छठ पूजा 2026: शहर अनुसार अर्घ्य का समय — संध्या 15, उषा 16 नवंबर

संध्या अर्घ्य 15 नवंबर 2026, रविवार को और उषा अर्घ्य 16 नवंबर, सोमवार को — पर मिनट आपके अपने शहर का सूर्यास्त और सूर्योदय है, जो पूर्णिया से मुंबई तक एक घंटे से ज़्यादा फैलता है। पटना, दिल्ली, कोलकाता, वाराणसी समेत 12 शहरों का समय हमारे सौर इंजन से।

छठ से पहले के आख़िरी हफ़्ते में हर घर में एक ही सवाल घूमता है — अर्घ्य कितने बजे है? और ज़्यादातर जगह जवाब एक ही समय में मिलता है, अक्सर दिल्ली का, मानो पूर्णिया से मुंबई तक सूरज एक ही मिनट पर डूबता हो। ऐसा नहीं है। 2026 में संध्या अर्घ्य 15 नवंबर, रविवार को है और उषा अर्घ्य 16 नवंबर, सोमवार को — और दोनों का मिनट आपके अपने शहर का सूर्यास्त और सूर्योदय है, न उससे कुछ ज़्यादा, न कम। नीचे की शहरवार तालिका हमारे सौर इंजन से, हर शहर के अपने निर्देशांक पर निकाली गई है।

छठ पूजा 2026: तिथियाँ, पुष्टि के साथ

छठ कार्तिक शुक्ल षष्ठी को रखा जाता है, जिसे हमारा पंचांग 15 नवंबर 2026, रविवार पर रखता है। चारों दिन इसी के इर्द-गिर्द सजते हैं:

  • नहाय-खाय — 13 नवंबर 2026, शुक्रवार
  • खरना — 14 नवंबर 2026, शनिवार
  • संध्या अर्घ्य — 15 नवंबर 2026, रविवार — डूबते सूर्य को
  • उषा अर्घ्य और पारण — 16 नवंबर 2026, सोमवार — उगते सूर्य को

दिल्ली के लिए हमारा इंजन 15 नवंबर का सूर्यास्त शाम 5:26 (17:26) और 16 नवंबर का सूर्योदय सुबह 6:45 (06:45) देता है। यही दो क्षण इस पर्व के दो अर्घ्य हैं; लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत खरना की शाम से दूसरे अर्घ्य तक इन्हीं के बीच टिका है। अपने शहर की षष्ठी की अवधि देखनी हो तो तिथि का समय देख लें।

अर्घ्य का कोई अलग मुहूर्त क्यों नहीं होता

लगभग हर दूसरे व्रत-पर्व में पंचांग को एक खिड़की खोजनी पड़ती है — कोई लग्न, कोई अभिजित, कोई प्रदोष काल — क्योंकि देवता सामने खड़े नहीं होते। छठ अलग है। यहाँ देवता स्वयं दिखते हुए सूर्य हैं, और अर्घ्य सीधे बिंब को दिया जाता है: षष्ठी की शाम डूबते बिंब को, अगली सुबह उगे हुए बिंब को। सूर्यास्त ही मुहूर्त है। सूर्योदय ही मुहूर्त है। गणना के लिए और कुछ बचता ही नहीं — और पूरे देश के लिए छपा कोई एक "शुभ समय" सही हो ही नहीं सकता, क्योंकि कोलकाता और मुंबई पर सूरज एक ही मिनट में नहीं डूबता।

एक चिंता हर साल सुनते हैं: शाम की घड़ी कभी-कभी राहुकाल से टकरा जाती है। टकराने दें। राहुकाल नए कार्यों के आरंभ का नियम है; पर्व की अपनी तिथि पर, सूर्य के अपने नियत क्षण पर दिया गया अर्घ्य उससे नहीं रुकता। सूरज राहु की प्रतीक्षा नहीं करता — व्रती को भी नहीं करनी चाहिए।

संध्या और उषा अर्घ्य का समय, शहर अनुसार

संध्या अर्घ्य = 15 नवंबर का सूर्यास्त। उषा अर्घ्य = 16 नवंबर का सूर्योदय। सभी समय भारतीय मानक समय में, हमारे सौर इंजन से।

शहरसंध्या अर्घ्य — 15 नवंबर सूर्यास्तउषा अर्घ्य — 16 नवंबर सूर्योदय
पटना17:0006:09
दिल्ली17:2606:45
कोलकाता16:5105:51
राँची17:0206:04
वाराणसी17:0906:17
लखनऊ17:1406:28
गया17:0106:08
मुज़फ़्फ़रपुर16:5806:09
दरभंगा16:5606:07
भागलपुर16:5306:01
पूर्णिया16:5006:00
मुंबई17:5906:48

दो व्यावहारिक बातें। समय स्थानीय क्षितिज के हिसाब से ±2–3 मिनट आगे-पीछे हो सकता है — पेड़ों की कतार, कोई इमारत, नदी का दूसरा किनारा, सब दिखने वाले सूर्यास्त को थोड़ा खिसका देते हैं। और अर्घ्य तब शुरू होता है जब बिंब क्षितिज को छूता है, उसके ओझल होने के बाद नहीं: घाट पर कम से कम 15 मिनट पहले पहुँचें — सूप सजा हुआ, मन ठहरा हुआ।

