हनुमान चालीसा में 40 ही चौपाई क्यों हैं?

चालीसा का मतलब ही चालीस है — चालीस पदों वाली स्तुति को चालीसा कहते हैं। इसीलिए तुलसीदास की इस अवधी रचना में 40 चौपाइयाँ हैं — इनके पहले 2 दोहे और अंत में 1 दोहा। शिव चालीसा हो या दुर्गा चालीसा, हर चालीसा का नाम इसी गिनती से बना है। पूरा पाठ चंद मिनटों में हो जाता है, इसीलिए यह ज़बानी याद रह जाती है।

“चालीसा” कोई अलग काव्य-शैली नहीं है, गिनती का नाम है। स्तुति-साहित्य में रचनाओं के नाम अक्सर उनके पदों की संख्या पर रखे जाते रहे हैं — आठ पद हों तो अष्टक, सौ हों तो शतक, हज़ार नाम हों तो सहस्रनाम। इसी तरह चालीस पदों की स्तुति चालीसा कहलाई। सवाल का सीधा जवाब यही है: 40 चौपाइयाँ इसलिए हैं क्योंकि रचना का नाम ही चालीस पर टिका है।

पूरा ढाँचा

हनुमान चालीसा में चालीस चौपाइयाँ और तीन दोहे हैं। शुरुआत दो दोहों से होती है — “श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि”, यानी गुरु के चरणों की धूल से मन का दर्पण साफ़ करके; और “बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार”, यानी खुद को बुद्धिहीन मानकर मैं पवनपुत्र को याद करता हूँ। इसके बाद “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर” से चौपाइयाँ शुरू होती हैं। चालीसवीं चौपाई है — “तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय महँ डेरा”, यानी तुलसीदास हमेशा हरि का सेवक है, हे नाथ, मेरे हृदय में बसिए। इसी पंक्ति में कवि ने अपना नाम रखा है। सबसे आख़िर में एक दोहा और आता है — “पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप”।

चालीस ही क्यों — कारण कहीं लिखा है?

नहीं। रचना के भीतर यह कहीं नहीं बताया गया कि चालीस की संख्या क्यों चुनी गई। लोक-मान्यता में चालीस का अंक साधना और मन्नत से जोड़ा जाता है, और चालीस दिन का अनुष्ठान कई परंपराओं में मिलता है। पर यह जोड़ बाद के लोगों का लगाया हुआ है, पाठ का अपना कहा हुआ नहीं। ईमानदार जवाब यही है कि यहाँ नाम और गिनती एक-दूसरे से बँधे हैं।

जो अक्सर ग़लत समझा जाता है

  • गिनते समय कई लोग दोहों को भी चौपाई मान लेते हैं और "43 चौपाइयाँ" बता देते हैं। कुल पद 43 ज़रूर हैं — 40 चौपाई और 3 दोहे — पर चौपाइयाँ चालीस ही हैं। दोहा और चौपाई अलग-अलग छंद हैं।
  • यह कहानी कि तुलसीदास ने चालीसा अकबर की क़ैद में लिखा — यह लोक-कथा है, इसका कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है।
  • रचना का साल भी दर्ज नहीं है। रामचरितमानस के बारे में तुलसीदास ने खुद संवत 1631 लिखा है, हनुमान चालीसा में ऐसी कोई तारीख़ नहीं मिलती।
  • छपे हुए संस्करणों में कहीं-कहीं शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, पर चौपाइयों की गिनती चालीस ही रहती है।

भाषा अवधी है, संस्कृत नहीं — वही भाषा जिसमें रामचरितमानस लिखा गया। शायद यही वजह है कि जिन लोगों ने कभी संस्कृत नहीं पढ़ी, उन्हें भी चालीसा का एक-एक शब्द याद है।

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