नवरात्रि 2026 पांचवां दिन, 15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता पूजा विधि, भोग, मंत्र और रंग
नवरात्रि 2026 का पांचवां दिन गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 — आश्विन शुक्ल पंचमी और मां स्कंदमाता की पूजा। गोद में बालक कार्तिकेय, केले का भोग, ध्यान मंत्र, पूजा का क्रम, दिल्ली के अनुसार तिथि और राहुकाल, तथा उसी दिन ललिता पंचमी कहां मनाई जाती है — सब एक जगह।
शारदीय नवरात्रि 2026 का आरंभ रविवार, 11 अक्टूबर से हो रहा है। इसका पांचवां दिन मां स्कंदमाता का है। नवदुर्गा के नौ स्वरूपों में यह अकेला नाम ऐसा है जो देवी का अपना नहीं, उनके पुत्र का है। छवि भी बाकी दिनों से अलग है — न उठा हुआ शस्त्र, न युद्ध का भाव। कमल पर विराजमान देवी और गोद में एक बालक। नीचे इस दिन की तिथि, दिल्ली के अनुसार समय, पूजा का क्रम, भोग और मंत्र हैं — और वहां साफ बताया गया है जहां प्रचलित परंपरा शास्त्र से आगे निकल चुकी है।
नवरात्रि 2026 का पांचवां दिन: गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
शारदीय नवरात्रि 2026 का पांचवां दिन गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 है। तिथि आश्विन शुक्ल पंचमी है। इस दिन का पूरा पंचांग, दिल्ली के लिए गणना किया हुआ, नीचे दिया गया है।
| विवरण | समय (दिल्ली, भारतीय समय) |
|---|---|
| दिनांक और वार | गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 |
| तिथि | आश्विन शुक्ल पंचमी |
| पंचमी आरंभ | 01:14, 15 अक्टूबर 2026 |
| पंचमी समाप्त | 03:26, 16 अक्टूबर 2026 |
| नक्षत्र | ज्येष्ठा (प्रथम चरण) |
| योग | सौभाग्य |
| सूर्योदय | 06:22 |
| सूर्यास्त | 17:50 |
| चंद्रोदय | 10:40 |
| चंद्रास्त | 20:49 |
| राहुकाल | 13:32 – 14:58 |
इस बार पांचवें दिन पर कोई मतभेद क्यों नहीं है
नवरात्रि के दिन घड़ी से नहीं, सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो उससे गिने जाते हैं। पंचमी 15 अक्टूबर को 01:14 पर लग रही है, यानी उसी सुबह के सूर्योदय 06:22 से काफी पहले, और समाप्त हो रही है 16 अक्टूबर को 03:26 पर, यानी अगले सूर्योदय 06:23 से पहले। पूरी पंचमी में केवल एक सूर्योदय आता है। इसलिए यह तिथि एक ही तारीख की होकर रह जाती है और हर पंचांग स्कंदमाता की पूजा 15 अक्टूबर को ही बताएगा।
यह बात इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इसी नवरात्रि में आगे ऐसा नहीं है। सप्तमी 17 अक्टूबर को 05:55 पर लगती है — सूर्योदय से ठीक पहले — और 18 अक्टूबर को 08:28 पर समाप्त होती है, यानी अगले सूर्योदय के बाद। एक तिथि, दो सूर्योदय; इसलिए सातवां दिन दो बार गिना जाएगा। पर दो दिन बाद ठीक उल्टा होता है — अष्टमी और नवमी दोनों 19 अक्टूबर के एक ही सूर्योदय में आ जाती हैं, इसलिए दुर्गा अष्टमी और महानवमी उसी एक तारीख को मनाई जाएंगी। एक ओर की वृद्धि दूसरी ओर के क्षय से कट जाती है, इसलिए नवरात्रि 11 से 19 अक्टूबर तक ही रहती है और विजयादशमी 20 अक्टूबर को। पूरा क्रम हमारे नवरात्रि 2026 नौ दिन के कैलेंडर में है।
स्कंदमाता कौन हैं और नाम पुत्र के नाम पर क्यों
