देव उठनी एकादशी 2026: व्रत 20 नवंबर को क्यों, तिथि क्षय का पूरा गणित
देव उठनी एकादशी 2026 शुक्रवार, 20 नवंबर को है। एकादशी तिथि 20 नवंबर 07:14:28 से 21 नवंबर 06:30:14 तक चलती है और दिल्ली के दोनों सूर्योदयों से चूक जाती है — यही तिथि क्षय है। पूरा गणित, पारण का समय और पूर्वी भारत में तारीख़ अलग क्यों बैठती है।
इस साल देव उठनी एकादशी की दो अलग तारीखें कुछ पाठकों तक पहुँचेंगी — किसी पंचांग में 20 नवंबर, किसी में 21 नवंबर। यह छपाई की गलती नहीं है। पीछे एक साफ़ खगोलीय स्थिति है, जिसका नाम है तिथि क्षय। दिल्ली के लिए गणना करें तो एकादशी तिथि 20 और 21, दोनों में से किसी दिन के सूर्योदय को नहीं छूती; वह दोनों सूर्योदयों के बीच से निकल जाती है। नीचे पूरा गणित है, और वह इलाक़ा भी जहाँ यही गणित दूसरा उत्तर देता है।
सीधा उत्तर पहले: देव उठनी एकादशी — जिसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं — शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को है। तुलसी विवाह अगले दिन, शनिवार 21 नवंबर 2026 को द्वादशी में है।
तिथि का समय, सेकंड तक
पर्व कार्तिक शुक्ल एकादशी का है। दिल्ली के लिए तिथि इस तरह चलती है:
- आरंभ: 20 नवंबर 2026, प्रातः 07:14:28
- समाप्ति: 21 नवंबर 2026, प्रातः 06:30:14
- कुल अवधि: 23 घंटे 15 मिनट 46 सेकंड
दिल्ली में 20 नवंबर का सूर्योदय 06:48 पर है और 21 नवंबर का 06:49 पर। इन चार संख्याओं को साथ रखते ही समस्या दिख जाती है।
जब तिथि किसी सूर्योदय को नहीं छूती
| क्षण | समय (दिल्ली) | उस समय कौन-सी तिथि |
|---|---|---|
| सूर्योदय, शुक्रवार 20 नवंबर | 06:48 | शुक्ल दशमी (19 नवंबर 07:05:10 से) |
| एकादशी आरंभ | 20 नवंबर 07:14:28 | सूर्योदय के 26 मिनट 28 सेकंड बाद |
| एकादशी समाप्त | 21 नवंबर 06:30:14 | सूर्योदय से 18 मिनट 46 सेकंड पहले |
| सूर्योदय, शनिवार 21 नवंबर | 06:49 | शुक्ल द्वादशी (21 नवंबर 06:30:14 से) |
चारों पंक्तियाँ दिल्ली के लिए हमारे पंचांग इंजन से सीधे ली गई हैं। एकादशी पहले सूर्योदय से साढ़े छब्बीस मिनट चूकती है और दूसरे से उन्नीस मिनट। बीच में वह तेईस घंटे से अधिक चलती है — पूरा शुक्रवार और शनिवार का तड़का — पर एक बार भी किसी सूर्योदय पर नहीं बैठती।
तिथि क्षय क्या है
तिथि दिन नहीं है। तिथि वह अवधि है जिसमें चंद्रमा सूर्य से बारह अंश आगे निकलता है, और दोनों की चाल एक-सी न होने के कारण यह अवधि लगभग साढ़े इक्कीस घंटे से छब्बीस घंटे के बीच घटती-बढ़ती रहती है। दो सूर्योदयों का अंतर स्थिर चौबीस घंटे रहता है। जब कोई तिथि इस अंतर से छोटी पड़े और ठीक बीच में आ बैठे, तो वह एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले समाप्त हो सकती है — लगभग पूरा दिन उपस्थित, फिर भी उन दो क्षणों पर अनुपस्थित जिन्हें पंचांग गिनता है। ऐसी तिथि क्षय कहलाती है। यहाँ गड़बड़ कुछ नहीं हुई; यही होता है। तिथि चक्र की पूरी बात एकादशी हर पंद्रह दिन में क्यों आती है में है।
तारीख तय करने वाला नियम
