लक्ष्मी पूजा के 5 सरल मंत्र अर्थ के साथ — दिवाली 2026 (8 नवंबर) पर कैसे और कब बोलें

दिवाली 2026 की लक्ष्मी पूजा रविवार 8 नवंबर को प्रदोष काल (दिल्ली 17:30–19:54) में है। पाँच सरल मंत्र — ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः से लेकर या देवी सर्वभूतेषु तक — अर्थ, उच्चारण और पूजा में सही क्रम के साथ।

दिवाली की लक्ष्मी पूजा रविवार, 8 नवंबर 2026 को है। पूजा में बोलने के लिए पाँच सरल मंत्र हैं — ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः, ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः, लक्ष्मी गायत्री, कमले कमलालये मंत्र और देवी सूक्तम् का "या देवी सर्वभूतेषु" श्लोक। ये स्थापना के बाद और आरती से पहले बोले जाते हैं। नीचे हर मंत्र का शब्द-दर-शब्द अर्थ, उच्चारण और पूजा में उसका सही स्थान दिया है।

दिवाली 2026 पर लक्ष्मी पूजा कब है?

हमारे पंचांग इंजन के अनुसार लक्ष्मी पूजा रविवार, 8 नवंबर 2026 को प्रदोष काल में है। प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद का लगभग ढाई घंटे का समय। दिल्ली में सूर्यास्त 17:30 पर है, इसलिए प्रदोष काल लगभग 17:30 से 19:54 तक रहेगा। दूसरे शहरों में सूर्यास्त थोड़ा अलग होता है, इसलिए यह समय कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।

विवरण (दिल्ली)8 नवंबर 2026, रविवार
सूर्योदय06:39
सूर्यास्त17:30
प्रदोष काल (लक्ष्मी पूजा)लगभग 17:30 – 19:54
तिथिकृष्ण चतुर्दशी 11:28 तक, फिर अमावस्या
नक्षत्रस्वाति (पद 1)
सूर्य / चंद्र राशितुला / तुला

उस दिन सूर्योदय पर चतुर्दशी तिथि है, जो 11:28 तक रहती है; उसके बाद अमावस्या लगती है। इसी कारण 8 नवंबर की सुबह छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी) और शाम को लक्ष्मी पूजा, दोनों एक ही दिन हैं। 8 या 9 नवंबर की उलझन पर अलग लेख है: दिवाली 2026: लक्ष्मी पूजा 8 या 9 नवंबर, किस दिन और क्यों। स्थिर लग्न और चौघड़िया का पूरा ब्यौरा लक्ष्मी पूजा मुहूर्त 2026 में है।

लक्ष्मी पूजा के 5 मंत्र, अर्थ के साथ

मंत्र पढ़ने से पहले दो शब्द समझ लें। बीज मंत्र यानी एक अक्षर का छोटा मंत्र, जैसे "श्रीं" — परंपरा में इसे लक्ष्मी का बीज माना गया है। नमः का सीधा अर्थ है "प्रणाम"।

1. ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

उच्चारण: ओम् श्रीम् महालक्ष्म्यै नमः

अर्थ: ॐ — प्रणव, आदि ध्वनि। श्रीं — लक्ष्मी का बीज। महालक्ष्म्यै — महालक्ष्मी को। नमः — प्रणाम। पूरा अर्थ: "महालक्ष्मी को प्रणाम।"

उच्चारण की सावधानी: "महालक्ष्म्यै" में अंत का "म्यै" एक ही झटके में बोलें, "म-यै" अलग-अलग नहीं। "नमः" के अंत में हल्की "ह" की साँस निकलती है।

कब बोलें: यह सबसे सरल मंत्र है। पूजा में हर सामग्री — जल, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य — अर्पित करते समय यही एक मंत्र बोल सकते हैं।

2. ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः

उच्चारण: ओम् ह्रीम् श्रीम् लक्ष्मीभ्यो नमः

अर्थ: ह्रीं — शक्ति का बीज। श्रीं — लक्ष्मी का बीज। लक्ष्मीभ्यो — लक्ष्मी के सभी रूपों को। नमः — प्रणाम। पूरा अर्थ: "लक्ष्मी के सभी रूपों को प्रणाम।"

