गुरुवार व्रत विधि 2026: बृहस्पति व्रत कैसे करें, पीले वस्त्र, केले की पूजा, क्या खाएं और कथा

गुरुवार व्रत बृहस्पति देव और भगवान विष्णु का व्रत है। परंपरा में 16 गुरुवार का संकल्प आम है और इसे किसी भी गुरुवार से शुरू कर सकते हैं — अगला गुरुवार 10 सितंबर 2026 है। पीले वस्त्र, चना दाल-गुड़, केले के पेड़ की पूजा, कथा और उद्यापन की पूरी विधि यहाँ।

गुरुवार व्रत बृहस्पति देव और भगवान विष्णु का व्रत है। परंपरा में 16 गुरुवार का संकल्प सबसे आम है और इसे किसी भी गुरुवार से शुरू किया जा सकता है — अगला गुरुवार 10 सितंबर 2026 है। विधि सीधी है: सुबह स्नान, पीले वस्त्र, केले के पेड़ की हल्दी से पूजा, चना दाल और गुड़ का भोग, कथा, और दिन में एक बार सात्विक (सादा, शुद्ध) भोजन। नीचे हर कदम, खाने के नियम, कथा, उद्यापन और सितंबर–नवंबर 2026 के सभी गुरुवार की तारीखें दी हैं।

गुरुवार व्रत किसका है और क्यों रखा जाता है?

बृहस्पति देवताओं के गुरु माने जाते हैं। ज्योतिष परंपरा में गुरु (बृहस्पति ग्रह, अंग्रेज़ी में Jupiter) ज्ञान, शिक्षा, विवाह, संतान और धर्म का कारक माना जाता है — कारक यानी वह ग्रह जिससे कोई विषय जोड़ा जाता है। गुरुवार उनका दिन है, इसलिए यह व्रत बृहस्पति व्रत भी कहलाता है।

भगवान विष्णु भी गुरुवार के देवता माने जाते हैं। इसीलिए कई घरों में इस दिन विष्णु की पूजा मुख्य होती है और बृहस्पति देव का स्मरण साथ में किया जाता है। गुरु ग्रह के महत्व और उससे जुड़ी मान्यताओं पर विस्तार से यहाँ पढ़ें।

कितने गुरुवार रखें और कब शुरू करें?

परंपरा में 16 गुरुवार का संकल्प सबसे आम है। संकल्प यानी पूजा से पहले मन में या बोलकर लिया गया वचन कि कितने व्रत करेंगे और किस भाव से। कुछ लोग कम या ज़्यादा गुरुवार का संकल्प लेते हैं, और कुछ इसे आजीवन रखते हैं।

शुरू करने के लिए कोई भी गुरुवार चुन सकते हैं; अगला गुरुवार 10 सितंबर 2026 है। कुछ घरों में शुरू करने का महीना भी परंपरा से तय होता है — इसलिए घर के बड़ों या अपने गुरु से एक बार पूछ लेना सबसे अच्छा है।

