एकादशी 2026: पूरी लिस्ट, तारीख, नाम और पारण समय

चौबीसों एकादशी शास्त्रीय क्रम में, जिनमें आठ की 2026 तारीखें हमारे पंचांग इंजन से गिनी हुई हैं — 9 अगस्त की कामिका से 20 नवंबर की देवउठनी तक, हर एक का पारण काल, हरि वासर का नियम, और जो हम गिन नहीं सके उसकी साफ़ स्वीकारोक्ति।

यह पेज एक बार पढ़कर बंद करने के लिए नहीं, खोलकर रखने के लिए है। इसमें शास्त्रीय क्रम की चौबीसों एकादशियों के नाम हैं, 2026 की उन एकादशियों का सटीक तिथि-समय जो हमारा इंजन गिनकर देता है, और पारण का नियम इतने साफ़ शब्दों में कि बाकी का समय आप खुद निकाल सकें।

तालिका से पहले एक बात। हमारे इंजन के पास 30 जुलाई से 24 नवंबर 2026 तक का गणना किया हुआ पंचांग है। इस अवधि के भीतर नीचे की हर तारीख, तिथि-समय और सूर्योदय सीधे इंजन से पढ़ा गया है। इसके बाहर सिर्फ़ नाम, मास और पक्ष मिलेगा। चौबीस अंदाज़ों से आठ भरोसेमंद तारीखें बेहतर हैं।

2026 की वे आठ एकादशी जो इंजन गिनकर देता है

इन आठों की तारीख एक ही नियम से तय हुई है — व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि मौजूद हो।

व्रत की तारीखएकादशीमास और पक्षतिथि आरंभतिथि समाप्त
रविवार, 9 अगस्त 2026कामिकाश्रावण कृष्ण8 अगस्त, 13:599 अगस्त, 11:05
रविवार, 23 अगस्त 2026श्रावण पुत्रदा (पवित्रा)श्रावण शुक्ल23 अगस्त, 02:0124 अगस्त, 04:19
सोमवार, 7 सितंबर 2026अजाभाद्रपद कृष्ण6 सितंबर, 19:307 सितंबर, 17:05
मंगलवार, 22 सितंबर 2026परिवर्तिनी (पार्श्व, वामन)भाद्रपद शुक्ल21 सितंबर, 20:0122 सितंबर, 21:43
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026इंदिराआश्विन कृष्ण6 अक्टूबर, 02:087 अक्टूबर, 00:35
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026पापांकुशाआश्विन शुक्ल21 अक्टूबर, 14:1222 अक्टूबर, 14:48
गुरुवार, 5 नवंबर 2026रमाकार्तिक कृष्ण4 नवंबर, 11:045 नवंबर, 10:36
शुक्रवार, 20 नवंबर 2026देवउठनी (प्रबोधिनी)कार्तिक शुक्ल20 नवंबर, 07:1421 नवंबर, 06:30

सारे समय दिल्ली/भारतीय मानक समय के हैं, इंजन से पढ़े गए और निकटतम मिनट तक पूर्णांकित, अनुमानित नहीं। तिथि हर जगह एक ही क्षण शुरू और खत्म होती है; शहर के साथ बदलता है वह सूर्योदय जिससे उसे नापा जाता है — और यही व्रत एक दिन आगे-पीछे करता है।

पारण असल में है क्या

पारण यानी व्रत खोलना, और एकादशी व्रत में यह कोई औपचारिकता नहीं है। गलत क्षण में खोला गया उपवास अधूरा व्रत माना जाता है। इसके चार नियम हैं:

  • पारण व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद होता है, रात में कभी नहीं।
  • यह द्वादशी तिथि के भीतर होना चाहिए। यदि द्वादशी सूर्योदय से पहले ही बीत गई हो, तब भी सूर्योदय के बाद ही व्रत खोलें।
  • द्वादशी का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है; उसमें पारण नहीं करते, उसके बीतने की प्रतीक्षा करते हैं।
  • जहाँ समय की गुंजाइश हो, पूर्वाह्न में पारण करें और मध्याह्न से बचें।

