पूजा में शंख क्यों बजाया जाता है? कथा, परंपरा और वे नियम जिन पर सबसे ज़्यादा भ्रम है
आरती शुरू होते ही शंख उठ जाता है, पर पूछो क्यों तो जवाब मिलता है "बस, ऐसा ही होता है।" शंख की उत्पत्ति, विष्णु से उसका संबंध, दक्षिणावर्ती और वामावर्ती का फ़र्क, और शिव पूजा वाला वह अपवाद जिस पर सबसे ज़्यादा भ्रम रहता है — शास्त्र और लोक-परंपरा, दोनों को अलग-अलग पहचानते हुए।
घर में आरती शुरू होते ही कोई न कोई शंख उठा लेता है। बच्चा पूछ बैठे कि "इसे बजाते क्यों हैं?" तो अक्सर जवाब मिलता है — "बस, ऐसा ही होता है।" पर सवाल जायज़ है। शंख असल में एक समुद्री जीव का खोल है; वह मंदिर की चौकी तक कैसे पहुँचा, और उसे फूँकना पूजा का अंग कैसे बन गया? इसका उत्तर एक जगह नहीं मिलता — कुछ पुराण-कथा में है, कुछ परंपरा में, और कुछ बातों का कारण साफ़-साफ़ कहीं लिखा ही नहीं मिलता। तीनों को अलग-अलग पहचान लेना ही सबसे ईमानदार तरीक़ा है।
शंख कहाँ से आया — समुद्र-मंथन और पांचजन्य
पुराणों में समुद्र-मंथन की कथा आती है, जिसमें समुद्र से निकले रत्नों की सूची दी गई है। लोक-परंपरा में शंख को इन्हीं रत्नों में गिना जाता है और लक्ष्मी का सहोदर कहा जाता है — यही कारण है कि शंख को घर की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। ध्यान रहे, रत्नों की गिनती और नाम अलग-अलग पुराणों में एक-से नहीं हैं, इसलिए इसे "सर्वमान्य शास्त्रीय सूची" कहना ठीक नहीं होगा।
दूसरी ओर पांचजन्य की कथा अलग है। भागवत में आता है कि श्रीकृष्ण ने पंचजन नामक असुर का वध कर उसका शंख लिया, और वही पांचजन्य कहलाया। महाभारत में युद्ध के आरंभ में पांचजन्य की ध्वनि का प्रसिद्ध वर्णन है। विष्णु के चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म — इस स्वरूप से शंख का सीधा संबंध विष्णु से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि विष्णु, कृष्ण और लक्ष्मी की पूजा में शंख इतना केंद्रीय है।
नाद और ॐ से जोड़ने की परंपरा
परंपरा में शंखध्वनि को नाद का प्रतीक माना गया है और उसकी आवाज़ को ॐ के उच्चारण के निकट बताया जाता है। भाव यह है कि सृष्टि का आरंभ ध्वनि से हुआ, और पूजा का आरंभ भी ध्वनि से हो। इसीलिए शंख आरती के प्रारंभ और समापन पर बजाया जाता है — यह एक तरह की घोषणा है कि अब सांसारिक बातचीत बंद, अब पूजा शुरू।
यहाँ एक बात साफ़ कह देनी चाहिए। शंख की ध्वनि से हवा शुद्ध होने, रोगाणु मरने या किसी विशेष "आवृत्ति" से उपचार होने जैसे दावे आजकल बहुत सुनने को मिलते हैं। ये दावे न शास्त्र में हैं, न इनका कोई भरोसेमंद आधार है। शंख बजाने का जो कारण परंपरा देती है, वह भावनात्मक और प्रतीकात्मक है — मन को इकट्ठा करना, वातावरण में एक स्पष्ट संकेत देना। यही कारण पर्याप्त है; उसे विज्ञान का जामा पहनाने की ज़रूरत नहीं।
दक्षिणावर्ती और वामावर्ती — दोनों का काम अलग है
शंख मुख्यतः दो प्रकार के माने जाते हैं, और यह भेद केवल दिखावटी नहीं है:
- दक्षिणावर्ती शंख — जिसका मुख दाहिनी ओर खुलता है। यह दुर्लभ होता है और परंपरा में इसे लक्ष्मी-स्वरूप मानकर पूजा-स्थल पर स्थापित किया जाता है। सामान्यतः इसे बजाया नहीं जाता, इसमें जल भरकर अभिषेक या छिड़काव किया जाता है।
- वामावर्ती शंख — जिसका मुख बाईं ओर खुलता है। यही आम तौर पर मिलता है और यही बजाने के काम आता है। घरों और मंदिरों में आरती के समय जो शंख फूँका जाता है, वह प्रायः यही है।
बाज़ार में "दक्षिणावर्ती" के नाम पर बहुत कुछ बिकता है, और दाम भी मनमाने लगते हैं। सीधी बात यह है कि दक्षिणावर्ती शंख का महत्व श्रद्धा का विषय है, अनिवार्यता का नहीं। साधारण वामावर्ती शंख से की गई पूजा किसी तरह कम नहीं होती।
जो लोग अक्सर गलत समझते हैं — पूजा का शंख और बजाने का शंख
