिन का। यह ग्यारह दिन का अंतर तीन साल में जुड़कर लगभग एक पूरा मास बन जाता है। उसे संतुलित करने के लिए पंचांग में अधिक मास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) जोड़ा जाता है। उस वर्ष तेरह चंद्रमास होते हैं, इसलिए एकादशी भी छब्बीस हो जाती हैं। अधिक मास की दोनों एकादशी के अलग नाम हैं — पद्मिनी (शुक्ल पक्ष) और परमा (कृष्ण पक्ष)।
चातुर्मास की एकादशी — देवशयनी से देव उठनी तक
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी कहते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को देव उठनी या प्रबोधिनी। इन दोनों के बीच के चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। परंपरा में इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्य टाल दिए जाते हैं और व्रत-नियम अधिक कड़ाई से लिए जाते हैं।
2026 में देव उठनी एकादशी 20 नवंबर को है। इसी के साथ चातुर्मास पूरा होता है और विवाह मुहूर्त फिर खुलते हैं। तुलसी विवाह 21 नवंबर (द्वादशी) को और कार्तिक पूर्णिमा 24 नवंबर को है। कुछ क्षेत्रों में तुलसी विवाह द्वादशी को ही होता है, तो कहीं उसे कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन करने की परंपरा है — दोनों चलन शास्त्रसम्मत माने जाते हैं।
इस साल की देव उठनी एकादशी एक दिलचस्प उदाहरण भी है। तिथि 20 नवंबर सुबह 07:14 से शुरू होकर 21 नवंबर सुबह 06:30 पर समाप्त हो जाती है — यानी वह दोनों दिनों के सूर्योदय से चूक जाती है। इसे तिथि-क्षय कहते हैं। ऐसी स्थिति में व्रत उसी दिन लिया जाता है जिस दिन तिथि प्रारंभ होती है, इसलिए 20 नवंबर ही मान्य है। यही वजह है कि तिथि का आरंभ-अंत समय देख लेना ज़रूरी होता है — अपने शहर के अनुसार तिथि और सूर्योदय पंचांग में देखे जा सकते हैं।
पारण — व्रत खोलने का नियम
एकादशी व्रत का पारण अगले दिन होता है, पर मनमाने समय पर नहीं। नियम यह है कि पारण द्वादशी तिथि के भीतर, सूर्योदय के बाद कर लिया जाए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना शास्त्र में ठीक नहीं माना गया।
- द्वादशी का पहला चतुर्थांश हरिवासर कहलाता है; परंपरा में उसके बीत जाने के बाद पारण किया जाता है।
- यदि द्वादशी सूर्योदय के थोड़ी ही देर बाद समाप्त हो रही हो, तो पारण की खिड़की बहुत छोटी रह जाती है — इसीलिए पंचांग में हर एकादशी के साथ पारण का समय अलग से दिया जाता है।
- पारण से पहले स्नान, तुलसी-पूजन और यथाशक्ति दान की परंपरा है।
चावल का निषेध और छूट किसे
एकादशी को चावल न खाने का नियम लगभग हर परंपरा में मिलता है। कहीं यह केवल व्रती पर लागू होता है, तो कहीं पूरा परिवार उस दिन चावल नहीं बनाता। ईमानदारी से कहें तो इसका कोई तर्कसंगत कारण शास्त्र में नहीं दिया गया — पुराणों में इसे एक कथा के रूप में बताया गया है, और परंपरा उसी आधार पर चली आ रही है। जो लोग इसे किसी वैज्ञानिक कारण से जोड़ते हैं, उनके पास भी कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं है।
व्रत के स्वरूप भी अलग-अलग हैं — निर्जला, फलाहार, या एक समय का सात्विक भोजन। कठिनतम रूप ही श्रेष्ठ हो, ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं। परंपरा में जिन्हें छूट दी गई है:
- रोगी और नियमित दवा लेने वाले लोग
- गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ
- छोटे बच्चे और अत्यधिक वृद्ध व्यक्ति
- यात्रा में या भारी शारीरिक श्रम करने वाले लोग
ऐसे में निर्जला की जगह फलाहार, और फलाहार की जगह एक समय का सादा भोजन — यह स्वीकृत विकल्प है। व्रत नियम है, दंड नहीं।
जो लोग अक्सर गलत समझते हैं
- “एकादशी हर महीने की 11 तारीख को होती है।” अंग्रेज़ी तारीख से इसका कोई संबंध नहीं। ग्यारह की गिनती पक्ष की तिथियों की है, कैलेंडर की नहीं।
- “पंचांग में दो दिन एकादशी लिखी है, मतलब पंचांग गलत है।” नहीं। जब तिथि विद्ध हो, तो स्मार्त परंपरा एक दिन लेती है और वैष्णव परंपरा अगले दिन। दोनों की अपनी शास्त्रीय व्यवस्था है; कोई एक गलत नहीं।
- “रात में व्रत खोल लेते हैं।” पारण का समय अगले दिन द्वादशी के भीतर है, एकादशी की रात को नहीं।
- “एकादशी हमेशा चौबीस ही होती हैं।” अधिक मास वाले वर्ष में छब्बीस होती हैं।
- “उत्तर और दक्षिण के पंचांग में एकादशी अलग पड़ती है।” पूर्णिमांत और अमांत पद्धति में मास का नाम बदलता है, एकादशी का दिन नहीं। तिथि की गणना दोनों में एक ही है।
सार
एकादशी हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है, इसलिए एक चंद्रमास में दो बार और सामान्य वर्ष में चौबीस बार आती है — अधिक मास वाले वर्ष में छब्बीस। तिथि की लंबाई घटती-बढ़ती रहती है, इसलिए अंतर कभी चौदह दिन का पड़ता है, कभी सोलह का। व्रत जितना ध्यान माँगता है, उतना ही ध्यान पारण का समय माँगता है — जो अगले दिन द्वादशी के भीतर ही रखना चाहिए।