बलराम जयंती 2026: 2 सितंबर या 16 सितंबर? दो तारीखें क्यों चलती हैं

तीन पंचांग, तीन तारीखें — 28 अगस्त, 2 सितंबर और 16 सितंबर 2026। हमारे पंचांग से दोनों षष्ठी की सही तिथि अवधि, यह कि दोनों दिन सूर्योदय पर पंचमी क्यों दिखती है, और अपने घर की परंपरा कैसे तय करें।

एक ही मोहल्ले के तीन घरों में पूछिए कि 2026 में बलराम जयंती कब है, तो तीन जवाब मिल सकते हैं — 28 अगस्त, 2 सितंबर, 16 सितंबर। पंचांग आपस में लड़ नहीं रहे। वे एक ही चंद्रमा पर अलग-अलग, बराबर पुराने नियम लगा रहे हैं। नियम दिख जाएँ तो यह उलझन नहीं रहती, और अपने घर के लिए तारीख तय करना एक मिनट का काम हो जाता है।

तीन तारीखें, और कोई भी गलत नहीं

बलराम श्रीकृष्ण के बड़े भाई हैं, और उनके प्राकट्य की तिथि पर परंपरा कभी एकमत नहीं रही। सबसे पहले यह साफ़ कह देना ठीक है — पुराण कोई तिथि देते ही नहीं। भागवत में देवकी के गर्भ का रोहिणी के गर्भ में संकर्षण होने का वर्णन है, इसीलिए उनका एक नाम संकर्षण है; पर वहाँ उस घटना को किसी चंद्र-तिथि से नहीं बाँधा गया, जैसे श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र वाली अष्टमी से बँधा है। जो है वह क्षेत्रीय व्रत-परंपराएँ हैं — हर एक अपने भीतर सुसंगत, और कोई भी शास्त्र के बल पर दूसरी से ऊपर नहीं। जो कहे कि इनमें से एक ही "असली" है, वह अपने क्षेत्र की बात कर रहा है, शास्त्र की नहीं।

2 सितंबर 2026 पर हमारा पंचांग क्या दिखाता है

उत्तर भारत के अधिकांश घरों में जो व्रत सचमुच रखा जाता है वह हलषष्ठी है — पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में ललही छठ, गुजरात के कुछ हिस्सों में रांधण छठ। यह पूर्णिमांत गणना की भाद्रपद कृष्ण षष्ठी पर बैठता है, जन्माष्टमी से ठीक छह तिथि पहले — बड़े भाई का दिन छोटे भाई के दिन से एक सप्ताह आगे। व्रत की पूरी विधि हमने हलषष्ठी और ललही छठ 2026 में अलग से लिखी है।

2026 में यहीं बात दिलचस्प हो जाती है। दिल्ली में यह षष्ठी 2 सितंबर को 06:12 बजे शुरू होकर 3 सितंबर को 04:26 बजे समाप्त होती है। 2 सितंबर का सूर्योदय 06:00 है, 3 सितंबर का 06:01। यानी षष्ठी दोनों सूर्योदय चूक जाती है — एक ओर साढ़े बारह मिनट से, दूसरी ओर पंचानबे मिनट से। सूर्योदय के आधार पर बनी तालिका में 2 सितंबर पर कृष्ण पंचमी लिखी मिलेगी और 3 सितंबर पर कृष्ण सप्तमी। षष्ठी किसी पंक्ति में दिखेगी ही नहीं।

यही तिथि क्षय है, और ठीक इसीलिए षष्ठी के व्रत सूर्योदय से तय नहीं होते। इनका निर्णय मध्याह्न व्यापिनी से होता है — वह तिथि जो दिन के बीच वाले पाँचवें भाग में चल रही हो। 2 सितंबर के दिनमान (06:00 से 18:40) को पाँच बराबर भागों में बाँटें तो मध्याह्न लगभग 11:04 से 13:36 तक बैठता है। षष्ठी इस पूरे समय चल रही है। इसलिए 2 सितंबर पर कोई संदेह नहीं।