गुरुवार व्रत की विधि: कदम-दर-कदम

  1. स्नान और पीले वस्त्र: सुबह स्नान करें और पीले या हल्के पीले कपड़े पहनें — पीला बृहस्पति और विष्णु दोनों का रंग माना जाता है।
  2. संकल्प: पहले गुरुवार को हाथ में जल लेकर संकल्प लें — कितने गुरुवार का व्रत और किस भाव से। बाद के गुरुवारों में सिर्फ़ स्मरण काफ़ी है।
  3. पूजा स्थान: साफ़ जगह पर पीला कपड़ा बिछाएँ। भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की तस्वीर या प्रतिमा रखें।
  4. केले के पेड़ की पूजा: केले के पेड़ की जड़ में जल दें। हल्दी, पीले फूल, चना दाल और गुड़ अर्पित करें। तने पर हल्दी का तिलक करें और पीला धागा बाँध सकते हैं। पेड़ घर में न हो तो मंदिर के पेड़ की पूजा करें, या घर पर ही विष्णु-बृहस्पति की पूजा पूरी करें — पेड़ के बिना व्रत अधूरा नहीं माना जाता।
  5. दीपक और भोग: दीपक जलाएँ। चना दाल और गुड़ का भोग लगाएँ — ये दोनों इस व्रत के मुख्य भोग हैं।
  6. कथा: गुरुवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें (संक्षेप नीचे है)। परिवार साथ बैठे तो और अच्छा।
  7. आरती और प्रार्थना: विष्णु और बृहस्पति देव की आरती करें। मन की बात सरल शब्दों में कहें; किसी तय मंत्र-संख्या की ज़रूरत नहीं।
  8. भोजन: कई घरों में दिन में एक बार, अक्सर शाम को पूजा के बाद, पीला सात्विक भोजन लिया जाता है। कुछ लोग फलाहार करते हैं।

कुछ घरों में गुरुवार को बाल धोना और कपड़े धोना नहीं किया जाता। यह परंपरा है, अनिवार्य नियम नहीं — आपके घर में ऐसा चलन न हो तो चिंता न करें।

गुरुवार व्रत में क्या खाएँ और क्या न खाएँ?

विषयपरंपरा के अनुसार
चना दाल और गुड़मुख्य भोग; भोग के बाद प्रसाद रूप में खा सकते हैं
पीला भोजनहल्दी वाला सादा भोजन — दाल, चावल, रोटी
फल और दूधफलाहार करने वालों के लिए
भोजन का समयकई घरों में दिन में एक बार, अक्सर शाम को पूजा के बाद
केलापेड़ की पूजा होती है, इसलिए कई परिवार इस दिन केला खाने से बचते हैं; घर की परंपरा देखें
न खाएँप्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा — यानी तामसिक भोजन

व्रत का मतलब खुद को कष्ट देना नहीं है। बच्चे, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ या दवा ले रहे लोग सिर्फ़ पूजा करें और सामान्य सात्विक भोजन लें — यह भी व्रत ही माना जाता है।

गुरुवार व्रत कथा (संक्षेप में)

कथा के अनुसार एक राजा हर गुरुवार व्रत रखता और दान करता था। रानी को यह पसंद नहीं था — उसे यह सब व्यर्थ लगता था। रानी की बात मानकर राजा ने दान और व्रत बंद कर दिए।

धीरे-धीरे राजा के दिन कठिन हो गए और उसे परदेस जाकर मेहनत करनी पड़ी। वहाँ उसने एक बूढ़ी माँ को गुरुवार व्रत करते और कथा सुनाते देखा। कथा सुनकर राजा ने फिर से व्रत शुरू किया। कथा कहती है कि इसके बाद उसके दिन धीरे-धीरे फिर सुधरे और वह अपने राज्य लौटा।

कथा का सार साफ़ है — श्रद्धा, दान और नियम को बीच में न छोड़ें, और छूट जाए तो फिर से जोड़ लें। कथा के कई स्थानीय रूप हैं; अपने घर की पोथी से पढ़ें।

साईं बाबा का गुरुवार व्रत अलग परंपरा है

शिरडी के साईं बाबा के भक्त भी गुरुवार को व्रत रखते हैं। यह एक अलग, आधुनिक परंपरा है — इसकी विधि, कथा और उद्यापन बृहस्पति व्रत से अलग हैं। अगर आप साईं परंपरा से जुड़े हैं तो उसी की विधि अपनाएँ; दोनों को मिलाने की ज़रूरत नहीं। इस लेख की विधि बृहस्पति-विष्णु व्रत की है।

उद्यापन कैसे करें?

