चरणामृत और प्रसाद में क्या अंतर है — और पंचामृत इन दोनों से अलग कैसे है?

पूजा के बाद हथेली पर जो कुछ बूँदें रखी जाती हैं — वह चरणामृत है, पंचामृत है, या प्रसाद? ज़्यादातर घरों में तीनों नाम आपस में मिला दिए जाते हैं। यह लेख तीनों का फ़र्क़, लेने का पारंपरिक तरीका और परंपराओं में मौजूद विविधता साफ़-साफ़ बताता है।

पूजा या कथा ख़त्म होते ही पंडित जी कहते हैं — "हाथ आगे कीजिए।" हथेली पर कुछ बूँदें रखी जाती हैं, साथ में एक तुलसी पत्ता। कोई उसे चरणामृत कहता है, कोई पंचामृत, और घर का कोई बच्चा पूछ लेता है — "यह प्रसाद ही तो है ना?" जवाब देने वाले भी अक्सर तीनों शब्द एक ही अर्थ में बोल जाते हैं। असल में ये तीन अलग-अलग चीज़ें हैं, और एक बार फ़र्क़ समझ में आ जाए तो पूजा की पूरी क्रिया कहीं ज़्यादा साफ़ दिखने लगती है।

चरणामृत असल में है क्या

शब्द ही अपना अर्थ बता देता है — चरण + अमृत। यानी वह जल जो देवविग्रह के चरणों का स्पर्श करके आया हो। शास्त्रीय शब्द है पादोदक। मूर्ति, शालिग्राम या विग्रह के अभिषेक के समय जो जल चरणों से होकर बहता है, उसे ताँबे या चाँदी के पात्र में एकत्र कर लिया जाता है — वही चरणामृत है।

ध्यान देने की बात यह है कि चरणामृत की पहचान उसकी सामग्री से नहीं, उसके स्पर्श से होती है। सादा जल हो, गंगाजल हो या पंचामृत — जो भी विग्रह के चरणों से होकर आया, वह चरणामृत कहलाएगा। और जो द्रव्य अलग कटोरी में रखा है, चरणों तक पहुँचा ही नहीं, वह चाहे कितना भी शुद्ध क्यों न हो, चरणामृत नहीं है।

वैष्णव परंपरा में विष्णु के पादोदक की महिमा में यह श्लोक व्यापक रूप से पढ़ा जाता है — "अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णोः पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥" यह पूजा-पद्धतियों और परंपरागत संग्रहों में मिलता है; इसका मूल ग्रंथ अलग-अलग जगह अलग-अलग बताया जाता है, इसलिए किसी एक का नाम निश्चित रूप से देना ठीक नहीं होगा।

पंचामृत तीसरी चीज़ है, चरणामृत का दूसरा नाम नहीं

पंचामृत यानी पाँच द्रव्यों का मेल:

  • दूध
  • दही
  • घी
  • शहद
  • शक्कर (कहीं-कहीं खांड या गुड़)

पूजा-पद्धति का चला आ रहा मंत्र भी यही गिनाता है — "पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करायुतम्। पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥" — यानी पंचामृत मूल रूप से स्नान की सामग्री है। अपने आप में वह न चरणामृत है, न प्रसाद।

उलझन यहीं बनती है। जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि या सत्यनारायण कथा में अभिषेक पंचामृत से ही होता है, और वही सबको बाँटा जाता है। ऐसे में लोग उसे चरणामृत कह देते हैं — और उस अवस्था में यह ग़लत भी नहीं, क्योंकि वह पंचामृत चरणों से होकर आ चुका है। पर जो पंचामृत रसोई में बनाकर अलग रख दिया गया और अभिषेक में गया ही नहीं, वह सिर्फ़ पंचामृत है। भोग लगने पर वह प्रसाद बनेगा, चरणामृत नहीं।

प्रसाद — जो भोग लगने के बाद बनता है

प्रसाद अन्न है। जो भी भोजन, फल, मिठाई या पंजीरी देवता को अर्पित की जाती है, उसे अर्पण के समय नैवेद्य कहते हैं; अर्पित हो जाने के बाद वही प्रसाद कहलाता है। शब्द का मूल अर्थ प्रसन्नता या कृपा है — इसलिए परंपरा में प्रसाद को "बचा हुआ खाना" नहीं, "दिया हुआ" माना जाता है।

व्यवहार का फ़र्क़ सीधा है। चरणामृत पीने की चीज़ है और बूँद भर होती है; प्रसाद खाने की चीज़ है और भरपेट भी हो सकता है। चरणामृत हर पूजा में नहीं होता — वह वहीं बनता है जहाँ अभिषेक हुआ हो। प्रसाद तब भी होता है जब सिर्फ़ भोग लगाया गया हो। घर पर अभिषेक या कथा करानी हो तो पूजा सेवाओं में यह क्रम पहले से तय रहता है, इसलिए दोनों अलग-अलग बाँटे जाते हैं।