उच्चारण की सावधानी: "ह्रीं" में "ह" और "र" जुड़े हैं — "हरीं" नहीं, "ह्रीं"। "भ्यो" भी एक साथ बोलें।

कब बोलें: आवाहन के समय, यानी जब माता को पूजा में पधारने की प्रार्थना करते हैं। इसे माला से जप के लिए भी चुन सकते हैं।

3. लक्ष्मी गायत्री मंत्र

ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्

उच्चारण: ओम् महालक्ष्म्यै च विद्महे, विष्णुपत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्

अर्थ: महालक्ष्म्यै च विद्महे — हम महालक्ष्मी को जानें। विष्णुपत्न्यै च धीमहि — विष्णु की पत्नी का हम ध्यान करते हैं। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् — वह लक्ष्मी हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। पूरा अर्थ: "हम महालक्ष्मी को जानें, विष्णुपत्नी का ध्यान करें; वह लक्ष्मी हमें सन्मार्ग की प्रेरणा दें।"

उच्चारण की सावधानी: "विद्महे" को "विद्-म-हे" पढ़ें, "विदमही" नहीं। "धीमहि" में "धी" लंबा है। "प्रचोदयात्" के अंत का "त्" हलन्त है — "यात" खुला नहीं, "यात्" रुककर।

कब बोलें: ध्यान के समय — स्थापना के बाद, आँखें बंद करके, अर्पण शुरू करने से पहले। गायत्री छंद का मंत्र है, इसलिए धीमी और एक-सी लय में बोला जाता है।

4. कमले कमलालये मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः

उच्चारण: ओम् श्रीम् ह्रीम् श्रीम् कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीम् ह्रीम् श्रीम् ओम् महालक्ष्म्यै नमः

अर्थ: कमले — हे कमला, कमल पर विराजने वाली लक्ष्मी। कमलालये — हे कमल में निवास करने वाली (कमल + आलय = घर)। प्रसीद प्रसीद — प्रसन्न हों, कृपा करें; दो बार कहना विनती का ज़ोर है। बीच और अंत के "श्रीं ह्रीं श्रीं" बीज हैं। पूरा अर्थ: "हे कमलवासिनी लक्ष्मी, प्रसन्न हों, कृपा करें; महालक्ष्मी को प्रणाम।"

उच्चारण की सावधानी: "कमले" को "क-म-ले" तीन मात्रा में बोलें, "कमलै" नहीं। "प्रसीद" में "सी" लंबा है।

कब बोलें: यह मुख्य जप मंत्र है। अर्पण पूरा होने के बाद, आरती से पहले, माला लेकर 11, 21 या 108 बार — जितना परंपरा और समय अनुमति दे।

5. या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

उच्चारण: या देवी सर्व-भूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

अर्थ: या देवी — जो देवी। सर्वभूतेषु — सभी प्राणियों में। लक्ष्मीरूपेण — लक्ष्मी के रूप में। संस्थिता — विराजमान हैं। नमस्तस्यै (तीन बार) — उन्हें प्रणाम। नमो नमः — बार-बार प्रणाम। पूरा अर्थ: "जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।"

यह श्लोक देवी सूक्तम् / दुर्गा सप्तशती से है। इसका भाव अलग है — लक्ष्मी सिर्फ सिक्कों में नहीं, हर जीव में हैं। पूजा के अंत में यही भाव लेकर उठना परंपरा का हिस्सा है।

उच्चारण की सावधानी: "सर्वभूतेषु" में "भू" लंबा और "षु" हल्का। "नमस्तस्यै" को "नमस्-तस्-यै" — तीनों बार एक-सी गति से।

कब बोलें: जप के बाद, आरती से ठीक पहले, हाथ जोड़कर एक या तीन बार। यह पूजा का समापन-नमन है।

पूजा में ये मंत्र किस क्रम में आते हैं?

