हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज में क्या अंतर है? 2026 की तीनों तारीखें: 15 अगस्त, 31 अगस्त, 14 सितंबर

तीन तीज, तीन पखवाड़े: हरियाली (श्रावण शुक्ल, 15 अगस्त 2026), कजरी (भाद्रपद कृष्ण, 31 अगस्त) और हरतालिका (भाद्रपद शुक्ल, 14 सितंबर)। कौन रखती है, उपवास कितना कड़ा, और नीमड़ी-झूला-कजरी गीत की रीतियों का आमने-सामने मिलान।

सावन-भादों में "तीज" नाम से तीन अलग व्रत आते हैं, और हर साल वही उलझन — कौन-सी कब है, कौन रखती है, कौन-सी निर्जला है और किसमें झूला-कजरी चलती है। 2026 में पंचांग से तारीखें ये हैं: हरियाली तीज 15 अगस्त (शनिवार) बीत चुकी; कजरी तीज 31 अगस्त (सोमवार); हरतालिका तीज 14 सितंबर (सोमवार)। यह लेख तीनों का आमने-सामने मिलान है — तिथि, क्षेत्र, उपवास की कड़ाई और रीति का फ़र्क़; अलग-अलग पूजा-विधि पर पहले के लेख यहाँ दोहराए नहीं गए हैं।

तीनों तीज एक नज़र में

हरियाली तीजकजरी तीजहरतालिका तीज
तिथिश्रावण शुक्ल तृतीयाभाद्रपद कृष्ण तृतीयाभाद्रपद शुक्ल तृतीया
2026 में दिनशनिवार, 15 अगस्त (बीत चुकी)सोमवार, 31 अगस्तसोमवार, 14 सितंबर
तृतीया का काल (दिल्ली)14 अग॰ 18:48 → 15 अग॰ 17:3030 अग॰ 09:37 → 31 अग॰ 08:5113 सित॰ 07:10 → 14 सित॰ 07:08
उस दिन सूर्योदय (दिल्ली)05:5105:5906:06
दूसरे नामछोटी तीज, श्रावणी तीज, सिंधारा तीजबड़ी तीज, कजली तीज, सातुड़ी तीजहरितालिका (महाराष्ट्र), "तीज" (नेपाल)
मुख्य क्षेत्रराजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेशराजस्थान (बूंदी-हाड़ौती), मध्य प्रदेश, बुंदेलखंड, पूर्वांचल, बिहारउत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, नेपाल
उपवासप्रायः फलाहार; कई घरों में केवल पूजा-उत्सवराजस्थान में प्रायः निर्जला, चंद्र-दर्शन के बाद पारण; अन्यत्र फलाहारनिर्जला, तीनों में सबसे कठोर; अगली सुबह पारण
पहचान की रीतिझूला, मेहंदी, हरी चूड़ी-साड़ी, सिंधारानीमड़ी माता पूजा, सत्तू, गाय-पूजा, चंद्र-अर्घ्य, कजरी गीतरेत या मिट्टी के शिव-पार्वती, सोलह शृंगार, कथा, रात्रि जागरण

सभी समय दिल्ली/IST के हैं। सूर्योदय हर शहर में कुछ मिनट आगे-पीछे होता है; जहाँ तिथि सूर्योदय के आसपास बदल रही हो, वहाँ अपने शहर का तिथि कैलेंडर देखकर ही निर्णय करें।

तिथि का गणित: तीनों तृतीया, पर पक्ष और माह अलग

तीनों तृतीया को हैं — इसीलिए "तीज"। फ़र्क़ बस किस माह की कौन-सी तृतीया: हरियाली श्रावण शुक्ल की; कजरी भाद्रपद कृष्ण की (रक्षाबंधन की पूर्णिमा के तीन दिन बाद — पूर्णिमांत गणना; अमांत पंचांग इसी पखवाड़े को "श्रावण कृष्ण" लिखते हैं, तिथि वही रहती है); हरतालिका भाद्रपद शुक्ल की, गणेश चतुर्थी से सटी। 2026 में चतुर्थी 14 सितंबर 07:08 से 15 सितंबर 07:45 तक है, इसलिए मध्याह्न-व्यापिनी नियम से गणेश चतुर्थी भी 14 सितंबर को ही है — इस साल हरतालिका और गणेश स्थापना एक ही दिन।

