मंदिर में प्रवेश करते ही घंटी क्यों बजाते हैं?

घंटी क्यों बजाते हैं — बिना गढ़े हुए विज्ञान के, सिर्फ़ आगम परंपरा और उन अपवादों के साथ जहाँ घंटा बजाया ही नहीं जाता।

मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते ही हाथ अपने आप ऊपर उठ जाता है और घंटी बज उठती है। बच्चा साथ हो तो वही पूछ बैठता है — "घंटी क्यों बजाई?" और अक्सर जवाब मिलता है, "बजाते हैं, बस।" यह सवाल इतना सीधा है कि इसका उत्तर किसी ने ठीक से सोचा ही नहीं। तो चलिए, जितना शास्त्र और परंपरा में सचमुच मिलता है, उतना देखते हैं — और जहाँ कारण नहीं मिलता, वहाँ साफ कह देते हैं कि नहीं मिलता।

घंटा मंदिर की पूजा-विधि का अंग है, सजावट नहीं

घंटा कोई बाद में जुड़ी हुई चीज़ नहीं है। दक्षिण भारत की मंदिर-पद्धतियाँ मुख्य रूप से आगम ग्रंथों पर टिकी हैं — वैखानस और पांचरात्र आगम वैष्णव मंदिरों में, शैव आगम शिव मंदिरों में। उत्तर भारत में ऐसी एक ग्रंथ-बद्ध आगमिक प्रणाली हर जगह नहीं है; वहाँ अधिकतर पौराणिक विधि और हर संप्रदाय की अपनी सेवा-पद्धति चलती है। लेकिन दोनों में देवता की दिनचर्या का ढाँचा मिलता-जुलता है: सुप्रभात, अभिषेक, अलंकार, नैवेद्य, दीपाराधना, शयन — और घंटा इन्हीं उपचारों के बीच बजता है, विशेषकर नैवेद्य और आरती (दीपाराधना) के समय।

यानी मंदिर में घंटे की जगह पूजा-क्रम के भीतर है। दरवाज़े पर लटका घंटा भक्त के लिए उसी क्रम में शामिल होने का एक छोटा-सा द्वार है।

"घंटा नाद" का भाव — सूचना भी, और ध्यान भी

घंटे के साथ एक श्लोक बहुत प्रचलित है —

  • आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्।
    कुर्वे घण्टारवं तत्र देवताह्वानलाञ्छनम्॥

अर्थ — "देवताओं के आगमन के लिए और अशुभ के जाने के लिए मैं घंटा बजाता हूँ; यह देवता को बुलाने का चिह्न है।" ईमानदारी से एक बात जोड़नी चाहिए: यह श्लोक पूजा-पद्धति की पुस्तिकाओं और परंपरा से चला आ रहा है, पर इसका कोई निश्चित मूल ग्रंथ बताना कठिन है। अधिकतर जगह यह बिना संदर्भ के ही उद्धृत होता है। इसलिए इसे परंपरा का मंत्र कहिए, किसी वेद-वाक्य की तरह मत पेश कीजिए।

भाव दो हैं, और दोनों सुंदर हैं। पहला — सूचना: जैसे किसी के घर जाकर हम दरवाज़ा खटखटाते हैं, वैसे ही भक्त अपने आने की सूचना देता है। दूसरा — ध्यान का मुड़ना: घंटे की आवाज़ के साथ बाहर की बातें एक क्षण के लिए कट जाती हैं और मन गर्भगृह की ओर मुड़ता है। यह अनुभव की बात है, कोई मापी हुई चीज़ नहीं — और इसे अनुभव की तरह ही कहना चाहिए।

घंटे पर गरुड़, नंदी या चक्र क्यों बना होता है

हाथ में पकड़े जाने वाले घंटे को ध्यान से देखिए। उसकी मूठ पर कोई आकृति होती है, और वह आकृति मंदिर के देवता से जुड़ी होती है:

  • विष्णु मंदिरों में गरुड़ — इसीलिए इसे कई जगह "गरुड़ घंटा" कहते हैं।
  • शिव मंदिरों में नंदी।
  • कहीं-कहीं चक्र, शंख या हनुमान की आकृति भी मिलती है।

कारण सीधा है — मूठ पर देवता का वाहन या चिह्न बैठाकर पूरा घंटा उसी देवता की सेवा का उपकरण बन जाता है। पूजा-पुस्तिकाओं में घंटे के हिस्सों — उसका शरीर, उसकी जिह्वा (लोलक), उसकी मूठ — को अलग-अलग दैवी तत्वों से जोड़ने वाली एक प्रतीक-व्याख्या भी मिलती है। यह भी अधिकतर बिना किसी मूल ग्रंथ के संदर्भ के उद्धृत होती है, इसलिए इसे प्रतीक-दृष्टि की तरह लीजिए, प्रमाण की तरह नहीं।

