नवरात्रि 2026 तीसरा दिन, 13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा पूजा विधि, भोग, मंत्र और रंग
नवरात्रि 2026 का तीसरा दिन मंगलवार, 13 अक्टूबर को है। आश्विन शुक्ल तृतीया 12 अक्टूबर रात 10:14 से 13 अक्टूबर रात 11:28 तक। मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, दूध-खीर का भोग, मंत्र, रंग का सच और दिल्ली के समय — राहुकाल दोपहर 3:00 से 4:26 तक।
शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा का है, और 2026 में यह मंगलवार, 13 अक्टूबर को पड़ रहा है। यह देवी का वह स्वरूप है जो शिव से विवाह के बाद बना — दस भुजाएं, सिंह की सवारी, मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चांद। इस दिन का एक गुण सबसे ऊपर है: निर्भयता। नीचे समय, विधि, और यह साफ लिखा है कि इसमें क्या शास्त्र से आता है और क्या केवल चलन।
नवरात्रि 2026 का तीसरा दिन कब है
तीसरा दिन आश्विन शुक्ल तृतीया का है। तिथि 12 अक्टूबर की रात शुरू होकर 13 अक्टूबर की रात समाप्त होती है। यानी 13 को सूर्योदय के समय तृतीया पहले से चल रही है और पूजा के हर संभावित समय तक बनी रहती है। कुछ वर्षों में तिथि सुबह ही खत्म हो जाने से तीसरा दिन छोटा पड़ता है — 2026 में ऐसा नहीं।
| विवरण | समय (दिल्ली) |
|---|---|
| तारीख | मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 |
| तिथि | आश्विन शुक्ल तृतीया |
| तिथि आरंभ | 12 अक्टूबर 2026, रात 10:14 |
| तिथि समाप्त | 13 अक्टूबर 2026, रात 11:28 |
| नक्षत्र | विशाखा (प्रथम चरण) |
| योग | प्रीति |
| सूर्योदय | प्रातः 6:21 |
| सूर्यास्त | सायं 5:52 |
| चंद्रोदय | प्रातः 8:45 |
| चंद्रास्त | सायं 7:19 |
| राहुकाल | दोपहर 3:00 से सायं 4:26 |
ये समय दिल्ली के हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त और राहुकाल देशांतर के साथ बदलते हैं — पूर्व में जल्दी, पश्चिम में देर से — इसलिए अपने शहर का दैनिक पंचांग देख लीजिए। तिथि का आरंभ और समाप्ति पूरे भारत में एक ही; केवल सूर्य से जुड़े समय बदलते हैं।
आसपास के दिनों के बीच तीसरे दिन की स्थिति:
| दिन | तारीख (2026) | तिथि | देवी |
|---|---|---|---|
| दूसरा | सोमवार, 12 अक्टूबर | शुक्ल द्वितीया | ब्रह्मचारिणी |
| तीसरा | मंगलवार, 13 अक्टूबर | शुक्ल तृतीया | चंद्रघंटा |
| चौथा | बुधवार, 14 अक्टूबर | शुक्ल चतुर्थी | कूष्मांडा |
नाम में ही पहचान — चंद्र और घंटा
चंद्र यानी चंद्रमा, घंटा यानी घंटी। मां के मस्तक पर अर्धचंद्र है, आकार मंदिर के द्वार पर लटके घंटे जैसा। यही एक चिह्न उनकी पूरी पहचान है, और यही इकलौती बात जिस पर सभी स्रोत सहमत हैं।
दुर्गा सप्तशती के देवी कवच में नौ नाम गिनाए गए हैं, पर वहां चंद्रघंटा का केवल नाम आता है, वर्णन नहीं:
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