उद्यापन यानी व्रत का विधिवत समापन। जिस गुरुवार आपका संकल्प पूरा हो — 16 गुरुवार के संकल्प में सोलहवाँ — उस दिन सामान्य पूजा थोड़े विस्तार से करें:

  • स्नान, पीले वस्त्र, केले के पेड़ और विष्णु-बृहस्पति की पूजा — रोज़ की तरह।
  • कथा पूरी पढ़ें और आरती करें।
  • चना दाल, गुड़ और पीले भोजन का भोग लगाएँ; परिवार के साथ प्रसाद लें।
  • सामर्थ्य के अनुसार पीली वस्तुएँ — चना दाल, गुड़, पीला वस्त्र — श्रद्धा से किसी को भेंट करें। यह भाव की बात है, मात्रा की नहीं।

उद्यापन के बाद व्रत जारी रखना या न रखना आपकी इच्छा है। घर या गुरु की परंपरा में उद्यापन की अलग रीति हो तो वही अपनाएँ।

आगामी गुरुवार: सितंबर–नवंबर 2026 की तारीखें

ये तारीखें हमारे पंचांग इंजन से जाँची गई हैं। उसी दिन पड़ने वाला दूसरा पर्व साथ में लिखा है।

क्रमगुरुवारउस दिन और क्या
110 सितंबर 2026—
217 सितंबर 2026कन्या संक्रांति (सूर्य का कन्या राशि में प्रवेश)
324 सितंबर 2026गुरु प्रदोष (प्रदोष व्रत गुरुवार को पड़ना)
41 अक्टूबर 2026—
58 अक्टूबर 2026—
615 अक्टूबर 2026—
722 अक्टूबर 2026—
829 अक्टूबर 2026करवा चौथ
95 नवंबर 2026रमा एकादशी
1012 नवंबर 2026—
1119 नवंबर 2026—
1226 नवंबर 2026—

10 सितंबर से 16 गुरुवार का संकल्प लें तो 26 नवंबर तक 12 गुरुवार पूरे होंगे; बाकी चार इसके बाद आएँगे। 29 अक्टूबर को करवा चौथ भी है — दोनों व्रत रखने वाली महिलाएँ प्रायः करवा चौथ के नियम मुख्य रखती हैं और गुरुवार की पूजा सरल रूप में करती हैं। 5 नवंबर को रमा एकादशी है — एकादशी विष्णु का दिन माना जाता है, इसलिए कई लोग उस गुरुवार को विशेष मानते हैं। हर गुरुवार का सूर्योदय, तिथि और शुभ समय हमारे दैनिक पंचांग में देख सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कोई गुरुवार व्रत छूट जाए तो क्या करें?

घबराने की कोई बात नहीं। यात्रा, स्वास्थ्य या मासिक धर्म के कारण कोई गुरुवार छूट जाए तो परंपरा गिनती आगे बढ़ाने की अनुमति देती है — अगले गुरुवार से वहीं से जारी रखें जहाँ रुके थे। कुछ घर छूटा गुरुवार अंत में जोड़ लेते हैं। श्रद्धा से आगे बढ़ें, यही काफ़ी है।

क्या सोमवार और गुरुवार दोनों व्रत एक साथ रख सकते हैं?

हाँ, कई लोग रखते हैं। दोनों के देवता और भोग अलग हैं, इसलिए पूजा अलग-अलग करें। सोमवार व्रत की विधि और तारीखों के लिए सोमवार व्रत कैलेंडर देखें। शरीर पर ज़्यादा बोझ न डालें।

क्या गुरुवार व्रत से कुंडली का गुरु ठीक होता है?

ज्योतिष परंपरा में गुरुवार गुरु ग्रह का दिन है और यह व्रत गुरु से जुड़ा माना जाता है। इसे श्रद्धा और अनुशासन के रूप में देखें — किसी ग्रह-स्थिति में तय बदलाव की गारंटी नहीं दी जा सकती। गुरु ग्रह और उससे जुड़ी सामान्य मान्यताओं पर यह लेख पढ़ें।

अंत में एक बात फिर — इस लेख की विधि सामान्य है। आपके घर या गुरु की रीति इससे अलग हो तो वही मानें।

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