पंचांग के पाँच अंग कौन से हैं? ये समझ लिए तो आधी उलझन खत्म
पंचांग में पाँच ही चीज़ें होती हैं — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। कौन-सा किस काम आता है, राहु काल इनमें क्यों नहीं गिना जाता, और अलग-अलग पंचांगों में कुछ मिनट का फ़र्क़ क्यों आ जाता है — शांत, तथ्य-आधारित सफ़ाई।
पंचांग रोज़ देखने वाले भी अक्सर एक ही सवाल पर अटकते हैं — इसमें लिखा क्या-क्या है? तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण — ये पाँच नाम तो सामने रहते हैं, पर कौन-सा किस काम आता है, यह साफ़ नहीं होता। और नीचे राहु काल, चौघड़िया, अभिजित मुहूर्त भी छपा रहता है, तो लगता है कि वे भी पंचांग के हिस्से हैं। असल में पंचांग का ढाँचा बहुत सीधा है। एक बार पाँचों अंग समझ लें, तो आधी उलझन अपने आप खत्म हो जाती है।
"पंचांग" शब्द का मतलब ही पाँच अंग है
पंच यानी पाँच, अंग यानी हिस्सा। पंचांग कोई भविष्यवाणी की किताब नहीं है — यह दिन का खगोलीय हिसाब है, जिसमें सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से पाँच चीज़ें निकाली जाती हैं। इनका गणित सूर्य सिद्धांत जैसे सिद्धांत-ग्रंथों की परंपरा से आता है, और आज वही गणना कंप्यूटर से होती है। पाँचों अंग रोज़ बदलते हैं, और यही पाँच मिलकर तय करते हैं कि आज कौन-सी तिथि है, व्रत कब है, और मुहूर्त निकालते समय पंडित जी किन चीज़ों को देखेंगे।
पाँच अंग — एक-एक लाइन में
- तिथि — चंद्रमा और सूर्य के बीच का कोणीय अंतर। हर 12 अंश का अंतर एक तिथि बनाता है, इसलिए एक चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं। व्रत, एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, श्राद्ध — यह सब तिथि से तय होता है।
- वार — सात दिन, रविवार से शनिवार तक। इसका सूर्योदय से सूर्योदय तक का हिसाब होता है, अंग्रेज़ी तारीख़ की तरह आधी रात से नहीं। यही वजह है कि रात 11 बजे किया गया काम पंचांग की दृष्टि में उसी वार का है, पर तड़के 4 बजे किया गया काम अब भी पिछले वार का माना जाता है।
- नक्षत्र — चंद्रमा आकाश के 27 नक्षत्रों में से किस में बैठा है। जन्म का नक्षत्र, नामकरण का अक्षर, और मुंडन-गृहप्रवेश जैसे कामों का शुभ-अशुभ विचार इसी से होता है।
- योग — सूर्य और चंद्रमा के स्पष्ट (देशांतर) को जोड़कर बनने वाली 27 इकाइयों में से एक। इसका ग्रह-योग या "राजयोग" से कोई संबंध नहीं — यह अलग चीज़ है। मुहूर्त देखते समय विष्कुम्भ, व्यतीपात जैसे कुछ योगों को टाला जाता है।
- करण — आधी तिथि। एक तिथि में दो करण होते हैं, और कुल 11 करण हैं — सात चर (बार-बार लौटने वाले) और चार स्थिर। रोज़मर्रा में आम पाठक इसे सबसे कम इस्तेमाल करता है; इसका काम मुख्यतः सूक्ष्म मुहूर्त-विचार में आता है।
यही पाँच। इनसे ज़्यादा कुछ भी पंचांग का "अंग" नहीं है — बाकी सब इन्हीं के ऊपर जोड़ी गई उपयोगी जानकारी है। आज का पंचांग देखते समय आप ये पाँचों एक साथ, उनके समाप्ति-समय के साथ पढ़ सकते हैं।
आम आदमी इन्हें किस काम में लाता है
सबसे ज़्यादा काम तिथि का पड़ता है — व्रत रखना है या नहीं, एकादशी किस दिन है, पूर्णिमा कब पड़ रही है। दूसरे नंबर पर नक्षत्र है, क्योंकि जन्म-नक्षत्र और नामाक्षर वहीं से आते हैं। वार धार्मिक नियम में आता है (मंगलवार हनुमान जी, शनिवार शनि देव), योग और करण मुख्यतः मुहूर्त निकालने वाले के काम के हैं।