एकादशी सामान्यतः सूर्योदयव्यापिनी नियम से तय होती है — जो एकादशी सूर्योदय पर चल रही हो, वही रखी जाती है। इस बार यह नियम लागू ही नहीं हो सकता, क्योंकि कोई सूर्योदय तिथि के भीतर पड़ता नहीं। तिथि-निर्णय की परंपरा उत्तर सीधे देती है: क्षय तिथि में व्रत उस दिन लिया जाता है जिस दिन तिथि आरंभ होती है। एकादशी 20 नवंबर की सुबह आरंभ होती है, इसलिए व्रत उसी दिन।
एक सीधा तरीक़ा भी यही उत्तर देता है। 20 तारीख़ को एकादशी 07:14 से आधी रात तक मौजूद है; 21 को केवल 06:30 तक, यानी अधिकांश घरों के जागने से पहले ही समाप्त। 20 नवंबर तकनीकी बहाना नहीं है — वही दिन है जब तिथि वास्तव में उपस्थित है।
20 नवंबर 2026 का पंचांग, दिल्ली
| अंग | मान |
|---|---|
| वार | शुक्रवार |
| मास / पक्ष | कार्तिक, शुक्ल पक्ष |
| सूर्योदय की तिथि | दशमी (एकादशी 07:14:28 से) |
| नक्षत्र | पूर्व भाद्रपद (चरण 4) |
| योग | हर्षण |
| सूर्योदय / सूर्यास्त | 06:48 / 17:24 |
| चंद्रोदय / चंद्रास्त | 14:17 / 03:02 |
| राहु काल | 10:47 – 12:06 |
ये मान दिल्ली के लिए मापे गए हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय, चंद्रास्त और इसलिए राहु काल हर शहर में बदलते हैं — कोई समय तय करने से पहले अपने नगर का मान देखें।
पूर्वी भारत में गणना अलग क्यों बैठती है
ऊपर का पूरा निष्कर्ष एक ही संख्या पर टिका है — 21 नवंबर को दिल्ली का सूर्योदय 06:49, तिथि समाप्त होने के उन्नीस मिनट बाद। पूर्व की ओर बढ़ते ही यह अंतर मिट जाता है। कोलकाता में उसी दिन सूर्योदय लगभग 05:53 पर है — एकादशी के भीतर, जब तिथि में सैंतीस मिनट शेष हैं। वहाँ यह तिथि क्षय है ही नहीं, और कड़े सूर्योदयव्यापिनी पाठ से एकादशी शनिवार 21 नवंबर को बैठती है।
| नगर | सूर्योदय, 21 नवंबर 2026 | एकादशी के भीतर? (समाप्ति 06:30:14) |
|---|---|---|
| गुवाहाटी | 05:45 (अनुमानित) | हाँ |
| कोलकाता | 05:53 (अनुमानित) | हाँ |
| भुवनेश्वर | 05:59 (अनुमानित) | हाँ |
| चेन्नई | 06:10 (अनुमानित) | हाँ |
| पटना | 06:11 (अनुमानित) | हाँ |
| वाराणसी | 06:19 (अनुमानित) | हाँ |
| लखनऊ | 06:30 (अनुमानित) | कहना संभव नहीं |
| दिल्ली | 06:49 (मापा हुआ) | नहीं |
| मुंबई | 06:49 (अनुमानित) | नहीं |
| जयपुर | 06:51 (अनुमानित) | नहीं |
| अहमदाबाद | 06:57 (अनुमानित) | नहीं |
यह टिप्पणी अवश्य पढ़ें। तालिका में केवल दिल्ली की पंक्ति हमारे इंजन से मापी गई है। शेष सभी समय मानक सौर गणना से अनुमानित हैं, इंजन से पढ़े हुए नहीं। अंतर कितना हो सकता है? वही गणना दिल्ली के लिए 06:48 देती है, जबकि इंजन 06:49 मापता है — इसलिए हर अनुमानित पंक्ति में लगभग एक मिनट की ढील मानकर चलें। लखनऊ का मान तो तिथि की समाप्ति से कुछ ही सेकंड के भीतर बैठता है — इसे कोई अनुमान तय नहीं कर सकता। वहाँ अपने नगर का पंचांग देखें।
इससे दो बातें निकलती हैं। उत्तर-पश्चिम और पश्चिम भारत में तिथि क्षय साफ़ है और तारीख़ भी — 20 नवंबर। पूर्वी भारत में, और नवंबर की सूर्य क्रांति के कारण दक्षिण के बड़े भाग में भी, ऐसा नहीं है; वहाँ बना पंचांग उचित कारणों से 21 नवंबर छाप सकता है। आपके हाथ का पंचांग कुछ और कहे तो कारण यही है, और ऐसे में स्थानीय परंपरा ही मानें।
पारण कब करें