स्कंद यानी कार्तिकेय — मुरुगन, सुब्रह्मण्य, देवसेना के सेनापति। स्कंदमाता का अर्थ बस इतना है: स्कंद की माता। दुर्गा सप्तशती के देवी कवच में उनका स्थान एक ही अर्धश्लोक से तय होता है — पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। पांचवीं स्कंदमाता, छठी कात्यायनी। चौथे दिन कूष्मांडा, छठे दिन कात्यायनी।
इस क्रम में एक शांत तर्क है। कूष्मांडा वह स्वरूप हैं जिनकी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड का उदय माना गया है, और उसके ठीक बाद का स्वरूप गोद में बालक लिए एक माता का है। पहले सृष्टि, फिर पालन। इस दिन से जुड़ा भाव वात्सल्य है और सबसे अधिक मांगा जाने वाला वरदान संतान सुख — संतान की कुशलता और आरोग्य। भक्त यह भी कहते हैं कि चूंकि स्कंद माता की गोद में ही विराजमान हैं, इसलिए माता की पूजा में पुत्र की पूजा अपने आप सम्मिलित हो जाती है।
मूर्ति को कैसे पढ़ें
प्रचलित स्वरूप में देवी चतुर्भुजा हैं। दो हाथों में कमल, एक हाथ गोद में बैठे बालक स्कंद को संभाले हुए, और चौथा हाथ अभय मुद्रा में। वर्ण शुभ्र बताया गया है। वाहन सिंह है, और कमल के आसन पर विराजने के कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है।
जो इस स्वरूप में नहीं है, वह भी उतना ही अर्थपूर्ण है। नवरात्रि के आगे-पीछे के स्वरूप प्रायः शस्त्र धारण किए दिखते हैं; स्कंदमाता के हाथ फूल, बालक और खुली हथेली में लगे हैं। सिंह उपस्थित तो है, पर आसन के नीचे शांत बैठा हुआ। यदि मूर्ति यह बताती है कि देवी के पास किस भाव से जाना है, तो यह मूर्ति कहती है — बालक बनकर आइए।
पांचवें दिन का रंग, और रंगों की सूची का असली स्रोत
सबसे अधिक प्रचलित सूची स्कंदमाता के दिन के लिए सफेद रंग बताती है, और सफेद उनके शुभ्र वर्ण तथा दूध-कमल वाले पूजन-भाव से मेल भी खाता है।
पर इस निर्देश की हैसियत साफ समझ लीजिए। दुर्गा सप्तशती और देवी कवच नौ दिनों के लिए कोई रंग निर्धारित नहीं करते। रंगों की यह सूची आधुनिक परंपरा है, जो कुछ दशक पहले गुजराती और मराठी अख़बारों से लोकप्रिय हुई, और चूंकि कुछ संस्करणों में यह वार के अनुसार चलती है, क्रम हर वर्ष और हर प्रकाशन में बदल जाता है। कुछ सूचियां पांचवें दिन पीला या धूसर बताती हैं। इनमें कोई भी शास्त्रसम्मत नहीं, क्योंकि कोई भी शास्त्र से नहीं आई। परिवार या स्थानीय सूची जो कहे, वही पहनिए; घर में नियम तय न हो तो सफेद सहज और सुरक्षित चुनाव है।
भोग: केला, और शास्त्र इस पर क्या कहता है
स्कंदमाता का भोग केला है। पका पीला केला, प्रायः विषम संख्या में, कभी खीर या दूध के साथ। कई घरों में यही केले बाद में ब्राह्मण को, बच्चों को या प्रसाद में बांट दिए जाते हैं।
आपने पढ़ा होगा कि केला इसलिए चढ़ता है क्योंकि वह स्वास्थ्य या संतान के लिए हितकर है। यह तर्क आधुनिक है। व्रत-साहित्य परंपरा का उल्लेख करता है, कारण नहीं बताता, और सप्तशती अलग-अलग दिनों के भोग की चर्चा ही नहीं करती। यह एक पुरानी, स्थापित परंपरा है जिसके पीछे कोई घोषित कारण नहीं — और किसी परंपरा का ऐसा होना सामान्य है। केला इसलिए चढ़ाइए कि इस दिन यही चढ़ाया जाता है, किसी ऐसे लाभ के लिए नहीं जिसका दावा किसी ग्रंथ ने किया ही नहीं।
स्कंदमाता के मंत्र
- नाम मंत्र: ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः
- दुर्गा सप्तशती की स्तुति: या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
