"बुद्धिहीन तनु जानिके" — हनुमान चालीसा का ये दोहा क्या कहता है?
इस दोहे में तुलसीदास जी खुद को बुद्धिहीन कह रहे हैं, पाठक को नहीं। ये हनुमान चालीसा का दूसरा शुरुआती दोहा है — "बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार"। मतलब: अपने को नासमझ मानकर मैं हनुमान जी को याद करता हूँ; वे मुझे बल, बुद्धि, विद्या दें और मेरे कष्ट-विकार हर लें। भक्ति में यही विनम्रता सबसे बड़ी योग्यता मानी जाती है।
हनुमान चालीसा में चालीस चौपाइयों से पहले दो दोहे आते हैं। पहला दोहा गुरु की वंदना है — "श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि"। दूसरा दोहा यही है, जिसमें तुलसीदास जी अपनी बात सीधे हनुमान जी के सामने रखते हैं।
पूरा दोहा
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
सरल अर्थ — "अपने आपको बुद्धिहीन जानकर मैं पवन-पुत्र हनुमान को याद करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए, और मेरे क्लेश तथा विकार हर लीजिए।"
शब्द-अर्थ
- तनु — शरीर; यहाँ "अपने आप" के भाव में
- सुमिरौं — स्मरण करता हूँ, याद करता हूँ
- पवन-कुमार — पवनदेव के पुत्र, यानी हनुमान जी
- कलेस — क्लेश, दुख-तकलीफ
- बिकार — विकार, मन और शरीर के दोष
बुद्धिहीन कौन है — कवि, पाठक नहीं
यह शब्द तुलसीदास जी ने अपने लिए लिखा है। भक्ति-काव्य में कवि का खुद को छोटा बताना पुरानी परंपरा है; रामचरितमानस में भी वे बार-बार अपनी अयोग्यता कबूल करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि चालीसा पढ़ने वाला बुद्धिहीन है। भाव इतना ही है कि माँगने से पहले हाथ खाली होना चाहिए — जो खुद को भरा हुआ मान ले, उसमें कुछ नया आएगा कहाँ से।
बल, बुद्धि, विद्या — बस यही तीन
ध्यान दीजिए, दोहे में धन नहीं माँगा गया, पद नहीं माँगा गया, किसी का बुरा नहीं माँगा गया। सिर्फ़ तीन चीज़ें — बल, बुद्धि और विद्या। रामचरितमानस के किष्किंधा कांड के अंत में जामवंत हनुमान जी को उनकी भूली हुई शक्ति याद दिलाते हैं, और सुंदरकांड की शुरुआत में हनुमान समुद्र लाँघ जाते हैं। शक्ति भीतर पहले से थी — कमी सिर्फ़ याद दिलाने की थी। इस दोहे की माँग भी वही है।
जो अक्सर गलत समझा जाता है
बहुत लोग इसे चालीसा का आखिरी दोहा मान लेते हैं। आखिरी दोहा अलग है — "पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप"। "बुद्धिहीन तनु जानिके" शुरुआत का दूसरा दोहा है, चौपाइयों से पहले। और हाँ, कुछ प्रतियों में "बल बुधि बिद्या" छपा मिलता है, कुछ में "बल बुद्धि विद्या" — यह अवधी और आज की हिंदी की वर्तनी का फ़र्क़ है, अर्थ एक ही रहता है।