अनंत चतुर्दशी 2026 (25 सितंबर): अनंत सूत्र की 14 गांठ का अर्थ, किस हाथ में बांधें और उद्यापन
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी है। अनंत सूत्र की चौदह गांठें और चौदह लोक, पुरुष-स्त्री किस हाथ में बांधें, महाभारत का प्रसंग, चौदह वर्ष का संकल्प और उद्यापन, तथा पिछले वर्ष के सूत्र का क्या करें।
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी है। इस दिन की पूरी पूजा विधि, कौंडिन्य की कथा और राहु काल का टकराव हम अनंत चतुर्दशी 2026 के पहले लेख में लिख चुके हैं। यह लेख सिर्फ़ धागे के बारे में है — अनंत सूत्र, उसकी चौदह गांठें, और उन गांठों के साथ जुड़े चौदह साल।
दिन के आंकड़े
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 24 सितंबर की रात 23:18 से शुरू होकर 25 सितंबर की रात 23:06 पर समाप्त होती है। यानी शुक्रवार का पूरा जागता हुआ दिन तिथि के भीतर है — इस बार किसी छोटी खिड़की के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं। दिल्ली में सूर्योदय 06:11 और सूर्यास्त 18:13। नक्षत्र शतभिषा, योग शूल, चंद्रमा कुम्भ राशि में।
दो आंकड़े याद रखने लायक हैं। राहु काल 10:42 से 12:12 तक है और अभिजित मुहूर्त 11:48 से 12:36 तक — दोनों चौबीस मिनट तक एक-दूसरे पर पड़ते हैं। यदि सूत्र बांधने के लिए अभिजित ही चाहिए तो उसका साफ़ हिस्सा 12:12 से 12:36 है। और यदि इस हिसाब-किताब में पड़ना ही न हो तो पूजा सुबह 10:42 से काफ़ी पहले कर लें — अधिकांश घरों में यही होता है। यहाँ दिए सभी समय दिल्ली/भारतीय मानक समय के हैं; सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए नीचे शहरवार तालिका दी गई है।
अनंत सूत्र आख़िर है क्या
अनंत सूत्र एक साधारण धागा है — सूती या रेशमी, हल्दी से पीला किया हुआ, जिसमें चौदह गांठें लगाई जाती हैं। यह न गहना है, न पूजा के बाद की औपचारिकता। इस व्रत में धागा भगवान के सामने रखा जाता है और उनके साथ पूजा जाता है; बांधना सबसे अंत में आता है — कथा और आरती के बाद। बाज़ार से बना-बनाया सूत्र लाकर बिना पूजा के पहन लेना उसी हिस्से को छोड़ देना है जो उसे अनंत सूत्र बनाता है।
गांठें गिनकर लगाई जाती हैं — चौदह से कम या अधिक नहीं।
चौदह गांठ, चौदह लोक
चौदह की गिनती को चौदह लोकों के रूप में पढ़ा जाता है — वे लोक जिन्हें अनंत रूप में विष्णु धारण किए हुए माने जाते हैं। पुराणों की सामान्य गणना में सात ऊपर और सात नीचे:
| क्रम | ऊर्ध्व लोक | क्रम | अधो लोक |
|---|---|---|---|
| 1 | भूः | 8 | अतल |
| 2 | भुवः | 9 | वितल |
| 3 | स्वः | 10 | सुतल |
| 4 | महः | 11 | तलातल |
| 5 | जनः | 12 | रसातल |
| 6 | तपः | 13 | महातल |
| 7 | सत्य | 14 | पाताल |
व्रत ग्रंथ संख्या और अर्थ दोनों साथ-साथ देते हैं, पर दोनों को जोड़ने वाला कोई तर्क नहीं देते।
किस हाथ में बांधें — और शास्त्र क्या नहीं कहता
देश के अधिकांश हिस्सों में परंपरा यही है: अनंत सूत्र पुरुष दाएँ हाथ में बांधते हैं और स्त्रियाँ बाएँ हाथ में। अविवाहित कन्याएँ प्रायः स्त्रियों वाला नियम ही मानती हैं।