एक बात ध्यान रखने लायक है — तिथि सूर्योदय पर बदल जाए, ज़रूरी नहीं। वह दिन में किसी भी समय बदल सकती है। इसीलिए पंचांग में तिथि के आगे समय लिखा होता है, जैसे "द्वादशी दोपहर 1:42 तक"। ज़्यादातर व्रतों में उदया तिथि यानी सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, उसे माना जाता है — पर हर व्रत में नहीं। कुछ व्रत रात के समय से तय होते हैं, कुछ मध्याह्न से। यही कारण है कि दो जगह एक ही व्रत की तारीख़ एक दिन आगे-पीछे हो जाती है, और दोनों अपनी-अपनी परंपरा में ठीक होते हैं।
जो लोग अक्सर ग़लत समझते हैं
राहु काल और चौघड़िया पंचांग के अंग नहीं हैं। यह सबसे आम गलतफ़हमी है। पाँच अंग सूर्य-चंद्र की स्थिति से निकलते हैं। राहु काल और चौघड़िया इनसे नहीं निकलते — वे दिन के विभाजन हैं। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को आठ बराबर हिस्सों में बाँटकर, वार के अनुसार एक हिस्से को राहु काल कहा जाता है। चौघड़िया भी उसी तरह दिन-रात को हिस्सों में बाँटने की पद्धति है। ये पंचांग के पन्ने पर छपते ज़रूर हैं, पर पंचांग का छठा अंग नहीं हैं।
इससे जुड़ी दूसरी बात — राहु काल को लेकर जितना डर फैलाया जाता है, उतना शास्त्रीय आधार उसका नहीं है। यह मुख्यतः दक्षिण भारत की मुहूर्त-परंपरा से आई प्रथा है और उत्तर भारत के कई पारंपरिक पंचांगों में इसे उतना महत्व नहीं दिया जाता। नए काम की शुरुआत के लिए लोग इसे टालते हैं — यह परंपरा है, इसे मानने में कोई हर्ज नहीं। पर इस समय में ऑफिस जाना, दवा लेना, ट्रेन पकड़ना या फ़ोन उठाना "अशुभ" है, ऐसा कहीं नहीं लिखा। जो काम रुक नहीं सकता, उसे रोकने की ज़रूरत नहीं।
एक ही दिन का पंचांग अलग-अलग वेबसाइट पर थोड़ा अलग क्यों दिखता है
यह देखकर लोग परेशान हो जाते हैं कि एक जगह तिथि 1:42 पर बदल रही है और दूसरी जगह 1:58 पर। इसके दो सीधे कारण हैं:
- अयनांश — निरयन (सायडरियल) राशिचक्र की गणना के लिए जो सुधार लगाया जाता है, उसके कई मत हैं — लाहिड़ी (चित्रपक्ष), रमन, कृष्णमूर्ति आदि। अलग अयनांश से नक्षत्र और योग के समय में कुछ मिनट का फ़र्क़ आ जाता है। भारत सरकार का राष्ट्रीय पंचांग लाहिड़ी अयनांश पर आधारित है, और अधिकांश वेबसाइटें भी वही लेती हैं।
- स्थान — पंचांग स्थानीय सूर्योदय पर टिका है। दिल्ली और चेन्नई का सूर्योदय एक नहीं होता, इसलिए वार का आरंभ, उदया तिथि और चौघड़िया के समय भी नहीं मिलेंगे। जो पंचांग आपका शहर पूछे बिना समय दिखा दे, वह किसी एक डिफ़ॉल्ट शहर का पंचांग है।
यानी अंतर गणना की गलती नहीं, अलग मानक और अलग जगह का नतीजा है। अपने शहर का पंचांग देखें और एक ही स्रोत पर टिके रहें — रोज़ नई वेबसाइट बदलने से ही भ्रम बढ़ता है। जन्म-नक्षत्र या राशि जाननी हो तो कुंडली से सटीक स्थिति निकल आती है, क्योंकि वहाँ आपका जन्मस्थान और समय दोनों लगते हैं।
सार
पंचांग सिर्फ़ पाँच चीज़ें बताता है — तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण। इनमें तिथि और नक्षत्र आम आदमी के सबसे ज़्यादा काम के हैं, बाकी तीन मुहूर्त-विचार में। राहु काल और चौघड़िया इनके अंग नहीं, दिन के विभाजन हैं, और अलग-अलग पंचांगों का कुछ मिनट का अंतर अयनांश और स्थान की वजह से है, किसी की गलती से नहीं।