शारदीय नवरात्रि 2026: 11 से 20 अक्टूबर का पूरा कैलेंडर और सप्तमी दो दिन क्यों
नवरात्रि 2026 का आरंभ 11 अक्टूबर को और समापन 20 अक्टूबर विजयादशमी के साथ। बीच में सप्तमी 17 और 18 — दोनों दिन पड़ रही है, और दुर्गा अष्टमी तथा महानवमी एक ही दिन, 19 अक्टूबर को। पूरा कैलेंडर और इसके पीछे का सीधा कारण।
शारदीय नवरात्रि 2026 का आरंभ रविवार, 11 अक्टूबर से है और समापन मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ। यहाँ तक बात सीधी है। उलझन बीच में है — सप्तमी लगातार दो दिन, 17 और 18 अक्टूबर को पड़ रही है, और उसके बाद दुर्गा अष्टमी तथा महानवमी दोनों 19 अक्टूबर को आ रही हैं।
यह किसी पंचांग की भूल नहीं है। इस वर्ष तिथियों का गणित यही निकलता है। नीचे दिन-प्रतिदिन का पूरा विवरण है, और उसके बाद सीधी भाषा में यह भी कि नौ दिन इस तरह क्यों बँटे हैं। सभी समय दिल्ली के अनुसार और भारतीय मानक समय में हैं।
पहले सीधी बात
- घटस्थापना: रविवार, 11 अक्टूबर 2026
- प्रतिपदा तिथि: आरंभ 10 अक्टूबर 21:20:43, समाप्ति 11 अक्टूबर 21:32:11
- सप्तमी: शनिवार 17 अक्टूबर और रविवार 18 अक्टूबर — एक ही तिथि, दो दिन
- दुर्गा अष्टमी: सोमवार, 19 अक्टूबर
- महानवमी: सोमवार, 19 अक्टूबर — उसी दिन
- विजयादशमी (दशहरा): मंगलवार, 20 अक्टूबर
- नवरात्रि की अवधि: 11 से 19 अक्टूबर, नौ दिन
नवरात्रि सीधे पितृपक्ष की समाप्ति से जुड़ती है। सर्व पितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026 को है, और प्रतिपदा उसी रात 21:20:43 पर लग जाती है।
घटस्थापना 11 अक्टूबर: चित्रा और वैधृति की अड़चन
घटस्थापना का सामान्य नियम है — प्रतिपदा में, दिन के पहले एक-तिहाई भाग में कलश स्थापित करना। 11 अक्टूबर को दिल्ली में सूर्योदय 06:20 और सूर्यास्त 17:55 है, इसलिए वह पहला तिहाई भाग 06:20 से 10:11 तक बनता है।
अड़चन यह है कि घटस्थापना के लिए चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग को छोड़ने का निर्देश भी है। और 11 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के समय पंचांग में दोनों ही चल रहे हैं — चित्रा नक्षत्र (पाद 2) और वैधृति योग। चित्रा सूर्योदय पर केवल दूसरे पाद में है, यानी दिन में काफ़ी देर तक रहेगी। सुबह का वह पहला तिहाई भाग साफ़ नहीं है।
इसका स्वीकृत समाधान यह है कि ये पूर्ण निषेध नहीं हैं। चित्रा या वैधृति के रहते घटस्थापना अभिजित मुहूर्त में की जाती है, जो दिन का मध्य मुहूर्त है। उस दिन के दिल्ली सूर्योदय-सूर्यास्त से निकाला गया अभिजित लगभग 11:44 से 12:31 तक बैठता है। प्रतिपदा 21:32:11 तक है, इसलिए यह समय तिथि के भीतर आराम से आ जाता है।
एक बात स्पष्ट कह देनी चाहिए — शास्त्र यह निषेध बताते हैं, कारण नहीं बताते। चित्रा और वैधृति को क्यों छोड़ा जाए, इसका कोई कारण उपलब्ध नहीं है, और कोई कारण गढ़ लेने से नियम न मज़बूत होगा न कमज़ोर।
पूरा कैलेंडर: तारीख, तिथि, देवी, रंग
| तारीख | वार | तिथि (समाप्ति) | देवी | रंग |
|---|---|---|---|---|
| 11 अक्टूबर | रविवार | प्रतिपदा — 21:32:11 | शैलपुत्री | नारंगी |
| 12 अक्टूबर | सोमवार | द्वितीया — 22:14:16 | ब्रह्मचारिणी | सफ़ेद |
| 13 अक्टूबर | मंगलवार | तृतीया — 23:28:25 | चन्द्रघण्टा | लाल |
