वसु बारस 2026: 5 नवंबर की शाम — गोवत्स द्वादशी पर गाय-बछड़े की पूजा से दिवाली की शुरुआत

वसु बारस यानी गोवत्स द्वादशी 2026 में गुरुवार 5 नवंबर की शाम मनाई जाएगी। कार्तिक कृष्ण द्वादशी 5 नवंबर 10:36 से 6 नवंबर 10:31 तक है और यह पूजा प्रदोष (शाम) में होती है; कुछ कैलेंडर 6 नवंबर छापते हैं, वजह नीचे है।

वसु बारस यानी गोवत्स द्वादशी 2026 में गुरुवार, 5 नवंबर की शाम को मनाई जाएगी। कार्तिक कृष्ण द्वादशी 5 नवंबर सुबह 10:36 पर शुरू होकर 6 नवंबर सुबह 10:31 तक रहती है। यह पूजा प्रदोष, यानी सूर्यास्त के बाद की शाम में होती है, और 5 नवंबर को सूर्यास्त (दिल्ली में 17:32) के समय द्वादशी चल रही होती है। इसलिए हमारा पंचांग इंजन 5 नवंबर देता है। कुछ कैलेंडर 6 नवंबर छापते हैं; उसकी वजह नीचे साफ की है।

वसु बारस 2026 की तारीख कैसे तय हुई?

पहले तीन शब्द समझ लें। तिथि चंद्र कैलेंडर का दिन है। यह अंग्रेज़ी तारीख की तरह आधी रात को नहीं बदलती; दिन में किसी भी समय शुरू या खत्म हो सकती है। द्वादशी पक्ष की बारहवीं तिथि है, और मराठी-गुजराती में इसी को "बारस" कहते हैं। गोवत्स का मतलब है गाय (गो) और उसका बछड़ा (वत्स)।

गोवत्स द्वादशी प्रदोष काल का व्रत है। प्रदोष यानी सूर्यास्त के ठीक बाद का समय। नियम सीधा है: जिस शाम सूर्यास्त पर द्वादशी चल रही हो, उसी शाम गाय-बछड़े की पूजा होती है।

2026 में यह गणित ऐसे बैठता है। समय दिल्ली के हैं; आपके शहर में कुछ मिनट का फर्क हो सकता है।

दिनसूर्योदय पर तिथिद्वादशीसूर्यास्तशाम को तिथि
गुरुवार, 5 नवंबरकृष्ण एकादशी10:36 पर शुरू17:32द्वादशी — वसु बारस
शुक्रवार, 6 नवंबरकृष्ण द्वादशी10:31 पर समाप्त17:31त्रयोदशी — धनतेरस

5 नवंबर की शाम द्वादशी है, इसलिए वसु बारस उसी शाम। 6 नवंबर की शाम तक त्रयोदशी लग चुकी होती है, जो धनतेरस की तिथि है। यानी दोनों पर्व अलग-अलग शाम पड़ते हैं और क्रम साफ रहता है।

उस दिन का बाकी पंचांग भी देख लें। 5 नवंबर को सूर्योदय 06:36, नक्षत्र उत्तरा फाल्गुनी (पहला चरण), सूर्य तुला राशि में और चंद्रमा सिंह राशि में। 6 नवंबर को सूर्योदय 06:37, नक्षत्र हस्त और चंद्रमा कन्या राशि में।

वसु बारस से दिवाली का सप्ताह कैसे शुरू होता है?

महाराष्ट्र और गुजरात में दिवाली धनतेरस से नहीं, उससे एक दिन पहले वसु बारस से शुरू मानी जाती है। घर की पहली रंगोली और पहला दीया इसी शाम लगता है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी यही दिन गोवत्स द्वादशी के नाम से मनाया जाता है। 2026 में पूरा क्रम इस तरह है:

पर्व2026 की तारीखक्षेत्रीय नाम
गोवत्स द्वादशीगुरुवार 5 नवंबर (शाम)महाराष्ट्र: वसु बारस; गुजरात: वाघ बारस; कर्नाटक, आंध्र-तेलंगाना: गोवत्स द्वादशी
धनतेरसशुक्रवार 6 नवंबरधनत्रयोदशी
नरक चतुर्दशी7 नवंबर रात / 8 नवंबर सुबह (इंजन लेबल: 8 नवंबर)गुजरात: काली चौदस
लक्ष्मी पूजारविवार 8 नवंबरदिवाली
गोवर्धन पूजामंगलवार 10 नवंबरबलि प्रतिपदा
भाई दूजबुधवार 11 नवंबरभाई दूज

इस क्रम की खूबी देखिए: सप्ताह की शुरुआत घर के पशु की सेवा से, बीच में धन और लक्ष्मी की पूजा, और अंत भाई-बहन के रिश्ते पर। दिवाली सिर्फ दीयों का त्योहार नहीं, घर के हर रिश्ते का त्योहार है।

ध्यान दें: 9 नवंबर को इस क्रम का कोई पर्व नहीं पड़ता, इसलिए लक्ष्मी पूजा और गोवर्धन के बीच एक दिन का अंतर है। नरक चतुर्दशी की रात-सुबह वाली गिनती और हर दिन का पूरा ब्योरा दिवाली 2026 के पाँच दिन के कैलेंडर में है। अगले दिन की तैयारी के लिए धनतेरस 2026 और यम दीपम का समय देखें।

वसु बारस की पूजा कैसे करें?