हर मंदिर में घंटी नहीं बजती — यह अपवाद ज़रूरी है

यह वह हिस्सा है जो अक्सर छूट जाता है। "मंदिर गए तो घंटी बजाना ही है" — यह मान लेना ठीक नहीं।

  • दक्षिण भारत के कई आगमिक मंदिरों में भक्त घंटा नहीं बजाता। वहाँ घंटा अर्चक के हाथ में रहता है और गर्भगृह के भीतर, नैवेद्य-दीपाराधना के समय बजता है। श्रद्धालु हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। उत्तर भारत का "प्रवेश करते ही घंटी बजाना" वहाँ का रिवाज़ नहीं है — गलत नहीं, बस अलग है।
  • शयन के बाद घंटा नहीं बजाया जाता। जिन मंदिरों में शयन आरती के बाद पट बंद होते हैं, वहाँ भाव यही है कि देवता विश्राम में हैं — अब आवाज़ नहीं। कई वैष्णव सेवा-पद्धतियों में यह बहुत कड़ाई से निभाया जाता है।
  • कुछ सेवा-पद्धतियों में घंटे की जगह दूसरे वाद्य हैं — झालर, शंख, करताल। हर परंपरा का अपना ध्वनि-क्रम है।
  • कई मंदिर प्रशासन ने भीड़ के कारण घंटी बजाने से मना कर रखा है — दर्शन-पंक्ति में धक्का-मुक्की न हो, इसलिए। बोर्ड लगा हो तो उसका पालन करना ही मंदिर-मर्यादा है।

निचोड़ यह कि घंटा नियम नहीं, पद्धति है। जिस मंदिर में जो पद्धति है, वही ठीक है।

जो बातें लोग अक्सर गलत समझते हैं

  • "घंटी की आवाज़ से कीटाणु मर जाते हैं" / "उसकी फ्रीक्वेंसी शरीर को ठीक करती है।" यह आधुनिक गढ़ी हुई बात है। किसी शास्त्र में यह नहीं है, और विज्ञान भी ऐसा नहीं कहता। परंपरा को ऐसे झूठे सहारे की ज़रूरत नहीं — भाव अपने आप में पर्याप्त है।
  • "घंटी बजाकर भगवान को जगाना है।" यह बात उलटी है। मंदिर की पद्धति में देवता को जगाने का अपना समय और अपनी सेवा है (सुप्रभात/मंगला)। भक्त की घंटी अपने आने की सूचना है, किसी को नींद से उठाना नहीं।
  • "घंटी नहीं बजाई तो दर्शन अधूरा रह गया।" ऐसा कहीं नहीं लिखा। बहुत से मंदिरों में तो भक्त घंटा छूता तक नहीं, और दर्शन पूरा ही माना जाता है।
  • ज़ोर से बजाना ज़्यादा पुण्य नहीं देता। कितनी बार बजे — इसका कोई शास्त्रीय नियम नहीं मिलता; जहाँ भक्त घंटा बजाता है वहाँ का सामान्य शिष्टाचार यही है कि एक बार, स्थिर हाथ से बजाकर आगे बढ़ जाएँ। बार-बार खींचकर बजाना श्रद्धा नहीं, बाकी दर्शनार्थियों के लिए असुविधा है।

घर के मंदिर में क्या करें

घर की पूजा में घंटी का रिवाज़ घर-घर अलग है, और तीनों तरीके चलते हैं — कोई आरती के समय बजाता है, कोई केवल शंख बजाता है, और कई परिवारों में घंटी होती ही नहीं। जहाँ बजाई जाती है, वहाँ आम तौर पर धूप-दीप और आरती के समय बाएँ हाथ में घंटी रहती है और दाएँ हाथ में दीप। नैवेद्य के बाद, शयन-भाव में उसे रोक देना भी उसी परंपरा का हिस्सा है।

व्रत, आरती या किसी विशेष पूजा का समय तय करना हो तो दिन का पंचांग देख लेना सुविधाजनक रहता है — आज का पंचांग पर तिथि, नक्षत्र और शुभ मुहूर्त एक ही जगह मिल जाते हैं।

सार: घंटा मंदिर की पूजा-पद्धति का अंग है — आने की सूचना, और मन को भीतर मोड़ने का संकेत। उसकी मूठ पर बना गरुड़ या नंदी बताता है कि वह किसकी सेवा में है। और सबसे ज़रूरी बात — हर जगह घंटी बजाना अनिवार्य नहीं; जिस मंदिर की जो पद्धति है, उसे मान लेना ही सच्चा शिष्टाचार है।

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