| 14 अक्टूबर | बुधवार | चतुर्थी — 15 अक्टूबर 01:14:06 | कूष्माण्डा | गहरा नीला |
| 15 अक्टूबर | गुरुवार | पंचमी — 16 अक्टूबर 03:26:02 | स्कन्दमाता | पीला |
| 16 अक्टूबर | शुक्रवार | षष्ठी — 17 अक्टूबर 05:54:58 | कात्यायनी | हरा |
| 17 अक्टूबर | शनिवार | सप्तमी — 18 अक्टूबर 08:28:28 | कालरात्रि | धूसर |
| 18 अक्टूबर | रविवार | सप्तमी फिर से — वही तिथि, दूसरा सूर्योदय | कालरात्रि | नारंगी |
| 19 अक्टूबर | सोमवार | अष्टमी 10:52:04 तक, फिर नवमी | महागौरी और सिद्धिदात्री | सफ़ेद |
| 20 अक्टूबर | मंगलवार | नवमी 12:50:40 तक, फिर दशमी | विजयादशमी | — |
सप्तमी दो दिन क्यों पड़ रही है
तिथि और दिन एक चीज़ नहीं हैं। तिथि वह अवधि है जिसमें चंद्रमा सूर्य से बारह अंश आगे निकलता है, और यह अवधि लगभग 21 से 26 घंटे के बीच कुछ भी हो सकती है। दिन तय है, तिथि नहीं — दोनों का बँटवारा बराबर नहीं बैठता।
इसे सुलझाने का नियम सरल है: सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, वही उस दिन की तिथि मानी जाती है। आम तौर पर एक तिथि एक ही सूर्योदय पकड़ती है। लेकिन अगर कोई तिथि लंबी हो और सूर्योदय से थोड़ा ही पहले शुरू हो जाए, तो वह अगले सूर्योदय तक भी चलती रह सकती है — और दो दिन ले लेती है। इसी को तिथि वृद्धि कहते हैं। इसका उल्टा तिथि क्षय है, जब छोटी तिथि दो सूर्योदयों के बीच ही शुरू होकर समाप्त हो जाती है। तिथि पर हमारा विस्तृत पन्ना दोनों को समझाता है।
इस वर्ष सप्तमी 17 अक्टूबर को 05:54:58 पर आरंभ होकर 18 अक्टूबर को 08:28:28 पर समाप्त होती है। दिल्ली में दोनों सुबह सूर्योदय 06:24 का है। सप्तमी दोनों सूर्योदयों पर चल रही है — इसलिए दोनों दिन उसी के हैं।
वे 29 मिनट जिन्होंने पूरा कैलेंडर तय कर दिया
यह मान लेना आसान है कि तिथि लंबी थी इसलिए वृद्धि हुई। अकेले यही कारण नहीं है। इस नवरात्रि की हर तिथि 24 घंटे से लंबी है — चंद्रमा इस दौर में धीमा चल रहा है। सप्तमी अलग इसलिए पड़ी क्योंकि वह कहाँ से शुरू हुई।
| तिथि | आरंभ | समाप्ति | अवधि | कितने सूर्योदय |
|---|---|---|---|---|
| षष्ठी | 16 अक्टूबर 03:26:02 | 17 अक्टूबर 05:54:58 | 26 घं 29 मि | 1 (16 अक्टूबर) |
| सप्तमी | 17 अक्टूबर 05:54:58 | 18 अक्टूबर 08:28:28 | 26 घं 34 मि | 2 (17 और 18) |
| अष्टमी | 18 अक्टूबर 08:28:28 | 19 अक्टूबर 10:52:04 | 26 घं 24 मि | 1 (19 अक्टूबर) |
| नवमी | 19 अक्टूबर 10:52:04 | 20 अक्टूबर 12:50:40 | 25 घं 59 मि | 1 (20 अक्टूबर) |
अष्टमी की अवधि लगभग सप्तमी जितनी ही है, फिर भी उसे एक ही दिन मिला। अंतर आरंभ के अंतर का है। सप्तमी 17 अक्टूबर के सूर्योदय से 29 मिनट 2 सेकंड पहले लगी, और इसी बढ़त के कारण वह अगले सूर्योदय को भी दो घंटे के अंतर से पार कर गई। षष्ठी, जो उतनी ही लंबी थी, उन्हीं 29 मिनटों से 17 अक्टूबर के सूर्योदय से चूक गई। चंद्रमा आधा घंटा और धीमा होता तो अतिरिक्त दिन षष्ठी को मिलता और सप्तमी सामान्य रहती।
दुर्गा अष्टमी और महानवमी एक ही दिन क्यों
19 अक्टूबर के सूर्योदय पर अष्टमी चल रही है, इसलिए दुर्गा अष्टमी 19 अक्टूबर को है। यह सीधा है।