पारण द्वादशी में होता है, जो 21 नवंबर को 06:30:14 पर आरंभ होकर 22 नवंबर 04:55:24 तक चलती है। इसलिए 20 तारीख़ का व्रत रखने वालों का पारण शनिवार 21 नवंबर को सूर्योदय 06:49 के बाद है; तिथि के बीच में बीत जाने का ख़तरा नहीं।
एक परंपरा इसे सीमित करती है — बहुत से घर हरि वासर, यानी द्वादशी का पहला चौथाई भाग छोड़ते हैं। इस द्वादशी की अवधि 22 घंटे 25 मिनट है; चार से भाग देने पर यह चौथाई 21 नवंबर को लगभग 12:07 पर समाप्त होता है। यह संख्या ऊपर दिए तिथि समयों से गणित द्वारा निकाली गई है, किसी मुहूर्त तालिका से पढ़ी नहीं। छपे पंचांग अक्सर इससे भिन्न अवधि देते हैं, इसलिए अंतिम समय अपने पंचांग से लें।
चातुर्मास समाप्त, और विवाह मुहूर्त पर ईमानदार बात
नाम में ही उत्तर है — देव उठनी, देवता उठते हैं। मान्यता है कि आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से आरंभ हुई चार मास की योगनिद्रा से विष्णु इसी तिथि पर जागते हैं, और चातुर्मास का शुभ कार्यों पर लगा विराम भी उठ जाता है। तुरंत बाद द्वादशी में, 21 नवंबर 2026 को, तुलसी विवाह होता है — तुलसी और शालिग्राम का वह विवाह जिससे विवाह का मौसम खुलता है। घर में तुलसी हो तो तुलसी घर में पवित्र क्यों मानी जाती है पढ़ें।
अब वह बात जो त्योहार की सूचियाँ छोड़ देती हैं। मौसम का खुलना विवाह की तारीख़ के लिए आवश्यक है, पर्याप्त नहीं। मुहूर्त के लिए गुरु और शुक्र का उदित होना — अस्तंगत न होना — भी आवश्यक है, साथ में उपयुक्त तिथि, नक्षत्र, लग्न और वर-वधू की कुंडली। अस्त की अवधि हर वर्ष बदलती है, और हम ऐसी तिथियाँ नहीं छापेंगे जिनकी गणना हमने स्वयं न की हो। 20 नवंबर से मौसम खुला मानिए; तारीख़ के लिए ग्रहों के उदय-अस्त वाला पंचांग देखें।
व्रत का दिन कैसे बीतता है
विधि सामान्य एकादशी जैसी है, कार्तिक के रंग के साथ। अन्न और चावल छोड़े जाते हैं — कारण हमने एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते में लिखा है। उपवास निर्जला से लेकर एक बार फल-दूध तक कुछ भी हो सकता है; वृद्ध, रोगी और दवा लेने वाले बिना संकोच हल्का विकल्प चुनें। संध्या को तुलसी या घर के मंदिर के पास रंगोली बनती है, दीप जलते हैं, गन्ना, सिंघाड़ा, आँवला और मौसम का पहला फल अर्पित होता है, और घर पुकारकर विष्णु को जगाता है। यह कार्तिक की दो बड़ी दीप-रातों में से एक है; दूसरी कार्तिक पूर्णिमा, 24 नवंबर 2026।
जो शास्त्र नहीं बताता
अंत में एक ईमानदारी। पुराण कहते हैं कि विष्णु चातुर्मास भर शयन करते हैं और इसी तिथि पर जागते हैं। वे यह नहीं बताते कि चार ही मास क्यों, और यही तिथि क्यों। वर्षा और खेती वाली एक व्याख्या इंटरनेट पर घूमती है, जो सामाजिक इतिहास के रूप में सही हो सकती है, पर वह शास्त्र का कथन नहीं है और हम उसे शास्त्र बनाकर नहीं परोसेंगे। तारीख़ सेकंड तक गिनी जा सकती है; कारण कहा गया है, सिद्ध नहीं — यह मान लेना कुछ गढ़ लेने से बेहतर है।
आसपास के दिनों के लिए दैनिक पंचांग देखें। अगली एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में पड़ती है, जो अभी हमारे इंजन की परिधि से बाहर है — उसके लिए अपने पंचांग में देखें।