छठी मैया कौन हैं? छठ पूजा 2026 (15–16 नवंबर) की कथा, सूर्य से नाता और छठ के गीतों का अर्थ
परंपरा के अनुसार छठी मैया षष्ठी देवी हैं — संतान की रक्षक, जिन्हें सूर्य देव की बहन माना जाता है। छठ पूजा 2026 में संध्या अर्घ्य 15 नवंबर और उषा अर्घ्य 16 नवंबर को है। यहाँ उनकी कथाएँ और छठ गीतों का अर्थ।
परंपरा के अनुसार छठी मैया षष्ठी देवी हैं — संतान की रक्षा करने वाली देवी, जिन्हें सूर्य देव की बहन माना जाता है। इसीलिए छठ में अर्घ्य सूर्य को दिया जाता है और प्रार्थना छठी मैया से की जाती है। 2026 में छठ पूजा रविवार, 15 नवंबर को है: उसी शाम संध्या अर्घ्य और सोमवार, 16 नवंबर की सुबह उषा अर्घ्य।
यह लेख उस सवाल का जवाब है जो लोग सबसे ज़्यादा पूछते हैं — छठी मैया कौन हैं, सूर्य से उनका क्या रिश्ता है, उनकी कथाएँ क्या कहती हैं और छठ के गीतों में क्या माँगा जाता है। अर्घ्य का शहर-अनुसार समय हमारे अर्घ्य समय वाले लेख में अलग से है।
छठी मैया कौन हैं?
छठी मैया का शास्त्रीय नाम षष्ठी देवी है। षष्ठी का सीधा अर्थ है "छठी" — चंद्र मास के पखवाड़े की छठी तिथि (तिथि = चंद्र दिन)। कार्तिक शुक्ल पक्ष की इसी षष्ठी तिथि पर छठ पूजा होती है, इसलिए बोलचाल में देवी को "छठी मैया" कहा गया।
मान्यता है कि षष्ठी देवी बच्चों की रक्षक हैं। इसीलिए छठ का व्रत मुख्यतः संतान की सलामती, घर की सुख-शांति और सूर्य के प्रति कृतज्ञता के लिए किया जाता है। व्रती (व्रत रखने वाली या रखने वाला) कठिन उपवास रखती है और घाट पर अर्घ्य देती है।
कुछ कथाओं में छठी मैया को देवसेना कहा गया है, और कुछ में उन्हें उषा — यानी भोर की देवी — के रूप में देखा गया है। यह पहचान क्षेत्र और परंपरा के अनुसार बदलती है। कोई एक "सही" उत्तर नहीं है, और नीचे की कथाएँ बताती हैं कि ऐसा क्यों है।
छठी मैया और सूर्य देव का क्या नाता है?
परंपरा में छठी मैया को सूर्य देव की बहन माना जाता है। इसी रिश्ते के कारण छठ में दोनों की पूजा एक साथ होती है — व्रती नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य (जल की धारा से किया गया अर्पण) देती है और साथ ही छठी मैया से घर के बच्चों के लिए प्रार्थना करती है।
छठ में सूर्य को दो बार अर्घ्य दिया जाता है — डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य और उगते सूर्य को उषा अर्घ्य। जिन कथाओं में छठी मैया को उषा कहा गया है, उनमें भोर का अर्घ्य सीधे देवी का अर्घ्य बन जाता है। सूर्य पूजा के व्यापक महत्व पर हमारा सूर्य देव वाला लेख अलग से है।
छठ पूजा 2026 कब है?
हमारे पंचांग इंजन के अनुसार (दिल्ली का समय) षष्ठी तिथि 14 नवंबर की रात 23:24 से शुरू होकर 16 नवंबर की रात 02:01 तक रहती है। सूर्योदय के समय षष्ठी 15 नवंबर को है, इसलिए छठ का मुख्य दिन रविवार, 15 नवंबर 2026 है।
| दिन | तारीख (2026) | सूर्योदय पर तिथि | सूर्योदय / सूर्यास्त (दिल्ली) |
|---|---|---|---|
| नहाय-खाय | शुक्रवार, 13 नवंबर | शुक्ल चतुर्थी | 06:43 / 17:27 |
| खरना | शनिवार, 14 नवंबर | शुक्ल पंचमी | 06:43 / 17:27 |
| संध्या अर्घ्य | रविवार, 15 नवंबर | शुक्ल षष्ठी | 06:44 / 17:26 |
| उषा अर्घ्य | सोमवार, 16 नवंबर | शुक्ल सप्तमी | 06:45 / 17:26 |
संध्या अर्घ्य सूर्यास्त के आसपास (दिल्ली में 17:26) और उषा अर्घ्य सूर्योदय के आसपास (दिल्ली में 06:45) दिया जाता है। आपके शहर में यह समय कुछ मिनट अलग होगा। नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक चार दिनों का पूरा क्रम इस लेख में है।
छठी मैया की कथाएँ क्या कहती हैं?