16 सितंबर 2026 पर पंचांग क्या दिखाता है

16 सितंबर वाली तारीख, जो कई प्रचलित पंचांग बलराम जयंती के लिए छापते हैं, शुक्ल पक्ष की ओर इशारा करती है — भाद्रपद शुक्ल षष्ठी। हमारी तालिका में यह तिथि 16 सितंबर 09:00 से 17 सितंबर 10:48 तक चलती है (दिल्ली)।

अब दोनों नियम अलग दिशा में खींचते हैं। सूर्योदय के हिसाब से षष्ठी गुरुवार 17 सितंबर को व्यापिनी है — हमारे पंचांग में यही पंक्ति है, अनुराधा नक्षत्र और सूर्योदय 06:08 के साथ। मध्याह्न के हिसाब से 17 सितंबर का बीच वाला भाग 11:02 से 13:29 तक है, और षष्ठी 10:48 पर ही समाप्त हो चुकी — चौदह मिनट से चूक जाती है। 16 सितंबर को मध्याह्न 11:01 से 13:29 है और षष्ठी उसे पूरा ढक लेती है। इसलिए मध्याह्न-आधारित निर्णय बुधवार 16 सितंबर देता है और सूर्योदय-आधारित निर्णय 17 सितंबर। दोनों ठीक हैं; दोनों अलग सवाल का जवाब दे रहे हैं।

चारों स्थितियाँ एक साथ

तिथितारीख (2026)तिथि अवधि — ISTकहाँ मानी जाती है
श्रावण शुक्ल पूर्णिमाशुक्रवार 28 अगस्त27 अगस्त 09:08 → 28 अगस्त 09:48गौड़ीय वैष्णव और इस्कॉन — बलराम पूर्णिमा
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी (पूर्णिमांत)बुधवार 2 सितंबर2 सितंबर 06:12 → 3 सितंबर 04:26हलषष्ठी / ललही छठ — उ.प्र., बिहार, म.प्र., छत्तीसगढ़
भाद्रपद शुक्ल षष्ठीबुधवार 16 सितंबर (मध्याह्न) या गुरुवार 17 सितंबर (सूर्योदय)16 सितंबर 09:00 → 17 सितंबर 10:48कई मुद्रित पंचांगों में बलराम जयंती
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी (अमांत नाम से)शुक्रवार 2 अक्टूबर1 अक्टूबर 12:35 → 2 अक्टूबर 10:15वही तिथि-नाम, एक चंद्रमास बाद

तिथि की अवधि घड़ी का क्षण है, स्थान का नहीं — मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और पटना में यह बिलकुल यही रहती है। बदलता केवल सूर्योदय है, और उसी से यह सवाल बदलता है कि तिथि किस अंग्रेज़ी तारीख की मानी जाए। 16 सितंबर का सूर्योदय दिल्ली में 06:07 है, पर कोलकाता में 05:24 और मुंबई में 06:27। सीमारेखा वाले मामलों में अपने शहर की तिथि तालिका ज़रूर देख लें।

दोनों षष्ठी वाले दिन सूर्योदय पर पंचमी क्यों दिखती है

पाठकों को पंचांग में गलती का शक सबसे ज़्यादा इसी कारण होता है। 2 और 16 सितंबर 2026 — दोनों बुधवार — को दिल्ली में सूर्योदय के समय तिथि पंचमी है, और षष्ठी सुबह देर से शुरू होती है। जो पाठक सूर्योदय की तिथि देखकर पंचमी पाता है, वह मान लेता है कि त्योहार की तारीख एक दिन गलत छपी है। ऐसा नहीं है। मध्याह्न व्यापिनी व्रत यह पूछता है कि दोपहर में चंद्रमा कहाँ है, भोर में नहीं। तिथि और तारीख के इस फ़र्क़ को हमने अलग लेख में विस्तार से समझाया है।