इस पर सीधी बात यह है कि व्रत ग्रंथ हाथ बता देते हैं, कारण नहीं बताते। किसी स्रोत में इसका कोई प्रतीकात्मक या कर्मकांडीय कारण दिया हुआ नहीं मिलता। नाड़ियों, दबाव-बिंदुओं या "वैज्ञानिक लाभ" वाली जो व्याख्याएँ आजकल घूमती हैं, वे आधुनिक जोड़ हैं — शास्त्र उनका समर्थन नहीं करता। ईमानदार उत्तर यही है कि यह परंपरा है: ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि सदा से ऐसा किया जाता रहा है। जिस घर में हमेशा उल्टा चला आ रहा हो, वह घर कुछ ग़लत नहीं कर रहा।
महाभारत का प्रसंग — युधिष्ठिर पूछते हैं, कृष्ण उत्तर देते हैं
कौंडिन्य वाली कथा भीतर की कथा है। बाहर का ढाँचा वह है जो इस व्रत को उसका असली भार देता है।
पांडव वन में हैं, राज्य द्यूत में जा चुका है, और कृष्ण उनसे मिलने आते हैं। युधिष्ठिर वही प्रश्न पूछते हैं जो हर व्रती कभी न कभी पूछता है — जो था वह चला गया और परिश्रम काम करना बंद कर दे, तो मनुष्य क्या करे? कृष्ण कोई छोटा रास्ता नहीं बताते। वे अनंत चतुर्दशी का व्रत बताते हैं — अनंत रूप में विष्णु, चौदह गांठ वाला सूत्र, और हर वर्ष यही क्रम — और फिर युधिष्ठिर को कौंडिन्य की कथा सुनाते हैं: वह ऋषि जिसने धागा आग में डाल दिया, क्योंकि यह मानना उससे सहा नहीं गया कि घर की समृद्धि उसकी विद्या से नहीं, पत्नी के व्रत से आई है।
यह प्रसंग व्रत-कथा साहित्य और भविष्य पुराण की परंपरा से आता है, महाभारत के हर पाठ में यह नहीं मिलता — इसे परंपरा का अपने बारे में कहा हुआ मानिए। पर जो सिखाता है वह एक ही है: यह व्रत उन लोगों का है जिनका कुछ खो चुका है और जो माँगे बिना उसके लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और यह वर्षों का व्रत है, एक दिन का नहीं।
चौदह साल — व्रत का पूरा आकार
अनंत चतुर्दशी परंपरा से चौदह वर्ष का व्रत माना जाता है। संकल्प एक बार लिया जाता है — लगातार चौदह अनंत चतुर्दशियों के लिए; हर वर्ष नया सूत्र पूजकर बांधा जाता है, और चौदहवें वर्ष के अंत में उद्यापन होता है। चौदह की संख्या पूरे व्रत में लौट-लौटकर आती है:
| संख्या कहाँ आती है | गिनती | टिप्पणी |
|---|---|---|
| अनंत सूत्र की गांठें | 14 | मूल आवश्यकता |
| गांठों को जिन लोकों के रूप में पढ़ा जाता है | 14 | 7 ऊर्ध्व, 7 अधो |
| संकल्प के वर्ष | 14 | फिर उद्यापन |
| नैवेद्य, जहाँ गिनती रखी जाती है | 14 | प्रायः 14 पूरियाँ और मिष्ठान्न |
| पांडवों का वनवास | 14 | 13 वर्ष वन, 1 वर्ष अज्ञातवास |
चौदह गांठ और चौदह वर्ष के वनवास का मेल बार-बार जोड़ा जाता है, और जोड़ना बुरा भी नहीं। पर वह अनुगूँज है, सिद्धांत नहीं — किसी ग्रंथ में यह नहीं लिखा कि गांठें वनवास के वर्षों के हिसाब से गिनी गई थीं।
उद्यापन — व्रत का समापन
उद्यापन चौदहवें वर्ष के अंत में, अनंत चतुर्दशी के दिन ही किया जाता है। सामान्य क्रम यह है: दिन की पूजा यथावत, फिर जहाँ परंपरा हो वहाँ हवन, चौदह ब्राह्मणों या चौदह अतिथियों का भोजन, और चौदह वस्तुओं का दान — वस्त्र, अन्न, दक्षिणा — जिसके साथ संकल्प विधिवत छोड़ा जाता है।