आठों एकादशी का पारण समय

एकादशीपारण का दिनहरि वासर समाप्तपारण काल
कामिकासोमवार, 10 अगस्त9 अगस्त, 16:1905:48 – 08:01
श्रावण पुत्रदासोमवार, 24 अगस्त24 अगस्त, 10:4910:49 के बाद; द्वादशी 25 अगस्त 06:21 तक
अजामंगलवार, 8 सितंबर7 सितंबर, 22:3006:03 – 14:44
परिवर्तिनीबुधवार, 23 सितंबर23 सितंबर, 04:0006:10 – 22:51
इंदिराबुधवार, 7 अक्टूबर7 अक्टूबर, 06:1606:18 – 23:17
पापांकुशाशुक्रवार, 23 अक्टूबर22 अक्टूबर, 20:4406:27 – 14:35
रमाशुक्रवार, 6 नवंबर5 नवंबर, 16:3506:37 – 10:31
देवउठनीशनिवार, 21 नवंबर21 नवंबर, 12:0712:07 के बाद; द्वादशी 22 नवंबर 04:55 तक

एक फ़र्क़ साफ़ रखें। सूर्योदय और द्वादशी के आरंभ-अंत के क्षण इंजन से नापे हुए हैं। हरि वासर वाला कॉलम हमने गणना करके निकाला है — उसी द्वादशी की लंबाई का चौथाई, उसके आरंभ में जोड़कर। यह नापे आँकड़ों पर हिसाब है, अलग माप नहीं। पारण काल लंबा हो तो पूर्वाह्न में ही कर लें।

देवउठनी एकादशी 2026: वह तिथि जो दोनों सूर्योदय से चूक गई

पहली तालिका की आख़िरी पंक्ति देखिए। कार्तिक शुक्ल एकादशी शुक्रवार 20 नवंबर को 07:14 पर शुरू होकर शनिवार 21 नवंबर को 06:30 पर खत्म हो जाती है। दिल्ली में 20 नवंबर का सूर्योदय 06:48 — तिथि शुरू होने से छब्बीस मिनट पहले; 21 नवंबर का 06:49 — तिथि खत्म होने से उन्नीस मिनट बाद। एकादशी किसी सूर्योदय को नहीं छूती।

ऐसे में सूर्योदय वाला नियम कोई जवाब नहीं देता, और कच्ची तिथि-तालिका 20 नवंबर के सामने "दशमी" छापेगी। इसी वजह से इस तारीख पर बहस होगी। हल पुराना नियम देता है — जब एकादशी पूरी तरह दो सूर्योदयों के बीच रह जाए, तब व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन तिथि असल में व्याप्त रहती है। वह दिन है शुक्रवार, 20 नवंबर 2026, और हमारा इंजन भी यही दिन दर्ज करता है। पारण शनिवार 21 नवंबर को 12:07 के बाद — उसी दिन इंजन तुलसी विवाह भी दर्ज करता है।

आपका पारिवारिक पंचांग या संप्रदाय इसे 21 नवंबर को रखता हो तो उसी का पालन करें। हम बता रहे हैं कि गणना क्या कहती है और दो जवाब क्यों बनते हैं — परंपरा बदलने को नहीं कह रहे।

चौबीस एकादशियों के नाम, क्रम से

चक्र चैत्र से शुरू होता है, हर चांद्र मास में दो, साधारण वर्ष में कुल चौबीस।

क्रममास और पक्षनाम2026 की तारीख
1चैत्र कृष्णपापमोचनीअपने पंचांग में देखें
2चैत्र शुक्लकामदाअपने पंचांग में देखें
3वैशाख कृष्णवरूथिनीअपने पंचांग में देखें
4वैशाख शुक्लमोहिनीअपने पंचांग में देखें
5ज्येष्ठ कृष्णअपराअपने पंचांग में देखें
6ज्येष्ठ शुक्लनिर्जलाअपने पंचांग में देखें
7आषाढ़ कृष्णयोगिनीअपने पंचांग में देखें
8आषाढ़ शुक्लदेवशयनीअपने पंचांग में देखें
9श्रावण कृष्णकामिका9 अगस्त 2026
10श्रावण शुक्लपुत्रदा (पवित्रा)23 अगस्त 2026
11भाद्रपद कृष्णअजा7 सितंबर 2026
12भाद्रपद शुक्लपरिवर्तिनी22 सितंबर 2026
13आश्विन कृष्णइंदिरा6 अक्टूबर 2026
14आश्विन शुक्लपापांकुशा22 अक्टूबर 2026
15कार्तिक कृष्णरमा5 नवंबर 2026
16कार्तिक शुक्लदेवउठनी20 नवंबर 2026
17मार्गशीर्ष कृष्णउत्पन्नाअपने पंचांग में देखें
18मार्गशीर्ष शुक्लमोक्षदाअपने पंचांग में देखें
19पौष कृष्णसफलाअपने पंचांग में देखें
20पौष शुक्लपौष पुत्रदाअपने पंचांग में देखें
21माघ कृष्णषट्तिलाअपने पंचांग में देखें
22माघ शुक्लजयाअपने पंचांग में देखें
23फाल्गुन कृष्णविजयाअपने पंचांग में देखें
24फाल्गुन शुक्लआमलकीअपने पंचांग में देखें