महानवमी में थोड़ी व्याख्या चाहिए। नवमी का इकलौता सूर्योदय 20 अक्टूबर का है — पर 20 अक्टूबर तो विजयादशमी है। दुर्गा पूजा में निर्णायक समय सूर्योदय नहीं, अपराह्न होता है — दिन के पाँच बराबर भागों में से चौथा। 19 अक्टूबर को अपराह्न लगभग 13:14 से 15:30 तक है, और नवमी 10:52:04 से चल रही है। यानी 19 अक्टूबर का अपराह्न नवमी के पास है, इसलिए महानवमी 19 अक्टूबर को ही मानी जाएगी, अष्टमी के साथ।
इन दोनों के जोड़ पर संधि पूजा होती है — अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट। इस वर्ष यह समय 19 अक्टूबर को 10:28:04 से 11:16:04 तक बनता है।
20 अक्टूबर को सूर्योदय पर नवमी, फिर भी दशहरा
20 अक्टूबर का पंचांग देखने वाले को सूर्योदय पर नवमी दिखेगी और वह सोचेगा कि दशहरा कैसे। नियम वही है, बस दोबारा लगाया गया। दशमी 12:50:40 पर लग जाती है, और 20 अक्टूबर का अपराह्न लगभग 13:13 से 15:29 तक है। पूरा अपराह्न दशमी में है, इसलिए विजयादशमी 20 अक्टूबर को है। दोनों निर्णय आपस में मेल खाते हैं — 19 का अपराह्न नवमी का, 20 का अपराह्न दशमी का।
कुल असर पर ध्यान दीजिए। सप्तमी की वृद्धि ने एक दिन जोड़ा, अष्टमी-नवमी के मिलने ने एक दिन घटा दिया। नवरात्रि फिर भी नौ दिन की ही रही — 11 से 19 अक्टूबर — बस भीतर का ढाँचा बदल गया।
नौ रंग — जो सच है और जो नहीं
रंगों की सूची एक आधुनिक चलन है और वार से जुड़ी है: रविवार नारंगी, सोमवार सफ़ेद, मंगलवार लाल, बुधवार गहरा नीला, गुरुवार पीला, शुक्रवार हरा, शनिवार धूसर। यह चलन 2000 के दशक में मराठी और गुजराती अख़बारों से फैला और अब लगभग हर जगह छपता है।
इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं है, अलग-अलग सूचियाँ आपस में मेल नहीं खातीं, और रंग न पहनने से पूजा में कोई कमी नहीं आती। हम इसे इसलिए दे रहे हैं कि लोग खोजते हैं, इसलिए नहीं कि इसमें कोई प्रमाण है। तालिका में दी गई नवदुर्गा की सूची अलग बात है — वे नौ स्वरूप देवी कवच से हैं और तिथि के साथ उनका जोड़ परंपरागत है।
आपके शहर में सूर्योदय अलग है
ऊपर के सारे समय दिल्ली के हैं। तिथि के आरंभ और समाप्ति के क्षण खगोलीय हैं और पूरे देश में एक ही रहते हैं, पर सूर्योदय एक नहीं रहता — और तिथि किस दिन की मानी जाएगी, यह सूर्योदय ही तय करता है। उदाहरण के लिए 15 सितंबर 2026 को हमारे पंचांग में सूर्योदय इस प्रकार है:
| शहर | सूर्योदय (15 सितंबर 2026, केवल उदाहरण) |
|---|---|
| कोलकाता | 05:23 |
| चेन्नई | 05:58 |
| दिल्ली | 06:07 |
| मुंबई | 06:26 |
| अहमदाबाद | 06:27 |
यानी देश भर में एक घंटे से ज़्यादा का अंतर। सामान्य वर्षों में इससे कुछ नहीं बदलता। पर इस बार पूरा गणित 29 मिनट के अंतर पर टिका है, इसलिए दिल्ली का समय अपने ऊपर मान लेने के बजाय अपने शहर का पंचांग देख लीजिए।
व्रत रखने वालों के लिए सीधा मतलब
व्यावहारिक रूप से बहुत कम बदलता है। व्रत 11 से 19 अक्टूबर, नौ दिन का रहेगा, और 19 को अष्टमी-नवमी पूजन के साथ पूरा होगा। एक ही समायोजन सप्तमी का है — वह 17 और 18, दोनों दिन है, और कालरात्रि की पूजा प्रायः दोनों दिन की जाती है। जो घर एक ही सप्तमी रखते हैं, वे आम तौर पर दूसरा दिन लेते हैं, क्योंकि वही अष्टमी से जुड़ता है। इस पर सभी परंपराओं में एक जैसा निर्णय नहीं है, और यह कह देना हमें गढ़े हुए निश्चय से बेहतर लगता है।
दशहरे के बाद इसी पक्ष का अगला व्रत पापांकुशा एकादशी, 22 अक्टूबर है।