विजयादशमी 2026: 20 अक्टूबर मुहूर्त, शस्त्र पूजा और अपराजिता पूजा
20 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय पर नवमी चल रही है और दशमी 12:50:40 पर लगती है — फिर भी दशहरा 20 का ही है। पढ़िए अपराह्नव्यापिनी दशमी का गणित, विजय मुहूर्त 13:58-14:44, शस्त्र-अपराजिता-शमी पूजा, और रावण दहन प्रदोष में क्यों।
विजयादशमी, यानी दशहरा, इस साल मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है। तारीख़ पर विवाद नहीं है — उलझन इस बात पर होती है कि 20 की सुबह जब सूर्योदय होता है, तब आकाश में दशमी है ही नहीं। आश्विन शुक्ल दशमी 20 अक्टूबर को दोपहर 12:50:40 पर शुरू होती है और 21 अक्टूबर को 14:11:35 पर समाप्त होती है। फिर भी पर्व 20 का ही है, और इसका कारण साफ़ है।
नीचे दिए सभी समय दिल्ली, भारतीय मानक समय के हैं। सूर्योदय हर शहर में अलग होता है और यहाँ का हर मुहूर्त उसी से बनता है — अंतिम खंड देखिए।
विजयादशमी 2026: पंचांग के आँकड़े
शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 को आरंभ हुई, महानवमी 19 अक्टूबर को पड़ी, और 20 को विजयादशमी के साथ यह क्रम पूरा होता है। नौ दिनों का पूरा विवरण नवरात्रि 2026 कैलेंडर में है, और अष्टमी-नवमी के नियम दुर्गा अष्टमी और महानवमी 2026 में।
- तिथि: आश्विन शुक्ल दशमी
- आरंभ: 20 अक्टूबर 2026, 12:50:40
- समाप्ति: 21 अक्टूबर 2026, 14:11:35
- वार: मंगलवार
- सूर्योदयकालीन नक्षत्र: श्रवण, तृतीय चरण (मकर राशि)
- सूर्योदय / सूर्यास्त, 20 अक्टूबर: 06:25 / 17:45
20 की सुबह तो नवमी चल रही है
अधिकांश व्रत उदयातिथि से तय होते हैं — सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, दिन उसी का। यहाँ यही नियम लगाइए तो उत्तर ग़लत आएगा। 20 अक्टूबर को 06:25 पर शुक्ल नवमी चल रही है, जो 12:50:40 तक रहेगी; 21 को 06:26 पर उदयातिथि दशमी है। केवल उदयातिथि पर बना पंचांग दशहरा 21 को छापेगा।
पर विजयादशमी का निर्णय उदयातिथि से होता ही नहीं। यह इस बात से होता है कि दशमी किस दिन के अपराह्न पर बैठ रही है। बस यही एक शब्द बदलिए, और सारी उलझन ख़त्म।
अपराह्नव्यापिनी दशमी का अर्थ
शास्त्रीय दिनमान — सूर्योदय से सूर्यास्त तक — घंटों में नहीं, पाँच बराबर भागों में बाँटा जाता है: प्रातः, संगव, मध्याह्न, अपराह्न, सायाह्न। अपराह्न चौथा भाग है, मोटे तौर पर दोपहर बाद का समय, पर इसकी सीमाएँ दिनमान पर निर्भर हैं।
नियम यह है कि जिस दिन के अपराह्न में दशमी विद्यमान हो, पर्व उसी दिन। लगातार दो दिन छूती हो तो पहला दिन; किसी दिन न छूती हो तो जिस दिन अधिक भाग हो। इस वर्ष दोनों कसौटियाँ एक ही दिशा में इशारा करती हैं।
20 और 21 अक्टूबर का गणित
20 अक्टूबर को सूर्योदय 06:25 और सूर्यास्त 17:45 है, यानी दिनमान 11 घंटे 20 मिनट — 680 मिनट। पाँच से भाग देने पर हर भाग 136 मिनट का हुआ, और चौथा भाग सूर्योदय के 408 मिनट बाद शुरू होता है। इसलिए अपराह्न 13:13 से 15:29 तक है।