पंक्ति 9 से 16 तक की तारीखें इंजन से गिनी हुई हैं। बाकी नाम शास्त्रीय मास-पक्ष क्रम से दिए गए हैं, जो कभी नहीं बदलता; सिर्फ़ उनकी 2026 की तारीखें हमारी गणना-अवधि से बाहर हैं — उनके लिए दैनिक पंचांग देखें। अधिक मास वाले वर्ष में पद्मिनी और परमा नाम जुड़कर गिनती छब्बीस हो जाती है।

पूर्णिमांत और अमांत: नाम वही, महीना अलग

हमारा इंजन उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना पर चलता है, जिसमें मास पूर्णिमा पर खत्म होता है और कृष्ण पक्ष पहले आता है। दक्कन और दक्षिण की अमांत गणना में मास अमावस्या पर खत्म होता है, इसलिए वही कामिका एकादशी वहाँ आषाढ़ कृष्ण कहलाती है। नाम और तारीख दोनों में एक ही; सिर्फ़ मास का लेबल खिसकता है। दक्षिणी कैलेंडर ऊपर के मास कॉलम से असहमत दिखे तो कारण यही है।

दो पंचांग एक ही एकादशी अलग दिन क्यों बताते हैं

तीन कारण। पहला, सूर्योदय वाली कसौटी — तिथि सूर्योदय के दो-चार मिनट इधर-उधर शुरू हो तो पूरब या पश्चिम के शहर में जवाब पलट जाता है। दूसरा, वैष्णव परंपरा में द्वादशी-विद्धा एकादशी से बचाव, जो तिथि के दो सूर्योदय छूने पर व्रत अगले दिन कर देता है। तीसरा, ऊपर वाला दुर्लभ मामला। इनमें गलती कोई नहीं — एक ही आकाश पर ईमानदारी से लगाए अलग-अलग नियम हैं। हमारे तिथि पेज पर कच्चे क्षण मिलते हैं, जिनसे आप किसी भी दावे की जाँच खुद कर सकते हैं।

दिल्ली का समय आपके शहर का समय नहीं है

इस पेज का हर समय दिल्ली का है और इंजन से पढ़ा गया है। इस पैराग्राफ़ की शहर-तुलना नहीं — कोलकाता में सूर्योदय लगभग आधा घंटा पहले, मुंबई और अहमदाबाद में लगभग आधा घंटा बाद, और चंद्रोदय भी इसी अनुपात में खिसकता है; ये आँकड़े देशांतर से लगाया मोटा अनुमान हैं, इंजन की गणना नहीं, इसलिए इन्हें दिशा मानिए, समय नहीं। तिथि के क्षण नहीं बदलते — 21 नवंबर का 06:30 पूरे भारत में 06:30 है — पर पारण काल की सीमा आपका सूर्योदय तय करता है। कामिका जैसे संकरे काल (05:48 – 08:01) से पहले अपने शहर का सूर्योदय ज़रूर देखें।

शास्त्र क्या कहता है, और क्या नहीं

एकादशी व्रत विष्णु का है, और हर एकादशी के साथ जुड़ी फलश्रुति — कामिका में पाप से मुक्ति, पापांकुशा में कुकर्म के फल से छुटकारा, देवउठनी में भगवान का योगनिद्रा से जागना — पुराणों से भक्ति-वचन के रूप में आती है, किसी यांत्रिक कारण के रूप में नहीं। शास्त्र यह नहीं बताता कि ग्यारहवीं तिथि में ही यह भार क्यों है, और हम भी नहीं बताएँगे। अन्न-निषेध के पीछे पाचन या चंद्र-गुरुत्व का कारण गिनाने वाले पन्ने वह कारण गढ़ रहे हैं; शास्त्र कोई नहीं देता। जो पारंपरिक तर्क सचमुच मौजूद है, वह हमने एकादशी पर चावल क्यों नहीं और एकादशी हर पंद्रह दिन में क्यों आती है में साफ़-साफ़ लिख दिया है।

व्रत उतना ही रखें जितना शरीर साथ दे। निर्जला एक विकल्प है, अनिवार्यता नहीं; परंपरा स्वयं रोगी, वृद्ध, गर्भवती और छोटे बच्चों को छूट देती है।

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