व्यवहार में अंतर बहुत है। कई परिवार उद्यापन करते ही नहीं और जीवन भर व्रत रखते हैं, जो स्वीकार्य है; कई उद्यापन के बाद भी व्रत जारी रखते हैं। इनमें से कोई भी दूसरे को अमान्य नहीं करता। यदि आपके घर की अपनी पद्धति है तो उसे मानिए — इंटरनेट पर लिखे किसी भी पन्ने से ऊपर, इस पन्ने से भी।
पिछले साल के सूत्र का क्या करें
पुराना धागा नया बांधने से पहले उतारिए — बाद में नहीं, और दोनों एक साथ एक ही हाथ में नहीं। उसके बाद ये विकल्प मान्य हैं:
- बहते जल में। नदी या सरोवर। इस वर्ष यह सरल है — पुराना सूत्र शाम के विसर्जन के साथ ही जा सकता है।
- घर पर बाल्टी में। विसर्जित कीजिए, फिर वह जल और धागा किसी वृक्ष या तुलसी की जड़ में रख दीजिए।
- पूजा घर में सुरक्षित। कुछ परिवार हर वर्ष का सूत्र सँभालकर रखते हैं और सब एक साथ उद्यापन पर विसर्जित करते हैं।
- चौदह दिन बाद उतार देना। यह भी एक वास्तविक परंपरा है, जिसमें धागा पूरे वर्ष पहना ही नहीं जाता।
यहाँ कोई एक शास्त्रीय नियम नहीं है, और जो कोई कहे कि है — वह बात बढ़ा-चढ़ाकर कह रहा है। सब परंपराएँ एक ही बात पर सहमत हैं: यह धागा कूड़ेदान में नहीं जाता।
सूर्योदय बदलता है, तिथि नहीं
तिथि पूरी पृथ्वी के लिए एक ही क्षण पर शुरू और समाप्त होती है; सूर्योदय ऐसा नहीं करता। इसलिए इस वर्ष पूरे भारत में अनंत चतुर्दशी शुक्रवार, 25 सितंबर को ही है — तिथि पूरा दिन ढँके हुए है — पर राहु काल से पहले वाली सुबह की खिड़की हर शहर में अलग घड़ी पर बंद होती है।
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त | राहु काल |
|---|---|---|---|
| दिल्ली | 06:11 | 18:13 | 10:42 – 12:12 |
| मुंबई | 06:28 | 18:31 | 10:59 – 12:30 |
| कोलकाता | 05:26 | 17:29 | 09:57 – 11:27 |
| चेन्नई | 05:58 | 18:02 | 10:30 – 12:00 |
| बेंगलुरु | 06:09 | 18:12 | 10:40 – 12:11 |
| हैदराबाद | 06:06 | 18:08 | 10:37 – 12:07 |
| अहमदाबाद | 06:30 | 18:32 | 11:00 – 12:31 |
| पुणे | 06:24 | 18:27 | 10:55 – 12:26 |
| लखनऊ | 05:57 | 17:58 | 10:27 – 11:57 |
| पटना | 05:40 | 17:42 | 10:10 – 11:41 |
कोलकाता का सूर्योदय अहमदाबाद से एक घंटे से भी अधिक पहले हो जाता है। अपने शहर के लिए आज का पंचांग और राहु काल देखिए — दिल्ली की घड़ी उधार मत लीजिए।
उसी शाम गणेश विसर्जन
14 सितंबर की स्थापना से शुरू हुआ गणेशोत्सव इसी तारीख़ को पूरा होता है, इसीलिए घर सुबह से व्यस्त रहता है। इसे "दस दिन" चतुर्थी से चतुर्दशी की दूरी के कारण कहा जाता है, हालाँकि 2026 के कैलेंडर पर यह बारह तारीख़ों में फैला है। क्रम साफ़ रखिए: पहले अनंत पूजा, फिर सूत्र बांधना, और उसके बाद ही मूर्ति घर से बाहर। डेढ़, तीन, पाँच, सात और दस दिन वाले विसर्जन की दिनवार सूची गणेशोत्सव 2026 विसर्जन लेख में दी है।
इसके बाद भी पंचांग रुकता नहीं। अगले ही दिन, 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा है और 27 सितंबर से पितृ पक्ष आरंभ हो जाता है। इतने भरे हुए सप्ताह में यदि एक धागा छोटी बात लगे, तो याद रखिए वह है क्या — हर लोक के लिए एक गांठ, चौदह वर्ष तक बांधी हुई, किसी प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के हाथ पर।