दशमी अपराह्न खुलने से बाईस मिनट पहले, 12:50:40 पर लग जाती है और अगले दिन दोपहर तक चलती है — इसलिए 20 अक्टूबर के पूरे अपराह्न को, पूरे 136 मिनट को ढक लेती है। 21 को अपराह्न 13:12:48 से 15:28:24 तक है, पर दशमी 14:11:35 पर समाप्त हो जाती है — केवल पहले 58 मिनट 47 सेकंड। उसके बाद एकादशी।
| विवरण | मंगलवार, 20 अक्टूबर | बुधवार, 21 अक्टूबर |
|---|---|---|
| सूर्योदय / सूर्यास्त | 06:25 / 17:45 | 06:26 / 17:44 |
| सूर्योदय की तिथि | शुक्ल नवमी | शुक्ल दशमी |
| अपराह्न काल | 13:13:00 – 15:29:00 | 13:12:48 – 15:28:24 |
| अपराह्न में दशमी | 136 मिनट (पूरा) | 58 मिनट 47 सेकंड (लगभग 43%) |
| सूर्योदयकालीन नक्षत्र | श्रवण | धनिष्ठा |
| राहुकाल | 14:55 – 16:20 | 12:05 – 13:30 |
| निर्णय | विजयादशमी | सामान्य दशमी |
पहले दिन पूरा अपराह्न, दूसरे दिन आधे से भी कम — इस बार बहस की गुंजाइश ही नहीं है।
विजय मुहूर्त: 13:58 से 14:44
अपराह्न के भीतर ही वह समय है जिससे पर्व को नाम मिला। दिनमान पंद्रह मुहूर्तों में भी बाँटा जाता है; ग्यारहवें का नाम विजय है। 20 अक्टूबर को हर मुहूर्त 45 मिनट 20 सेकंड का है, इसलिए विजय मुहूर्त 13:58:20 से 14:43:40 तक — पूरी तरह अपराह्न के भीतर, इसीलिए दोनों साथ बताए जाते हैं।
| काल | दिल्ली, 20 अक्टूबर 2026 | किसके लिए |
|---|---|---|
| अभिजित मुहूर्त | 11:42 – 12:28 | यहाँ अभी नवमी चल रही है, दशमी नहीं |
| अपराह्न | 13:13 – 15:29 | दशमी पूजन, अपराजिता पूजा, शमी पूजा |
| विजय मुहूर्त | 13:58 – 14:44 | अपराह्न के भीतर सर्वोत्तम भाग |
| राहुकाल | 14:55 – 16:20 | विजय मुहूर्त बीतने के बाद शुरू |
| प्रदोष (सूर्यास्त से) | 17:45 से | रावण दहन, रामलीला |
अभिजित वाली पंक्ति ध्यान से देखिए। आठवाँ मुहूर्त 11:42 पर पड़ रहा है, जब नवमी ही चल रही है — इस बार वह दशमी का समय नहीं है। राहुकाल विजय मुहूर्त बीतने के ग्यारह मिनट बाद, 14:55 पर शुरू होता है, यानी कोई टकराव नहीं — किसी भी दिन का राहुकाल राहुकाल पृष्ठ पर देखिए।
शस्त्र पूजा और आयुध पूजा
शस्त्र पूजा का अर्थ केवल हथियार नहीं — जीविका के औज़ार भी। हल, मशीन, वाहन और बहीखाते तक साफ़ किए जाते हैं, हल्दी-कुंकुम से चिह्नित होते हैं, फूल-अक्षत चढ़ते हैं, और पूजा भर उन्हें छुआ नहीं जाता। उत्तर भारत में यह दशमी को, अपराह्न में होती है।
क्षेत्रीय भेद यहाँ मायने रखता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में आयुध पूजा दशमी की नहीं, महानवमी की है — इस वर्ष 19 अक्टूबर — और विजयादशमी वहाँ विद्यारंभ का दिन है, विशेषकर केरल में। दोनों परंपराएँ प्राचीन हैं, कोई किसी का बिगड़ा रूप नहीं। यदि आपका परिवार दक्षिण की रीति मानता है तो आपका दिन 19 तारीख़ है।
अपराजिता पूजा