पूजा का समय 5 नवंबर को सूर्यास्त के बाद है, दिल्ली में 17:32 के बाद। विधि सरल है और घर पर हो जाती है:

  1. शाम को गाय और उसके बछड़े को साफ पानी से नहलाएँ या गीले कपड़े से पोंछें।
  2. दोनों के माथे पर हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाएँ और गेंदे की माला पहनाएँ।
  3. गेहूँ और मूँग का भोग लगाएँ। यही इस दिन का पारंपरिक नैवेद्य है; कई घरों में अंकुरित मूँग दी जाती है।
  4. दीया जलाकर गाय-बछड़े की आरती करें और परिवार के लोग परिक्रमा करें।
  5. घर के दरवाज़े पर दिवाली की पहली रंगोली बनाएँ और दीया रखें।

कुछ छोटी बातें ध्यान रखें। पूजा में गाय और बछड़ा साथ-साथ रहें, दोनों को अलग न करें। दीया और अगरबत्ती जानवरों से थोड़ी दूरी पर रखें। भोग हाथ से धीरे-धीरे खिलाएँ, ढेर लगाकर नहीं। बच्चों को भी तिलक लगाने और खिलाने में शामिल करें, यही इस दिन की सीख है।

व्रत रखने वाली महिलाएँ इस दिन दूध, दही, घी जैसी दूध से बनी चीज़ें नहीं खातीं। परंपरा के अनुसार आज गाय का दूध उसके बछड़े के लिए है। इसीलिए भोग में गेहूँ-मूँग है, दूध की मिठाई नहीं।

गुजरात में इसी दिन को वाघ बारस कहते हैं। वहाँ व्यापारी परिवारों में साल के बही-खाते इसी दिन "बंद" करने की परंपरा है, ताकि दिवाली नए हिसाब के साथ आए।

वसु बारस की कथा क्या है?

कथा के अनुसार यह दिन नंदिनी गाय से जुड़ा है। नंदिनी को कामधेनु की संतान माना जाता है, जो वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में रहती थी और जिसे साक्षात् गौ-माता का रूप कहा गया। मान्यता है कि जो इस द्वादशी को गाय और बछड़े की एक साथ पूजा करता है, उस पर नंदिनी की कृपा रहती है। इसीलिए इस पूजा में गाय अकेली नहीं होती, बछड़ा साथ होता है।

कथा का संदेश सीधा है: गाय को माँ मानकर उसका आभार, और माँ-बच्चे के रिश्ते का सम्मान। दिवाली जैसे बड़े त्योहार की शुरुआत घर के सबसे शांत प्राणी की सेवा से होती है, यही वसु बारस की पहचान है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कुछ कैलेंडर वसु बारस 6 नवंबर को क्यों लिखते हैं?

क्योंकि 6 नवंबर के सूर्योदय (06:37) पर द्वादशी चल रही है। बहुत से पंचांग हर तिथि को उदया तिथि नियम से लिखते हैं, यानी जो तिथि सूर्योदय पर हो, वही पूरे दिन की तिथि मानी जाती है। इस नियम से द्वादशी का "दिन" 6 नवंबर है। लेकिन वसु बारस की पूजा शाम को होती है, और 6 नवंबर की शाम तक द्वादशी 10:31 पर खत्म होकर त्रयोदशी लग चुकी है। इसलिए शाम की पूजा के लिए 5 नवंबर बैठता है। आपको दोनों तारीखें छपी मिलेंगी; हमारा इंजन इस पूजा के लिए प्रदोष नियम मानता है।

परिवार 6 नवंबर मानता है तो क्या करें?

घर की परंपरा का सम्मान करें। बस इतना ध्यान रखें कि 6 नवंबर को द्वादशी सुबह 10:31 तक ही है। उस दिन पूजा करनी हो तो सुबह 10:31 से पहले करना तिथि के हिसाब से ठीक रहेगा; शाम को धनतेरस की त्रयोदशी होगी।

इस दिन दूध-दही क्यों नहीं खाते?

यह व्रत रखने वालों की परंपरा है, सबके लिए नियम नहीं। मान्यता यह है कि जिस दिन गाय को माँ के रूप में पूजा जाता है, उस दिन उसका दूध उसके बछड़े का हक़ है। इसलिए व्रती महिलाएँ दूध से बनी चीज़ें छोड़ती हैं और गेहूँ-मूँग जैसा सादा भोजन करती हैं।

गाय पास न हो तो पूजा कैसे करें?

शहरों में कई घर मिट्टी की गाय-बछड़े की प्रतिमा या उनका चित्र रखकर यही पूजा करते हैं। हल्दी-कुमकुम, माला, गेहूँ-मूँग का भोग और आरती, विधि वही रहती है। हो सके तो उस दिन किसी गौशाला में चारा पहुँचा दें।

वसु बारस और गोवत्स द्वादशी एक ही हैं?

हाँ। गोवत्स द्वादशी संस्कृत नाम है, वसु बारस मराठी नाम और वाघ बारस गुजराती नाम। तिथि एक, पूजा एक, बस नाम राज्य के साथ बदलता है।

क्या वसु बारस दिवाली का पहला दिन है?

महाराष्ट्र और गुजरात में हाँ। वहाँ दिवाली का सप्ताह 5 नवंबर की इस शाम से शुरू होकर 11 नवंबर भाई दूज पर पूरा होता है। बीच में 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट है। उत्तर भारत के ज़्यादातर घरों में दिवाली की गिनती धनतेरस से होती है, इसलिए वहाँ यह दिन कम जाना जाता है; पर गौ-सेवा की भावना से इसे कोई भी मना सकता है।

तो 5 नवंबर की शाम, सूर्यास्त के बाद, गाय-बछड़े को हल्दी-कुमकुम लगाइए, गेहूँ-मूँग खिलाइए और पहला दीया जलाइए। दिवाली यहीं से शुरू होती है। अपने शहर का सूर्यास्त और उस शाम की तिथि आप हमारे दैनिक पंचांग में देख सकते हैं।

सभी लेख / All articles · आज का राशिफल · आज का पंचांग