यह वह नियम है जिसे लोग सबसे ज़्यादा खोजते हैं और सबसे कम समझते हैं। परंपरा कहती है — जिस शंख की पूजा होती है, उसे बजाया नहीं जाता; और जिसे बजाया जाता है, उसकी पूजा नहीं की जाती। इसीलिए कई घरों में दो शंख रखे मिलते हैं।
इसके पीछे तर्क बहुत व्यावहारिक है। जिस शंख को देव-स्वरूप मानकर चौकी पर स्थापित किया गया है, उसे मुँह से लगाना उसी भाव के विरुद्ध जाता है — जैसे विग्रह को छूने और उपयोग की वस्तु को छूने में अंतर होता है। दूसरी ओर, बजाने वाला शंख हर बार मुख से लगता है, धुलता है, इधर-उधर रखा जाता है — उसे स्थापित देव-वस्तु की तरह बरतना कठिन है।
कुछ और बातें जो घर-घर की परंपरा में चलती हैं:
- बजाने वाले शंख को उपयोग के बाद धोकर, सूखे कपड़े पर उल्टा रखा जाता है ताकि पानी अंदर न रुके।
- पूजा वाले शंख को सीधा, किसी आधार पर स्थापित किया जाता है — ज़मीन पर सीधा नहीं।
- कई परिवार शंख को दूसरों से साझा नहीं करते, क्योंकि वह मुख से लगने वाली वस्तु है।
यह भी जान लें कि यह सब नियम-स्तर की बात है, दंड-स्तर की नहीं। भूल हो जाए तो कुछ "अनिष्ट" नहीं होता — बस अगली बार ध्यान रख लीजिए।
शिव पूजा में शंख वर्जित क्यों माना जाता है — शंखचूड़ की कथा
यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला अपवाद है। परंपरा में शंखचूड़ नामक असुर की कथा आती है — वह विष्णु का परम भक्त था, पर उसके अत्याचार बढ़ने पर शिव ने उसका वध किया। कथा के अनुसार उसी के अस्थि-अवशेष से शंख की उत्पत्ति मानी गई। चूँकि वह विष्णु-भक्त था, शंख विष्णु और लक्ष्मी को प्रिय हुआ; पर शिव द्वारा वध किए गए असुर से जुड़ा होने के कारण शिव-पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित माना गया। यह कथा ब्रह्मवैवर्त और शिव से संबंधित पुराण-साहित्य में मिलती है, और रूप अलग-अलग जगह थोड़ा बदलता भी है।
अब वह बारीकी जो अक्सर छूट जाती है: वर्जना मुख्यतः शंख से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की है, शंख बजाने की नहीं। बहुत से शिव मंदिरों में आरती के समय शंखध्वनि होती है और उसे कोई दोष नहीं माना जाता। शिव को जल लोटे या ताम्रपात्र से अर्पित किया जाता है। साथ ही यह भी सच है कि हर सम्प्रदाय इस निषेध को एक-सा नहीं मानता — कुछ शैव परंपराओं और दक्षिण भारत के कई मंदिरों में शंख का प्रयोग सहज रूप से होता है। इसलिए "यही एकमात्र सही तरीक़ा है" कहने के बजाय अपने घर या मंदिर की परंपरा का पालन करना ही ठीक है।
कब बजाएँ, कितनी बार — और जहाँ कारण नहीं मिलता
सामान्य व्यवहार यह है कि शंख आरती के आरंभ में और अंत में बजाया जाता है, कहीं-कहीं तीन बार। कितनी बार बजाना है, इसका कोई एक शास्त्रीय आदेश नहीं मिलता — यह घर-घर और मंदिर-मंदिर बदलता है। इसी तरह शंख को किस दिशा में रखें, इस पर भी परंपराएँ भिन्न हैं। जहाँ कारण नहीं मिलता, वहाँ कारण गढ़ने से बेहतर है यह मान लेना कि यह चलन है, विधान नहीं।
व्रत, एकादशी या किसी विशेष पूजा का दिन तय करते समय तिथि और मुहूर्त देख लेना उपयोगी रहता है — इसके लिए आज का पंचांग देखा जा सकता है। और यदि आप किसी विशेष देव-उपासना का विचार कर रहे हैं, तो कुंडली में ग्रह-स्थिति देखकर दिशा तय करना कई लोगों को सुविधाजनक लगता है।
सार
शंख विष्णु से जुड़ा प्रतीक है, जिसकी उत्पत्ति समुद्र-मंथन और पांचजन्य की कथाओं से जोड़ी जाती है, और जिसकी ध्वनि को परंपरा नाद का रूप मानती है। पूजा वाला शंख बजाया नहीं जाता और बजाने वाले की पूजा नहीं होती — यह भेद व्यवहार का है, भय का नहीं। शिव पूजा में शंख से जल अर्पण वर्जित माना जाता है, पर यह निषेध भी हर परंपरा में एक-सा नहीं है। बाक़ी जहाँ कारण स्पष्ट न मिले, वहाँ श्रद्धा पर्याप्त है — मनगढ़ंत व्याख्या की आवश्यकता नहीं।