अपराजिता का अर्थ है — जिसे कोई पराजित न कर सके। विधि निश्चित है: घर के ईशान कोण में स्वच्छ भूमि या चौकी पर अष्टदल कमल बनता है, बीच में अपराजिता का आवाहन होता है, दोनों ओर जया और विजया का, और फूल, अक्षत, धूप तथा दीप से पूजन होता है। यह अपराह्न में की जाती है — 20 अक्टूबर को 13:13 से 15:29 के बीच, विजय मुहूर्त सबसे उपयुक्त भाग है।
शास्त्र समय और विधि बताते हैं। अष्टदल क्यों, या अपराह्न ही क्यों — इसका कोई अलग कारण वे नहीं देते, और गढ़ा हुआ कारण जोड़ने से कुछ नहीं मिलता।
शमी पूजा और सीमोल्लंघन
महाभारत में पांडवों ने अज्ञातवास के समय अपने अस्त्र शमी (खेजड़ी) के वृक्ष में छिपाए थे और वर्ष पूरा होने पर वहीं से वापस लिए — शस्त्रों की यही वापसी शस्त्र पूजा से जुड़ जाती है। कहा जाता है कि श्रीराम ने भी रावण पर चढ़ाई से पहले शमी का पूजन किया था।
इसी से सीमोल्लंघन की रीति बनी: दोपहर बाद गाँव या नगर की सीमा पार करना, अपने अभीष्ट कार्य की दिशा में जाना, मार्ग में शमी का पूजन करना और उसके पत्ते घर लाना। महाराष्ट्र में जो पत्ते बड़ों को "सोना" कहकर दिए जाते हैं, वे प्रायः आपटा के होते हैं। वृक्ष न मिले तो टहनी से भी काम चलता है।
रावण दहन प्रदोष में ही क्यों
20 अक्टूबर को सूर्यास्त 17:45 पर है, और प्रदोष — सूर्यास्त से आरंभ होने वाला काल — वही समय है जब पुतले जलते हैं। प्रदोष की लंबाई अलग-अलग ग्रंथों में अलग है; सबसे प्रचलित मान सूर्यास्त के बाद दो घंटे चौबीस मिनट का है, यानी दिल्ली में लगभग 17:45 से 20:09।
यहाँ सच कहना ज़रूरी है। रावण के पुतले जलाने का कोई शास्त्रीय मुहूर्त नहीं है। यह रामलीला की परंपरा है, जो उत्तर भारत में रामचरितमानस के साथ फैली, और जो निर्णय-ग्रंथ दशमी व्रत तथा अपराह्न के कर्म तय करते हैं वे पुतले पर मौन हैं। शाम का समय व्यावहारिक है — भीड़ काम के बाद ही जुटती है, और जलता पुतला अँधेरे आकाश में दिखता भी है। जो सात बजे के पुतले का ज्योतिषीय कारण बताए, वह कारण गढ़ रहा है। दिन का शास्त्रीय केंद्र अपराह्न के कर्म हैं; मैदान की शाम उसके चारों ओर उगी संस्कृति।
आपके शहर का सूर्योदय सब बदल देता है
ऊपर का हर समय दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से निकला है। भारत एक ही समय-क्षेत्र में लगभग तीस देशांतर तक फैला है, इसलिए एक ही तारीख़ को कोलकाता का सूर्योदय मुंबई या अहमदाबाद से लगभग एक घंटा पहले होता है, और सुदूर पूर्वोत्तर तथा गुजरात के बीच यह अंतर और भी बड़ा है। अपराह्न, विजय मुहूर्त और प्रदोष, तीनों उसी के साथ खिसकते हैं।
गणित दोहराना कठिन नहीं: अपने शहर का सूर्योदय-सूर्यास्त लीजिए, दिनमान निकालिए, पाँच से भाग देकर चौथा भाग अपराह्न है और पंद्रह से भाग देकर ग्यारहवाँ भाग विजय मुहूर्त। सूर्योदय-सूर्यास्त दैनिक पंचांग पर मिलेगा। तिथि के आरंभ-समाप्ति के समय स्थान के साथ नहीं बदलते — केवल सूर्य से बने ये काल बदलते हैं।