अमांत गणना नाम बदलती है, दिन नहीं

उलझन का चौथा स्रोत मास-गणना है। पूर्णिमांत में मास पूर्णिमा पर बदलता है, अमांत में अमावस्या पर। जिस कृष्ण पक्ष को उत्तर भारत भाद्रपद कृष्ण कहता है, अमांत भाषा में वही श्रावण कृष्ण है — पक्ष एक, नाम दो। हमारे पंचांग में अमावस्या 11 सितंबर को है और अगली 10 अक्टूबर को, इसलिए जिस पक्ष को अमांत पंचांग भाद्रपद कृष्ण कहेगा उसमें 2 अक्टूबर 2026 पड़ता है।

व्यवहार में इससे किसी की तारीख नहीं हिलती। हलषष्ठी जन्माष्टमी से छह दिन पहले वाली षष्ठी पर टिकी है, और जन्माष्टमी 2026 सभी मतों में 4 सितंबर को है। जो घर यह व्रत रखते हैं वे सितंबर के आरंभ में ही रखते हैं, मास का नाम चाहे जो हो। पर यदि आपने कहीं "भाद्रपद कृष्ण षष्ठी" पढ़कर अक्टूबर निकाला है, तो कारण यही अमांत नाम है।

अपने घर की तारीख कैसे तय करें

  • क्या आपके घर हल से जुते अन्न का त्याग होता है, गाय की जगह भैंस का दूध-दही लिया जाता है, और आँगन में हल या छोटा गड्ढा बनाकर पूजा होती है? यह हलषष्ठी है। आपकी तारीख 2 सितंबर 2026 है।
  • क्या आपका घर गौड़ीय वैष्णव या इस्कॉन कैलेंडर मानता है और इसे राखी वाले दिन रखता है? तब बलराम प्राकट्य श्रावण पूर्णिमा, 28 अगस्त 2026 को है।
  • क्या आपका मुद्रित पंचांग बलराम जयंती भाद्रपद शुक्ल पक्ष में देता है? उसी का पालन करें — मध्याह्न नियम हो तो 16 सितंबर, सूर्योदय नियम हो तो 17 सितंबर। मानने से पहले देख लें कि वह कौन सा नियम लिखता है।
  • पता ही न हो तो? तब सही सवाल यह नहीं कि कौन सी तारीख शुद्ध है, बल्कि यह कि दादी-नानी कौन सी रखती थीं। किसी बुज़ुर्ग से पूछ लीजिए। यहाँ घर की निरंतरता किसी भी पंचांग से मज़बूत तर्क है, क्योंकि पंचांग स्वयं आपस में एकमत नहीं।

राहु काल, अभिजित और व्यावहारिक सवाल

एक बात सीधे कह देना ज़रूरी है। दोनों बुधवार को राहु काल दिन के ठीक बीच में बैठता है — दिल्ली में 2 सितंबर को 12:20 से 13:55 और 16 सितंबर को 12:15 से 13:48 — जो मध्याह्न की अवधि और अभिजित मुहूर्त (क्रमशः 11:55–12:46 और 11:51–12:40) के एक हिस्से से टकराता है। हर साल इससे घबराहट होती है, इसलिए स्पष्ट रूप से: राहु काल उन कार्यों पर लागू होता है जिन्हें आप स्वयं आरंभ करना चुनते हैं। तिथि से बँधा व्रत आपकी चुनी हुई मुहूर्त नहीं है। राहु काल के कारण त्योहार नहीं टाला जाता, और कोई शास्त्रीय निर्णय-ग्रंथ ऐसा कहता भी नहीं। फिर भी उससे बाहर बैठना हो तो दोनों दिन मध्याह्न का पहला भाग खाली है; न बैठ पाएँ तो कुछ बिगड़ता नहीं। शहरवार समय हमारे राहु काल पृष्ठ पर हैं।

संक्षेप में

उत्तर भारत के हलषष्ठी व्रत के लिए बुधवार 2 सितंबर 2026, दोपहर। शुक्ल पक्ष में बलराम जयंती रखने वाले पंचांगों के लिए मध्याह्न नियम से बुधवार 16 सितंबर 2026, सूर्योदय नियम से 17 सितंबर। गौड़ीय वैष्णवों के लिए 28 अगस्त। ऊपर के सभी समय दिल्ली और IST के अनुसार हैं; सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए सीमारेखा वाला निर्णय अपने शहर के पंचांग पर ही जाँचें।

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