परिक्रमा हमेशा घड़ी की दिशा में ही क्यों की जाती है?
मंदिर में सब घड़ी की दिशा में ही क्यों घूमते हैं, और शिवलिंग की परिक्रमा बीच से क्यों लौटा दी जाती है? प्रदक्षिणा का मूल नियम, देवता-भेद से बदलती संख्या, और वे अपवाद जिन्हें ज़्यादातर लोग नहीं जानते।
मंदिर में घंटी बजाने के बाद जब आप गर्भगृह के चारों ओर घूमते हैं, तो पैर अपने आप एक ही तरफ़ मुड़ते हैं — घड़ी की सुइयों की दिशा में। किसी ने कभी रोककर बताया नहीं, फिर भी सब वैसा ही करते हैं। बच्चा अगर उल्टा घूम जाए तो दादी तुरंत हाथ पकड़कर सीधा कर देती हैं। सवाल यह है कि यह नियम आया कहाँ से, और क्या यह हर जगह, हर देवता पर एक-सा लागू होता है? जवाब उतना सीधा नहीं है जितना लगता है।
पहले शब्द को समझिए — 'प्रदक्षिणा' में ही उत्तर छिपा है
हम जिसे परिक्रमा कहते हैं, शास्त्रीय शब्द उसका प्रदक्षिणा है। इसमें 'प्र' का अर्थ है आगे की ओर, और 'दक्षिण' का अर्थ है दायाँ (यही शब्द दिशा वाले दक्षिण के लिए भी है, क्योंकि पूर्व की ओर मुँह करने पर दक्षिण दिशा दायीं ओर पड़ती है)। यानी प्रदक्षिणा का शाब्दिक अर्थ ही है — दायीं ओर रखते हुए चलना।
इसका सीधा मतलब यह हुआ कि नियम "घड़ी की दिशा" का नहीं है। घड़ी तो कुछ सौ साल पुरानी चीज़ है। नियम यह है कि मूर्ति या गर्भगृह हमेशा आपके दायें कंधे की ओर रहे। जब आप यह करते हैं, तो चलने की दिशा अपने आप घड़ी की सुइयों जैसी बन जाती है। दिशा परिणाम है, नियम नहीं।
दायीं ओर ही क्यों — इसका कारण क्या शास्त्र देता है?
भारतीय व्यवहार में दायाँ पक्ष आदर का पक्ष माना गया है। पूजन में दक्षिणा दायें हाथ से दी जाती है, बड़ों को दायीं ओर स्थान दिया जाता है, यज्ञोपवीत सामान्य स्थिति में बायें कंधे पर रहता है। परिक्रमा उसी शिष्टाचार का विस्तार है — जिसे आप पूज्य मानते हैं, उसे अपने आदरवाले पक्ष में रखकर चलते हैं।
परंपरा इसे सूर्य की गति से भी जोड़ती है — सूर्य पूर्व से दक्षिण होते हुए पश्चिम जाता प्रतीत होता है, और प्रदक्षिणा उसी क्रम का अनुसरण मानी जाती है। यह पारंपरिक व्याख्या है, इसे वैसा ही समझना चाहिए। इससे आगे बढ़कर "इस दिशा में घूमने से शरीर को कोई विशेष ऊर्जा मिलती है" जैसा कोई कारण किसी प्रामाणिक ग्रंथ में नहीं मिलता। ईमानदारी यही है कि आचार-नियम का कारण अक्सर आचार ही होता है, कोई गुप्त तंत्र नहीं।
किस देवता की कितनी परिक्रमा — और यहाँ मतभेद क्यों है
संख्या को लेकर एक श्लोक लोकव्यवहार में बहुत उद्धृत होता है, जिसका भाव है — देवी की एक, सूर्य की सात, गणपति की तीन, विष्णु की चार और शिव की आधी प्रदक्षिणा। यह प्रायः 'कर्मलोचन' नाम से जोड़ा जाता है, पर इस नाम का कोई ग्रंथ आज उपलब्ध या प्रामाणिक रूप से चिह्नित नहीं है। यानी संख्या की परंपरा पुरानी और व्यापक है, पर उसका मूल स्रोत अनिश्चित है — इसे प्रचलित आचार-वचन मानकर चलिए, शास्त्र-प्रमाण मानकर नहीं।
- गणपति — उपर्युक्त श्लोक तीन कहता है, पर बहुत से घरों और मंदिरों में एक ही परिक्रमा की परंपरा है। दोनों चलती हैं।
- विष्णु — श्लोक चार कहता है, और यह संख्या व्यापक रूप से मानी जाती है; पर वैष्णव संप्रदायों और बड़े मंदिरों की अपनी-अपनी रीत है, कहीं तीन भी प्रचलित है।
- देवी — एक, पर शक्तिपीठों की अपनी स्थानीय पद्धतियाँ हैं।
- सूर्य — सात, कहीं-कहीं तीन भी।
- शिव — आधी, और इसका कारण सबसे ठोस है (अगला भाग)।
- अश्वत्थ (पीपल) — परंपरा में सात या एक सौ आठ, व्रत के संकल्प पर निर्भर।
यह सूची अनिवार्यता नहीं है। बहुत से भक्त हर देवता की तीन परिक्रमा करते हैं और यह भी दोषपूर्ण नहीं माना जाता। संख्या से बड़ी बात संकल्प और शांत गति है — दौड़ते हुए या बात करते हुए की गई परिक्रमा को परंपरा आदरहीन मानती है।
शिव की आधी परिक्रमा — सबसे ज़रूरी अपवाद