- ध्यान श्लोक: सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
नाम मंत्र के लिए 108 की संख्या सामान्य परंपरा है। यह परंपरा है, अनिवार्यता नहीं — ध्यान से किया गया ग्यारह, बिखरे मन से किए 108 से अधिक मूल्यवान है।
पूजा विधि, क्रम से
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पहले दिन स्थापित घट के सामने पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
- दीपक और धूप जलाएं; घर में अखंड ज्योति है तो उसे संभाल लें।
- देवी को जल, फिर अक्षत (साबुत चावल), कुमकुम, रोली और चंदन का तिलक अर्पित करें।
- पुष्प चढ़ाएं। इस स्वरूप के लिए कमल परंपरागत है, अन्यथा श्वेत पुष्प।
- केले का भोग रखें, साथ में खीर या दूध यदि अर्पित कर रहे हों।
- पहले ध्यान श्लोक, फिर नाम मंत्र, फिर सप्तशती की स्तुति का पाठ करें।
- यदि घर की परंपरा हो तो दुर्गा सप्तशती या दिन की कथा पढ़ें।
- आरती करें, भोग विधिवत अर्पित करें और प्रसाद बांटें।
- व्रत रखा हो तो सायं आरती के बाद कुल-परंपरा के अनुसार पारण करें।
उसी दिन ललिता पंचमी
आश्विन शुक्ल पंचमी को ललिता पंचमी भी है, जिसे गुजरात, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में उपांग ललिता व्रत के रूप में देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी के निमित्त रखा जाता है। वहां पूजन प्रायः संध्या के समय होता है।
मतभेद तब खड़ा होता है जब कोई तिथि एक तारीख की सुबह और अगली तारीख की संध्या को घेरे। 2026 में ऐसा नहीं है — पंचमी 15 अक्टूबर के सूर्योदय पर विद्यमान है और उसी दिन की संध्या तक अखंड चलती है, समाप्त अगली रात 03:26 पर होती है। आपकी परंपरा सूर्योदय से गिने या संध्या पूजन से, तारीख 15 अक्टूबर ही रहेगी। ललिता पंचमी क्षेत्रीय पर्व है; उत्तर भारत के बड़े हिस्से में पांचवां दिन केवल स्कंदमाता का है।
समय, और शहर बदलने पर वह क्यों बदल जाता है
किसी भी दिन के शुभ और अशुभ काल उसी दिन के सूर्योदय-सूर्यास्त के अंतराल में से काटे जाते हैं, इसीलिए वे घड़ी के स्थिर समय नहीं होते।
| अवधि | दिल्ली का समय | कैसे निकली |
|---|---|---|
| दिनमान | 11 घंटे 28 मिनट | सूर्यास्त 17:50 में से सूर्योदय 06:22 घटाकर |
| एक मुहूर्त | 45 मिनट 52 सेकंड | दिनमान को 15 से भाग देकर |
| अभिजित मुहूर्त | 11:43 – 12:29 | दिन के 15 मुहूर्तों में आठवां |
| राहुकाल | 13:32 – 14:58 | दिनमान के 8 बराबर भागों में छठा, जो गुरुवार का भाग है |
ऊपर दी गई विधि के लिए किसी मुहूर्त की आवश्यकता नहीं है। देवी की नित्य पूजा राहुकाल में वर्जित नहीं मानी जाती; यह अवधि तब मायने रखती है जब उस दिन कोई नया कार्य आरंभ करना हो। अपने शहर की अवधि हमारे राहुकाल पृष्ठ पर देखी जा सकती है, और दिन का पूरा पंचांग भी वहीं मिलेगा।
इस पृष्ठ के सभी समय दिल्ली के अनुसार हैं। सूर्योदय हर शहर में अलग होता है — कोलकाता दिल्ली से लगभग आधा घंटा आगे है और मुंबई तथा अहमदाबाद कुछ पीछे — इसलिए अभिजित और राहुकाल भी उसी अनुपात में खिसक जाते हैं। समय तय करने से पहले अपने शहर का पंचांग अवश्य देख लें।
छठा दिन कात्यायनी का है, शुक्रवार 16 अक्टूबर को। इसके बाद के बड़े दिन इस वर्ष एक ही तारीख पर पड़ रहे हैं — देखें दुर्गा अष्टमी और महानवमी 2026।