बाकी सब — सिंह, दस भुजाएं, स्वर्ण जैसा वर्ण — ध्यान श्लोकों और बाद के कथा-साहित्य से आता है, उस नामावली से नहीं।
दस भुजाएं और उनमें क्या है
चंद्रघंटा दशभुजा हैं और सिंह पर सवार। उनका ध्यान श्लोक संक्षिप्त है:
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
अर्थ — अपने श्रेष्ठ वाहन पर आरूढ़, प्रचंड क्रोध के अस्त्रों से युक्त, चंद्रघंटा नाम से विख्यात देवी कृपा प्रदान करें।
दस हाथों में क्या है, इसकी सूची स्रोत के हिसाब से बदलती है। त्रिशूल, गदा, धनुष, बाण, खड्ग और कमंडल अधिकतर सूचियों में मिलते हैं, दो हाथ प्रायः अभय और वरद मुद्रा में। पर सूचियां पूरी तरह मेल नहीं खातीं, और कोई ग्रंथ नहीं जिसका हवाला देकर क्रम तय हो। जो पन्ना दसों अस्त्रों की निश्चित सूची देता है, वह एक संस्करण चुन रहा है — बिना बताए कि चुना है।
घंटे का नाद — वह ध्वनि जो भय हटाती है
घंटा सजावट नहीं है। परंपरा में घंटानाद ही वह चीज है जिसे असुर सह नहीं पाते; कहा गया है कि अस्त्र उठने से पहले ही वह संकट बिखेर देता है। इसीलिए चंद्रघंटा का आवाहन प्राप्ति के लिए नहीं, रक्षा के लिए होता है — उपासना भय की वस्तु पर नहीं, भय पर लक्षित है।
इसकी रोजमर्रा की गूंज भी है: आरती के आरंभ में बजने वाला घंटा स्थान को उससे खाली करता है जो वहां नहीं होना चाहिए। मंदिर का घंटा चंद्रघंटा से अर्थ लेता है या उल्टा, यह कहीं तय नहीं।
तीसरे दिन का रंग
यहीं पर अधिकतर नवरात्रि सामग्री चुपचाप गढ़ने लगती है, क्योंकि दो अलग चीजें मिला दी जाती हैं।
पहली शास्त्रीय है। ध्यान परंपरा चंद्रघंटा को स्वर्ण जैसे वर्ण वाली बताती है। यह उनके स्वरूप का रंग है, आपके कपड़ों का नियम नहीं — और यह पुराना तथा स्थिर है।
दूसरी वह नौ रंगों की सूची है जो हर साल घूमती है। इसकी शुरुआत मुंबई के एक गुजराती अखबार से हुई थी, यह इस पर टिकी है कि प्रतिपदा किस वार को पड़ रही है, और वार हर साल बदलता है, इसलिए सूची भी बदल जाती है। "तीसरे दिन का रंग" कोई स्थायी चीज नहीं है। सामान्य सूचियां चंद्रघंटा के आगे प्रायः स्लेटी रखती हैं; उस वर्ष के लिए छपी सूचियां अक्सर कुछ और। दोनों में से कोई गलत नहीं, क्योंकि दोनों में से कोई शास्त्र भी नहीं। एक सूची चुनिए और नौ दिन उसी पर टिके रहिए।
भोग — दूध और खीर
चंद्रघंटा से जुड़ा भोग दूध है — सादा दूध, खीर, या पेड़ा जैसी दुग्ध मिठाई। यह जमी हुई परंपरा है और लगभग हर जगह मानी जाती है। पर यह सप्तशती या पुराणों में विहित नहीं, और किसी मूल ग्रंथ में इसका कारण नहीं दिया गया। जो व्याख्याएं चलती हैं — कि दूध उग्र स्वरूप को शीतल करता है, या मस्तक के चंद्रमा को तृप्त — वे बाद की तर्क-रचना हैं, और उन्हें शास्त्र बताकर पेश करने से बेहतर है यह कह देना। सीधी बात: यह भोग बहुत लंबे समय से चढ़ता आया है, इसलिए चढ़ाइए।