दिन तय करने का नियम तीनों में उदया तिथि है। कजरी पर देखिए: तृतीया 30 अगस्त को 09:37 पर लगती है, सूर्योदय 05:59 पर हो चुका था — 30 अगस्त द्वितीया में उगा; 31 के सूर्योदय पर तृतीया चल रही है (08:51 तक), इसलिए व्रत 31 अगस्त। हरतालिका पर वही तर्क — 13 सितंबर को तृतीया सूर्योदय के बाद 07:10 पर लगती है, 14 के सूर्योदय पर मौजूद है — इसलिए 14। 13 बनाम 14 की पूरी बहस अलग लेख में है; इतना जोड़ दें कि धर्मशास्त्र-निबंध हरतालिका के लिए चतुर्थी-युक्त तृतीया को द्वितीया-युक्त से श्रेष्ठ बताते हैं, और 14 सितंबर वही दिन है। व्यावहारिक बात: 14 को तृतीया सुबह 07:08 पर समाप्त हो जाती है, इसलिए "तृतीया के भीतर" प्रातः-पूजा की खिड़की बहुत छोटी है; प्रदोष में पूजा करने वाले परिवार अपनी परंपरा से करें — शास्त्र इस पर एक-मत नहीं।

कौन रखती है कौन-सी तीज

तीनों "सुहाग" के व्रत कहे जाते हैं, पर पालन करने वाला वर्ग अलग है। हरियाली — विवाहित और अविवाहित दोनों; नई ब्याही बेटी का पहला सावन मायके में, ससुराल से "सिंधारा" (वस्त्र, मेहंदी, घेवर) आता है — इसीलिए पंजाब-हरियाणा में सिंधारा तीज या "तीयाँ"। यह व्रत से ज़्यादा उत्सव है। कजरी — मुख्यतः सुहागिनें, राजस्थान, बुंदेलखंड, पूर्वांचल में; कुछ घरों में कुँवारी लड़कियाँ भी। हरतालिका — सुहागिनों का सबसे कठोर व्रत; उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल में अविवाहित कन्याएँ भी रखती हैं; नेपाल में तो यही स्त्रियों का सबसे बड़ा पर्व है। कर्नाटक में इसी तिथि को स्वर्ण गौरी व्रत (गौरी हब्बा) होता है — अलग व्रत, तिथि भर साझा।

निर्जला या फलाहार: कड़ाई का क्रम

क्रम साफ़ है: हरतालिका > कजरी > हरियाली

  • हरतालिका — निर्जला, लगभग चौबीस घंटे। कथा में पार्वती की कठोर तपस्या है और उसी की अनुकृति में जल तक नहीं; रात जागरण, अगली सुबह विसर्जन के बाद पारण। यही इसका मूल स्वरूप है।
  • कजरी — राजस्थान में प्रायः निर्जला, चंद्रमा को अर्घ्य देकर पारण; 31 अगस्त को दिल्ली में चंद्रोदय रात 20:25 पर है। पारण सत्तू से — चना या जौ का सत्तू घी-गुड़ में साना — इसी से "सातुड़ी तीज"। बुंदेलखंड-पूर्वांचल में फलाहारी रूप अधिक। तिथि और सामान्य महत्व पर पहले का लेख देखें।
  • हरियाली — शास्त्र में निर्जला का कोई विधान नहीं मिलता; प्रायः फलाहार, शाम की पार्वती-पूजा के बाद भोजन। कई घरों में उपवास है ही नहीं — केवल पूजा, झूला, गीत।

गर्भवती, रोगी या वृद्ध स्त्रियों से निर्जला का आग्रह शास्त्र स्वयं नहीं करता; फलाहार या केवल पूजा से व्रत का भाव पूरा माना जाता है।

नीम, झूला और कजरी गीत: रीति का असली फ़र्क़

नीमड़ी माता — कजरी तीज की पहचान

राजस्थान की बड़ी (कजरी) तीज का केंद्र "नीमड़ी माता" हैं। मिट्टी की छोटी वेदी में नीम की टहनी रोपी जाती है, पास में मिट्टी की तलैया में जल, घी का दीपक; शाम को रोली-अक्षत और सत्तू का भोग, फिर गाय की पूजा और चंद्रोदय पर अर्घ्य के बाद पारण। नीम ही क्यों — इसका कोई शास्त्रीय कारण नहीं दिया गया है; यह विशुद्ध लोक-परंपरा है, और इसे वैसे ही स्वीकार करना ठीक है, "वैज्ञानिक लाभ" गढ़ने की ज़रूरत नहीं।