शिवलिंग के जलाधारी (गौमुख/प्रणाली) से अभिषेक का जल लगातार बाहर बहता रहता है। इस निकास की धारा को सोमसूत्र कहा गया है। आचार-ग्रंथों का नियम स्पष्ट है — सोमसूत्र को लाँघना वर्जित है। कारण भी गूढ़ नहीं है: वह जल निर्माल्य है, अभिषेक के बाद का शेष, और उस पर पैर पड़ना अनादर है।
इसीलिए विधि यह बनी — सामने से चलना शुरू कीजिए, एक ओर से जल-निकास तक जाइए, वहीं रुककर उसी रास्ते लौट आइए; फिर दूसरी ओर से उतनी ही दूर जाकर वापस आइए। मार्ग पूरा गोल नहीं बनता, चंद्राकार बनता है। इसी को अर्धप्रदक्षिणा या चंद्रकला परिक्रमा कहते हैं।
पर यह हर जगह लागू नहीं होता। जहाँ जल-निकास ढका हुआ है और उसके ऊपर से पक्का परिक्रमा-पथ बना दिया गया है, वहाँ पूरी परिक्रमा में कोई बाधा नहीं — क्योंकि धारा लाँघी ही नहीं जा रही। (स्वयंभू या भूमि-लिंग पर पूरी परिक्रमा की छूट भी कहीं-कहीं कही जाती है, पर इसका आधार हमें प्रामाणिक ग्रंथों में नहीं मिला।) सबसे भरोसेमंद तरीका यही है कि उस मंदिर का चलन देख लीजिए या पुजारी से पूछ लीजिए। नियम धारा को न लाँघने का है, आधा घूमने का नहीं।
जहाँ परंपरा सचमुच उल्टी चलती है
यह वह हिस्सा है जो अधिकतर लेखों से गायब रहता है — उल्टी परिक्रमा हमेशा भूल नहीं होती।
- पितृकर्म में — श्राद्ध, तर्पण और अंत्येष्टि से जुड़े कर्मों में गति और यज्ञोपवीत दोनों उलट जाते हैं। इसे अपसव्य (प्राचीनावीती) कहते हैं। यहाँ बायीं ओर घूमना ही विधि है, दोष नहीं। यही सबसे स्पष्ट शास्त्रसम्मत अपवाद है।
- कुछ तांत्रिक/वाममार्गी पद्धतियों में — उल्टी परिक्रमा की बात लोकप्रचलन में कही जाती है, पर हमें इसका कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं मिला — न इसकी पुष्टि की जा सकती है, न खंडन। इसलिए इस पर कोई निष्कर्ष देना उचित नहीं। जहाँ मंदिर की अपनी ऐसी रीत हो, वहाँ पुजारी का निर्देश ही प्रमाण है।
- भारत के बाहर — तिब्बत की बोन परंपरा में परिक्रमा वामावर्त (उल्टी) की जाती है, जबकि वहीं बौद्ध परंपरा दक्षिणावर्त चलती है। एक ही पर्वत के चारों ओर दो दिशाओं में चलते लोग — यह दिखाता है कि दिशा सार्वभौमिक भौतिक नियम नहीं, परंपरा का निर्णय है।
जो लोग अक्सर ग़लत समझते हैं
पहली भ्रांति — "परिक्रमा से चुंबकीय क्षेत्र मिलता है" या "मूर्ति से निकलती ऊर्जा तरंगें शरीर में समाती हैं।" ऐसा कोई कारण प्रामाणिक ग्रंथों में नहीं मिलता — जो स्रोत इस दावे के साथ गिनाए जाते हैं, उनमें से कोई इसकी पुष्टि नहीं करता। यह पिछले कुछ दशकों में गढ़ी गई व्याख्या है। श्रद्धा को इस सहारे की ज़रूरत नहीं — आदरपूर्वक घूमना अपने आप में पूर्ण कारण है।
दूसरी भ्रांति — "उल्टा घूम गए तो अनिष्ट होगा।" शास्त्र यहाँ दंड नहीं, सुधार बताता है। भूल हो जाए तो शांति से रुकिए, प्रणाम कीजिए और सही दिशा से फिर से आरंभ कर लीजिए। बस।
तीसरी भ्रांति — "परिक्रमा गर्भगृह के भीतर से होनी चाहिए।" जहाँ अलग प्रदक्षिणा-पथ बना हो वहीं चलना उचित है; कई मंदिरों में भीतरी मार्ग केवल पुजारी के लिए होता है।
अगर आप किसी संकल्प, व्रत या विशेष तिथि पर परिक्रमा की योजना बना रहे हैं, तो तिथि और प्रदोष-काल का समय आज के पंचांग में देख लेना सुविधाजनक रहता है — शिव-परिक्रमा के लिए प्रदोष का समय स्थान के अनुसार बदलता है।
संक्षेप में
प्रदक्षिणा का मूल नियम दिशा नहीं, आदर है — देवता आपके दायें रहें, चाल घड़ी की दिशा में अपने आप बन जाएगी। संख्या देवता के अनुसार बदलती है और इस पर परंपराएँ एकमत नहीं हैं, इसलिए अपने घर या मंदिर की रीत निभाना ही सही है। और अपवाद असली हैं — शिव की अर्धप्रदक्षिणा सोमसूत्र के कारण, तथा पितृकर्म में अपसव्य गति। बाकी जो 'वैज्ञानिक कारण' सुनाए जाते हैं, उन्हें बिना झिझक छोड़ दीजिए; परंपरा उनके बिना भी पूरी खड़ी है।