कई घरों में तीसरे दिन का दूध दान कर दिया जाता है, कहीं प्रसाद की तरह ग्रहण होता है। दोनों चलन में हैं, कोई नियम नहीं।
मंत्र
तीन स्तर हैं; सुबह जितना समय दे, उतना लीजिए।
- नाम मंत्र: ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः — माला पर 108 बार।
- ध्यान श्लोक: ऊपर दिया पिण्डजप्रवरारूढा श्लोक, पूजा से पहले तीन बार।
- नवार्ण मंत्र: ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे — यह पूरे नौ दिन का मंत्र है, केवल तीसरे दिन का नहीं।
गिनती से अधिक उच्चारण का ध्यान रखिए। संस्कृत अपरिचित लगे तो अकेला नाम मंत्र पर्याप्त है।
पूजा विधि
- प्रतिपदा को स्थापित कलश के सामने बैठिए। तीसरे दिन नई स्थापना की आवश्यकता नहीं।
- अखंड ज्योति रखते हों तो उसे, अन्यथा दिन का दीपक जलाइए।
- कलश और देवी के चित्र पर जल, फिर रोली और अक्षत अर्पित कीजिए।
- पुष्प चढ़ाइए। किसी शास्त्र में उनके लिए फूल नियत नहीं; कमल और गेंदा दोनों प्रचलित हैं।
- दूध या खीर का भोग लगाइए।
- ध्यान श्लोक पढ़िए, फिर नाम मंत्र 108 बार।
- आरती भर घंटा बजाइए। इस दिन घंटा पूजा का विराम-चिह्न नहीं, मुख्य बिंदु है।
- अंत में क्षमा प्रार्थना — विधि में जो छूटा या गलत हुआ, उसके लिए।
नौ दिन का व्रत रख रहे हों तो तीसरे दिन के नियम पहले-दूसरे दिन जैसे ही हैं; पूरा क्रम हमारे नवरात्रि 2026 नौ दिन के कैलेंडर में है।
राहुकाल इस बार देर से है
13 अक्टूबर मंगलवार है, और दिल्ली में मंगलवार का राहुकाल दोपहर 3:00 से सायं 4:26 तक रहेगा। यह सुविधाजनक है: पूरी सुबह और दोपहर तक का समय खाली है, इसलिए सूर्योदय की या दोपहर से पहले की पूजा में कोई टकराव नहीं। शाम को पूजा होती हो तो 4:30 के बाद आरंभ कीजिए।
राहुकाल स्थानीय सूर्योदय से निकलता है, इसलिए ऊपर दिया दिल्ली का समय आपका नहीं होगा; अपने शहर का समय राहुकाल पेज पर देखिए। और साफ बात यह भी है: राहुकाल अच्छे समयों में से चुनने की व्यवस्था है, पूजा पर रोक नहीं। किसी परंपरा में यह नहीं लिखा कि छियासी मिनट के लिए देवी सुनना बंद कर देती हैं।
निर्भयता — इस दिन का असली अर्थ
नौ स्वरूपों में हर एक के साथ एक गुण जुड़ा है, और चंद्रघंटा का गुण निर्भयता है। तांत्रिक साधना में उन्हें मणिपूर चक्र पर रखा गया है — नाभि के ऊपर का वह स्थान जिसे संकल्प का केंद्र माना जाता है, और भय सबसे पहले संकल्प को ही तोड़ता है। नौ दिनों का क्रम मनमाना नहीं: शैलपुत्री स्थिरता हैं, ब्रह्मचारिणी लंबे समय तक टिकी तपस्या, और उसके बाद ही, तीसरे स्थान पर, भय का हटना। साहस जमीन और धैर्य के बाद आता है।
तीसरे दिन के काम की चीज यही है, और इसमें यह पूछने की जरूरत नहीं कि रंग सही पहना या नहीं। बैठिए, घंटा बजाइए, और जिस चीज से सचमुच डर लगता है उसका नाम लीजिए। बाकी पर्व — दुर्गा अष्टमी और महानवमी तक — इसी पर बनता है।