झूला — हरियाली तीज की जान

आम-नीम की डालों पर झूले, हरी चूड़ियाँ, लहरिया, मेहंदी — सब सावन की हरियाली की अनुकृति; जयपुर की "तीज माता की सवारी" इसी दिन निकलती है। कजरी पर कहीं-कहीं झूला होता है, पर केंद्र नहीं; हरतालिका पर झूले की परंपरा ही नहीं — वह उपवास, कथा और जागरण का व्रत है।

कजरी गीत — नाम किसका?

"कजरी" सावन-भादों की लोकगीत-शैली है — पूर्वांचल (मिर्ज़ापुर, वाराणसी) और बिहार में पूरे मानसून में गाई जाती है, हरियाली तीज के झूलों पर भी यही गीत। कजरी तीज का नाम इसी से जुड़ा माना जाता है — कुछ मिर्ज़ापुर के "कजली वन" की कथा से, कुछ काले बादलों से; व्युत्पत्ति तय नहीं है। हरतालिका पर गीत नहीं, कथा है — हर+आलिका, सखी द्वारा पार्वती का हरण, ताकि विवाह उनकी इच्छा से हो।

रेत के शिव-पार्वती — हरतालिका की विशेषता

नदी की रेत या काली मिट्टी से शिव-पार्वती-गणेश की प्रतिमाएँ, सोलह शृंगार, कथा, रात भर जागरण, अगली सुबह विसर्जन। यह रचना-पूजन न हरियाली में है, न कजरी में।

भूगोल: एक नाम, अलग-अलग तीज

"असली तीज" कौन-सी है — उत्तर प्रदेश वाली और राजस्थान वाली अलग जवाब देंगी, और दोनों सही होंगी। राजस्थान तीनों मनाता है, पर ज़ोर हरियाली (जयपुर) और बड़ी तीज (बूंदी का कजली तीज मेला) पर। उत्तर प्रदेश-बिहार-झारखंड में हरियाली और हरतालिका दोनों बड़ी, कजरी पूर्वांचल-बुंदेलखंड में। पंजाब-हरियाणा में सावन की तीज ही मुख्य; महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ और नेपाल में हरतालिका ही "तीज" है। हरियाली इस साल बीत चुकी; उसकी विधि-कथा इस लेख में है।

अक्सर उठने वाले भ्रम

  • क्या कजरी और हरतालिका एक ही हैं? नहीं — दोनों भाद्रपद में, पर एक कृष्ण पक्ष में, दूसरी शुक्ल में; बीच में पूरा पखवाड़ा।
  • क्या तीनों रखना ज़रूरी है? नहीं। कोई शास्त्र तीनों का एक साथ विधान नहीं करता; परिवार की परंपरा ही मानक है।
  • क्या कजरी-हरतालिका पर भी मेहंदी, हरी चूड़ी? हाँ — सुहाग-चिह्न तीनों में समान; अंतर उपवास और पूजा-रूप में है।

सार

तीनों तीज तृतीया की हैं, पर तीन अलग पखवाड़ों की: हरियाली (श्रावण शुक्ल, 15 अगस्त 2026, बीत चुकी), कजरी (भाद्रपद कृष्ण, 31 अगस्त), हरतालिका (भाद्रपद शुक्ल, 14 सितंबर)। कड़ाई में हरतालिका सबसे ऊपर (निर्जला), कजरी बीच में (राजस्थान में निर्जला, सत्तू से पारण), हरियाली सबसे हल्की। पहचान — हरियाली का झूला, कजरी की नीमड़ी और सत्तू, हरतालिका के रेत के शिव-पार्वती और जागरण। दिन उदया-तिथि से; सीमांत मामलों में अपने शहर का पंचांग देखें।

क्षेत्र-परंपरा के अनुसार विधि और कड़ाई में अंतर हो सकता है; अपने कुल-पुरोहित या स्थानीय पंचांग को अंतिम प्रमाण मानें।

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