पूरी सामग्री सूची और चरण-दर-चरण विधि दिवाली 2026 लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि में है। यहाँ सिर्फ यह देखें कि कौन-सा मंत्र किस चरण पर आता है।

  1. संकल्प और गणेश पूजा — इस चरण में लक्ष्मी मंत्र नहीं, गणेश जी का स्मरण।
  2. स्थापना — कलश और लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा चौकी पर स्थापित करें।
  3. ध्यान — आँखें बंद कर लक्ष्मी गायत्री (मंत्र 3), एक या तीन बार।
  4. आवाहन — ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः (मंत्र 2)।
  5. अर्पण — जल, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य; हर चीज़ के साथ ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः (मंत्र 1)।
  6. जप — कमले कमलालये मंत्र (मंत्र 4), 11, 21 या 108 बार।
  7. श्री सूक्तम् (वैकल्पिक) — परंपरा में ऋग्वेद के परिशिष्ट का पूरा श्री सूक्तम् यहाँ पढ़ा जाता है। समय कम हो तो इसे छोड़ सकते हैं।
  8. स्तुति — या देवी सर्वभूतेषु (मंत्र 5), एक या तीन बार।
  9. आरती
मंत्रपूजा में स्थानपरंपरा में संख्या
1. ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमःहर अर्पण के साथहर सामग्री पर एक बार
2. ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमःआवाहन1 या 11
3. लक्ष्मी गायत्रीध्यान1 या 3
4. कमले कमलालयेजप (अर्पण के बाद, आरती से पहले)11 / 21 / 108
5. या देवी सर्वभूतेषुआरती से ठीक पहले1 या 3

मंत्र कितनी बार बोलें?

परंपरा में 11, 21 या 108 की संख्या चली आती है। 108 के लिए माला सुविधाजनक है, पर ज़रूरी नहीं — उँगलियों पर भी गिन सकते हैं। संख्या से ज़्यादा महत्व तीन बातों को दिया गया है: भाव, शुद्ध उच्चारण और नियमित पाठ। किसी गिनती से किसी फल का वादा परंपरा नहीं करती, इसलिए हम भी नहीं करते। जितना शांत मन से हो सके, उतना ही पर्याप्त है।

उच्चारण गलत हो जाए तो?

रुकें, एक साँस लें और वही पंक्ति फिर से बोलें। बस इतना। परंपरा में भाव को उच्चारण से ऊपर रखा गया है। जो मंत्र अटक रहा हो, उसकी जगह मंत्र 1 (ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः) बोल लें — वह हर चरण में चल जाता है। पहली बार पढ़ रहे हों तो पूजा से पहले दो-तीन बार धीरे पढ़ लें; ऊपर हर मंत्र के नीचे लिखी उच्चारण-पंक्ति इसी काम के लिए है।

कुछ और सवाल

क्या सिर्फ एक मंत्र से पूजा हो सकती है?

हाँ। ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः अकेला भी पर्याप्त माना जाता है। पाँच मंत्र इसलिए दिए हैं कि हर चरण के लिए उपयुक्त शब्द मिलें, पाँचों बोलना अनिवार्य नहीं है।

अर्थ समझकर बोलना ज़रूरी है?

अनिवार्य नहीं, पर बेहतर है। अर्थ पता हो तो मन शब्दों के साथ चलता है और पूजा में एकाग्रता बनी रहती है। इसी कारण इस लेख में हर मंत्र का शब्द-दर-शब्द अर्थ दिया गया है।

बच्चे या बुज़ुर्ग लंबा मंत्र न बोल पाएँ तो?

मंत्र 1 पर्याप्त है। संस्कृत न बोल पाएँ तो हिंदी में "महालक्ष्मी को प्रणाम" कहना भी पूजा का हिस्सा है।

क्या ये मंत्र सिर्फ दिवाली पर बोले जाते हैं?

नहीं। शुक्रवार या किसी भी दिन की लक्ष्मी पूजा में यही मंत्र चलते हैं। दिवाली पर प्रदोष काल का विशेष महत्व है, इसलिए वहाँ समय पर ध्यान दिया जाता है।

8 नवंबर की शाम के लिए छोटी चेकलिस्ट

  • सूर्यास्त (दिल्ली में 17:30) के बाद, लगभग 19:54 तक पूजा शुरू कर लें। अपने शहर का सूर्यास्त हमारे दैनिक पंचांग पेज पर देख सकते हैं।
  • मंत्र 1 और मंत्र 4 को पूजा से पहले दो बार ज़ोर से पढ़ लें।
  • माला या गिनती की व्यवस्था पहले कर लें, बीच में उठना न पड़े।
  • एक बात याद रखें: पाँचों मंत्रों का सार "महालक्ष्मी को प्रणाम" है — बाकी सब इसी का विस्तार है।

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