एक घंटे से ज़्यादा का अंतर क्यों

पूर्णिया का सूरज 16:50 पर डूबता है, मुंबई का 17:59 पर। इसमें कोई रहस्य नहीं — पृथ्वी पूरब की ओर घूमती है, इसलिए पूरब को सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों पहले मिलते हैं। देशांतर का हर अंश लगभग चार मिनट के बराबर है, और बिहार-बंगाल की पट्टी अरब सागर से बहुत पूरब बैठी है। यही ज्यामिति करवा चौथ के चंद्रोदय को भी नक्शे पर फैलाती है — वैसी ही शहरवार सूची हमने करवा चौथ 2026 चंद्रोदय के लिए छापी थी। जो पर्व आकाश से समय लेता है, उसे आपके अपने आकाश से ही समय लेना होगा।

चार दिन का क्रम, संक्षेप में

नहाय-खाय (13 नवंबर) — व्रती स्नान करते हैं, हो सके तो नदी में, और दिन का एक ही भोजन लेते हैं — प्रायः कद्दू-भात और चने की दाल, पूरी शुद्धता से बना। इसी दिन से घर की रसोई का स्वभाव बदल जाता है।

खरना (14 नवंबर) — दिन भर उपवास, और शाम को गुड़ की खीर व रोटी बनाकर, अर्पित कर, वही दिन का एकमात्र भोजन होता है। इसी प्रसाद के बाद निर्जला व्रत शुरू होता है — न अन्न, न जल — 16 की सुबह के अर्घ्य तक।

फिर अर्घ्य के दोनों दिन। दिन-प्रतिदिन का पूरा ब्योरा — क्या बनता है, किस चूल्हे पर, हर दिन घर से क्या माँगता है — हमारे छठ 2026 के पूरे क्रम वाले लेख में है; यह पन्ना समय पर टिका रहेगा।

डूबते सूर्य को पहले अर्घ्य क्यों

छठ अकेला बड़ा पर्व है जिसमें डूबते सूर्य की पूजा होती है — और वह पहले होती है। परंपरा दोनों अर्घ्यों को सूर्य की दो शक्तियों से जोड़ती है: संध्या का प्रकाश प्रत्यूषा, भोर का प्रकाश उषा। पर सीधी बात वही है जो घाट पर परिवार कहते हैं: जो सेवा करके जा रहा है, पहले उसका धन्यवाद; जो आ रहा है, उससे प्रार्थना बाद में। जाता हुआ सूरज पूरा दिन — पूरी फ़सल, पूरा वर्ष — ढोकर जा रहा है, और छठ उसे बिना धन्यवाद जाने नहीं देता। जो पर्व विदा होते हुए के आभार से शुरू होता है और उगते हुए से माँग बाद में रखता है, वह कुछ भी पाने के तरीक़े के बारे में भी कुछ सिखा रहा है।

उषा अर्घ्य और पारण — 16 नवंबर की सुबह

परिवार अँधेरे में ही घाट लौट आते हैं — बहुत से तो रात भर वहीं रहते हैं — और पहली किरण से पहले तैयार खड़े होते हैं। दिल्ली में सूर्योदय सुबह 6:45 पर है, कोलकाता में 5:51 पर। पहली दिखती किरणों को जल और कच्चे दूध का अर्घ्य दिया जाता है, वही सूप फिर उठते हैं, और व्रत पूर्ण होता है। व्रती पारण करते हैं — प्रायः प्रसाद और जल से, कहीं-कहीं अदरक-गुड़ से — और ठेकुआ हर बढ़े हुए हाथ की ओर चल पड़ता है।

सूप और दउरा में क्या-क्या

दउरा — बाँस की वह टोकरी जो सिर पर उठाकर घाट तक जाती है — में सूप रहते हैं, और सूप में अर्पण। स्थायी सामग्री:

  • ठेकुआ — गेहूँ, गुड़ और घी का, इस पर्व का पहचान-प्रसाद
  • कसार — चावल के आटे का लड्डू, बहुत से घरों में
  • फल साबुत और बिना कटे — केले की पूरी घौद, पत्तों समेत गन्ना, डाभ नींबू, पानी वाला नारियल, सिंघाड़ा, सुथनी, ऋतु-फल
  • सिंदूर, पान-सुपारी, और सूप में जलता हुआ दीपक

साबुत होना ही मर्म है: कुछ चखा हुआ नहीं, कटा हुआ नहीं, चिड़िया का जूठा नहीं। छठ के प्रसाद के नियम किसी भी पर्व से कड़े हैं — प्रसाद की रसोई के पास नमक नहीं, चारों दिन घर में प्याज़-लहसुन नहीं, सब कुछ शुद्धता से बना। यह कड़ाई नखरा नहीं है; यही इस व्रत की आदर की भाषा है।

घाट की मर्यादा — छोटी बातें, बड़ा फ़र्क़

  • पानी की ओर का किनारा व्रतियों का है; भीड़ की जगह उनके पीछे है।
  • किसी सूप या दउरा को न छुएँ, न लाँघें — कभी नहीं।
  • जूते पानी की रेखा से काफ़ी पहले उतर जाएँ, ठीक उस पर नहीं।
  • दोनों अर्घ्यों के समय फ़्लैश और रील व्रतियों के चेहरों से दूर रखें।
  • किनारे पर बच्चों पर नज़र रखें — अर्घ्य पानी में खड़े होकर, झुटपुटे की रोशनी में होता है, और नदियाँ त्योहार नहीं मानतीं।
  • स्थानीय समिति की घेराबंदी मानें; जो लाए हैं, वापस ले जाएँ।

अर्घ्य के बाद कार्तिक की सीढ़ी चढ़ती रहती है: देवउठनी एकादशी और फिर 21 नवंबर को तुलसी विवाह महीने का विवाह-द्वार खोलते हैं। पर नवंबर के बीचोबीच की उस एक शाम और एक भोर में पूरा देश पानी की ओर मुँह किए खड़ा होता है, और आता-जाता सूरज नाम लेकर पुकारा जाता है।

सभी लेख / All articles · आज का राशिफल · आज का पंचांग