चरणामृत लेने का पारंपरिक तरीका

  • दाएँ हाथ से — हथेली थोड़ी कटोरीनुमा, अँगुलियाँ जुड़ी हुईं। बाएँ हाथ को नीचे सहारे के लिए रखा जाता है।
  • तीन बार लेने की परंपरा सबसे प्रचलित है; कई परंपराओं में एक ही बार लिया जाता है। दोनों चलते हैं।
  • मात्रा बहुत थोड़ी — एक चम्मच से ज़्यादा नहीं। इसे पानी की तरह गटकना या दोबारा माँगना परंपरा में उचित नहीं माना जाता।
  • लेते समय सिर थोड़ा झुका, मौन। फूँक मारना या हथेली से गिराना टाला जाता है।
  • तुलसी पत्ता विष्णु से जुड़े चरणामृत में डाला जाता है। परंपरा कहती है कि तुलसी को दाँतों से चबाया नहीं जाता, चरणामृत के साथ निगल लिया जाता है। यह भी ध्यान रहे कि गणपति की पूजा में तुलसी अर्पित करने की परंपरा नहीं है।
  • पात्र आमतौर पर ताँबे या चाँदी का होता है — यह पूजा में शुद्ध माने गए धातुओं की परंपरा है, इससे आगे का कोई कारण गढ़ने की ज़रूरत नहीं।

सबसे ज़्यादा टोका जाने वाला नियम यही है कि चरणामृत लेकर बचा हुआ हाथ सिर पर नहीं पोंछते। उत्तर भारत के बहुत से घरों में बड़े-बुज़ुर्ग यह सख़्ती से कहते हैं। ईमानदारी से लिखूँ तो इसका स्पष्ट कारण मुझे किसी प्रामाणिक ग्रंथ में नहीं मिला — जो कारण सुनाए जाते हैं वे अलग-अलग और परस्पर विरोधी हैं। यह लोक-परंपरा का नियम है, और उसे उसी रूप में मानना ठीक है।

जो लोग अक्सर ग़लत समझते हैं

हर अभिषेक जल चरणामृत की तरह नहीं लिया जाता। कई परंपराओं में शिवलिंग पर चढ़ा जल और सामग्री निर्माल्य मानी जाती है और उसे चंडेश्वर का भाग कहकर ग्रहण नहीं किया जाता। वहीं अनेक मंदिरों और घरों में शिव का अभिषेक जल भी बाँटा जाता है। दोनों परंपराएँ पुरानी हैं — अपने घर या मंदिर के पुरोहित की परिपाटी का पालन कीजिए, किसी एक को "सही" कहकर दूसरे को ख़ारिज करना ठीक नहीं।

सिर पर हाथ फेरने का नियम सब जगह एक-सा नहीं है। दक्षिण भारत के मंदिरों में तीर्थम् लेने के बाद हाथ सिर पर फेरना बिल्कुल सामान्य दृश्य है। जो उत्तर भारत में टोकने लायक़ बात है, वह वहाँ रोज़ का रिवाज़ है।

स्त्री-पुरुष का भेद — चरणामृत लेने की विधि में अधिकांश परंपराओं में कोई अंतर नहीं; दोनों दाएँ हाथ से ही लेते हैं। हाँ, कुछ घरों में रजस्वला अवस्था में स्त्रियाँ पूजा-गृह, प्रसाद और चरणामृत से दूर रहती हैं, और कुछ परंपराओं व संप्रदायों में ऐसा कोई निषेध नहीं है। इस पर मतभेद वास्तविक और पुराना है — यहाँ किसी एक पक्ष को शास्त्रसम्मत बताकर दूसरे को ग़लत ठहराना उचित नहीं होगा।

चरणामृत जूठा नहीं माना जाता। मंदिर में एक ही पात्र से सबको दिया जाता है, इसलिए कुछ लोग झिझकते हैं; परंपरा में इसे उच्छिष्ट नहीं, पवित्र माना गया है।

किसी द्रव्य से परहेज़ हो तो बहुत थोड़ा लेना या हाथ जोड़कर विनम्रता से मना कर देना परंपरा के विरुद्ध नहीं है। विवशता के लिए परंपरा में हमेशा जगह रही है।

छोटा-सा सार

चरणामृत = वह द्रव जो देवता के चरणों से होकर आया; प्रसाद = वह अन्न जिसे भोग लग चुका; पंचामृत = पाँच द्रव्यों की सामग्री, जो अभिषेक में जाए तो चरणामृत बने और भोग लगे तो प्रसाद।

तरीक़ा सीधा है — दाएँ हाथ से थोड़ा-सा, मौन रहकर, तुलसी सहित। बाक़ी नियमों में घर, क्षेत्र और संप्रदाय का फ़र्क़ रहेगा ही; जिस परंपरा में आप पले हैं, उसी का निर्वाह श्रद्धा के साथ करना सबसे ठीक है। तिथि और पूजा-काल देखने हों तो आज का पंचांग देखकर योजना बना सकते हैं।

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