छठ की कथाएँ किसी एक ग्रंथ से नहीं, लोक-परंपरा से आती हैं। ये पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं और क्षेत्र के अनुसार थोड़ी बदल भी जाती हैं। तीन कथाएँ सबसे ज़्यादा सुनी जाती हैं, और एक कथा एक शहर की अपनी है।
राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी
कथा के अनुसार राजा प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। बहुत यत्न के बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर शिशु निष्प्राण था। शोक में डूबे राजा के सामने षष्ठी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने शिशु को जीवन दे दिया। देवी ने कहा कि वे संतान की रक्षक हैं, और जो उन्हें श्रद्धा से पूजेगा, उसके बच्चों की देखभाल वे स्वयं करेंगी। मान्यता है कि छठ व्रत की शुरुआत यहीं से हुई।
इस कथा का संदेश साफ़ है — छठ अपनी संतान के लिए किया जाने वाला व्रत है, और छठी मैया बच्चों की देखभाल एक माँ की तरह करती हैं।
कर्ण का सूर्य-अर्घ्य
महाभारत के कर्ण को कथा के अनुसार सूर्यपुत्र माना जाता है। कहा जाता है कि कर्ण प्रतिदिन जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। लोक-परंपरा नदी में कमर तक खड़े होकर अर्घ्य देने की छठ की रीति को कर्ण की इसी साधना से जोड़ती है।
द्रौपदी का व्रत
एक कथा पांडवों से जुड़ी है। मान्यता है कि कठिन दिनों में द्रौपदी ने सूर्य और षष्ठी देवी का व्रत रखा, और उसके बाद परिवार के दिन धीरे-धीरे बदले। यह कथा छठ को केवल संतान से नहीं, पूरे घर के कल्याण से जोड़ती है।
सीता का छठ — मुंगेर की कथा
बिहार के मुंगेर में एक स्थानीय कथा है कि माता सीता ने वहाँ गंगा तट पर छठ व्रत किया था। यह पूरी तरह क्षेत्रीय मान्यता है, और मुंगेर के लोग आज भी तट के एक स्थान को इस कथा से जोड़कर देखते हैं।
छठ के गीतों में क्या कहा जाता है?
छठ की पहचान उसकी रीतियों के साथ उसके गीतों से भी है। ये गीत भोजपुरी और मैथिली में हैं, और घाट पर, घर में, प्रसाद बनाते समय — हर जगह गाए जाते हैं। ये मंत्र नहीं हैं, सीधी बातचीत हैं। व्रती छठी मैया से बात करती है, उन्हें बुलाती है और अपनी माँग सीधे उनके सामने रखती है।
सबसे प्रसिद्ध गीत है "काँच ही बाँस के बहँगिया"। इसे समझने के लिए दो शब्द जानना काफ़ी है:
- बहँगी — बाँस की वह लंबी लाठी (कावड़), जिसके दोनों सिरों पर टोकरी बाँधकर कंधे पर उठाया जाता है। छठ में इसी में सूप (बाँस की छोटी थाली), फल, गन्ना और बाकी प्रसाद रखकर घाट तक ले जाया जाता है।
- काँच बाँस — कच्चा, हरा बाँस। यानी नई बहँगी, जो खासतौर पर इस छठ के लिए बनाई गई है।
गीत का भाव यह है कि बहँगी भारी है, और सवाल है कि इसे घाट तक कौन उठाकर ले जाएगा — फिर घर का ही कोई सदस्य आगे आता है। इसमें छठ की एक बड़ी बात छिपी है: व्रत अकेले व्रती का नहीं, पूरे घर का होता है। जो प्रसाद उठाकर घाट तक जा रहा है, वह भी उसी संकल्प का हिस्सा है।
दूसरे गीतों में छठी मैया को घर आने का न्योता दिया जाता है, उनके लिए आँगन सजाने की बात होती है, और उगते सूर्य से देर न करने की विनती की जाती है — ताकि व्रती का लंबा उपवास भोर के अर्घ्य के साथ पूरा हो। माँग हर गीत में सीधी होती है: बच्चों की सलामती और घर की खुशहाली।
इन गीतों के शब्द लोक-संपदा हैं और गाने वालों के अनुसार बदलते रहते हैं, इसलिए यहाँ पंक्तियाँ नहीं दी गई हैं। इन्हें घाट पर सुनना ही सबसे अच्छा तरीका है।
छठ में क्या ध्यान रखें?
- व्रती की सेहत सबसे पहले है। परंपरा के अनुसार जो व्रत न रख सकें, उनके बदले घर का कोई और सदस्य व्रत रख सकता है।
- दोनों अर्घ्य सूर्यास्त और सूर्योदय से बँधे हैं, इसलिए अपने शहर का समय पहले देख लें और घाट पर समय से पहले पहुँचें।
- घाट पर भीड़ रहती है। बच्चों का हाथ थामे रहें और उथले पानी में ही रहें।
अगर आप हर दिन की तिथि, सूर्योदय-सूर्यास्त और त्योहारों की तारीखें एक जगह देखना चाहते हैं, तो हमारा दैनिक पंचांग यही जानकारी शहर के अनुसार देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छठी मैया और षष्ठी देवी एक ही हैं?
हाँ। छठी मैया लोक-नाम है और षष्ठी देवी शास्त्रीय नाम। दोनों एक ही देवी हैं — संतान की रक्षक।
छठी मैया सूर्य की बहन हैं या कुछ और?
परंपरा में बहन। कुछ कथाओं में उन्हें देवसेना या उषा भी कहा गया है। यह पहचान क्षेत्र के अनुसार बदलती है, और सभी रूप एक साथ मान्य हैं।
छठ पूजा 2026 में कब है?
मुख्य दिन रविवार, 15 नवंबर 2026 (संध्या अर्घ्य) और सोमवार, 16 नवंबर 2026 (उषा अर्घ्य)। नहाय-खाय शुक्रवार, 13 नवंबर और खरना शनिवार, 14 नवंबर को है।
छठ के गीत किस भाषा में हैं?
मुख्यतः भोजपुरी और मैथिली में। "काँच ही बाँस के बहँगिया" सबसे प्रसिद्ध छठ गीत है, जिसमें बहँगी — यानी बाँस की कावड़ — और उसे घाट तक ले जाने के संकल्प की बात है।