गणेश विसर्जन 2026 विधि: उत्तर पूजा, क्षमा प्रार्थना, निर्माल्य और इको-फ्रेंडली विसर्जन (25 सितंबर)

विसर्जन विदाई है, फेंकना नहीं। मूर्ति उठाने से पहले की उत्तर पूजा, क्षमा प्रार्थना, निर्माल्य पानी में क्यों नहीं जाना चाहिए, और 25 सितंबर 2026 को घर पर बाल्टी में सही विसर्जन कैसे करें।

स्थापना की तैयारी में पूरा घर लग जाता है — सामग्री, मुहूर्त, चौकी, सजावट। विसर्जन के दिन सब जल्दबाज़ी में होता है: ट्रक, भीड़, और मूर्ति जो गले में गेंदे की माला समेत पानी में चली जाती है। जबकि शास्त्र में विदाई ही पूजा का ज़्यादा औपचारिक हिस्सा है। आपने अतिथि को तय दिनों के लिए बुलाया था; अब उसे ठीक से विदा करना आपकी ज़िम्मेदारी है।

यह लेख सिर्फ़ विधि पर है। विसर्जन किस दिन हो — डेढ़, तीसरे, पाँचवें, सातवें या दसवें दिन — और दसवें दिन का विसर्जन शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को क्यों पड़ रहा है, यह हमने अलग लेख गणेशोत्सव 2026 विसर्जन की तारीख़ें में विस्तार से लिखा है।

उत्तर पूजा — मूर्ति उठाने से पहले

मूर्ति उठाने से ठीक पहले एक आख़िरी पूरी पूजा होती है। इसे उत्तर पूजा कहते हैं — यानी समापन की पूजा, जो स्थापना वाले दिन की गई प्राण-प्रतिष्ठा का दूसरा सिरा है। इसमें कुछ भी जटिल नहीं है:

  • दीपक और अगरबत्ती वैसे ही जलाएँ जैसे उत्सव के हर सुबह जलाई थी।
  • अक्षत, हल्दी-कुंकुम, दूर्वा, ताज़ा फूल और आख़िरी मोदक या लड्डू अर्पित करें।
  • वही आरती करें जो पूरे सप्ताह घर में गाई गई।
  • अंतिम नैवेद्य चढ़ाएँ। महाराष्ट्र के कई घरों में इसके बाद मिठाई, नारियल और एक सिक्का कपड़े में बाँधकर मूर्ति के साथ रखा जाता है — रास्ते का भोजन।

उत्तर पूजा ही आमंत्रित उपस्थिति को विदा करती है और मूर्ति को वापस मिट्टी बना देती है। इसके बिना मूर्ति उठाना सिर्फ़ सामान हटाना है।

क्षमा प्रार्थना — सबसे ज़रूरी हिस्सा

आरती के तुरंत बाद वह हिस्सा आता है जो पूरे कर्म को वज़न देता है। हाथ जोड़कर, ज़ोर से, वह सब स्वीकार किया जाता है जो इन दिनों में ग़लत हुआ — मंत्र जो ग़लत बोले गए, चढ़ावा जो भूल गया, अधीरता, वह सुबह जब कोई देर से उठा और पूजा छूट गई। इसके लिए वही श्लोक बोला जाता है जो हर पूजा के अंत में आता है:

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥ — "मुझे बुलाना नहीं आता, विदा करना नहीं आता, पूजा करना भी नहीं आता; हे परमेश्वर, क्षमा करें।"

संस्कृत में कह सकें तो अच्छा, न कह सकें तो अपनी भाषा में कहें। स्वीकार करना ज़रूरी है, उच्चारण नहीं।

"पुढच्या वर्षी लवकर या" — और मोरया कौन हैं

फिर वह नारा: गणपति बाप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या — "गणपति बाप्पा मोरया, अगले साल जल्दी आना।" इसके बारे में दो सीधी बातें।

पहली — यह मराठी लोक-परंपरा है, शास्त्रीय विधान नहीं। किसी पूजा-पद्धति में यह लिखा नहीं मिलेगा। सार्वजनिक गणेशोत्सव के साथ यह महाराष्ट्र से बाहर निकला और अब हैदराबाद से दिल्ली तक बोला जाता है, जो अच्छी बात है — पर इसके बिना किसी का विसर्जन अधूरा नहीं होता।

दूसरी — "मोरया" गणेश का नाम नहीं है। यह मोरया गोसावी से आया है, पुणे के पास चिंचवड के गाणपत्य संत। इस नारे में भक्त का नाम देवता से पहले आता है — पूरे उत्सव का भाव इन्हीं चार अक्षरों में है।

मूर्ति उठाने और ले जाने के नियम

  • दोनों हाथों से, नीचे आधार से उठाएँ — सिर, सूँड या भुजा से कभी नहीं।
  • घर से निकलते समय मूर्ति का मुख घर की ओर रखें। अतिथि जाते हुए मेज़बान को देखता हुआ जाता है।
  • साफ़ कपड़े, सजी थाली या पालकी में ले जाएँ — प्लास्टिक की थैली या गत्ते के डिब्बे में नहीं।
  • रास्ते में मूर्ति को खुली ज़मीन पर न रखें।
  • मिठाई और नारियल मूर्ति के साथ जाते हैं; पूजा का बचा सामान पानी में नहीं जाता।

अनंत चतुर्दशी, 25 सितंबर 2026 का समय

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर की रात 11:18 बजे से 25 सितंबर की रात 11:07 बजे तक है, इसलिए दसवें दिन का विसर्जन इससे पहले पूरा होना चाहिए। उस दिन नक्षत्र शतभिषा और चंद्रमा कुम्भ राशि में रहेंगे। दिल्ली के समय:

अवधिदिल्ली समयनिर्णय
सूर्योदय / सूर्यास्त06:11 / 18:13
लाभ चौघड़िया07:42 – 09:12इस शुक्रवार ठीक गुलिक काल के साथ पड़ रहा है
अमृत चौघड़िया09:12 – 10:42सुबह का सबसे साफ़ समय
राहु काल10:42 – 12:12टालें
शुभ चौघड़िया12:12 – 13:42अच्छा
चल चौघड़िया16:43 – 18:13अच्छा — जुलूस का सामान्य समय
शुभ (रात्रि)18:13 – 19:43अँधेरे के बाद विसर्जन के लिए ठीक
चतुर्दशी समाप्त23:07अंतिम सीमा

दिल्ली में अभिजित मुहूर्त 11:48 से 12:36 तक है, पर उस दिन इसका ठीक आधा हिस्सा — 11:48 से 12:12 — राहु काल के भीतर आ रहा है, इसलिए यह साफ़ विकल्प नहीं है।

आपके शहर का सूर्योदय दिल्ली जैसा नहीं है

चौघड़िया और राहु काल सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिन के हिस्से हैं, इसलिए ऊपर की हर अवधि आपके स्थानीय सूर्योदय के साथ खिसकती है। 25 सितंबर 2026 को:

शहरसूर्योदयसूर्यास्तराहु काल
कोलकाता05:2617:2909:57 – 11:27
लखनऊ05:5717:5810:27 – 11:57
नागपुर06:0418:0610:34 – 12:05
हैदराबाद06:0618:0810:37 – 12:07
बेंगलुरु06:0918:1210:40 – 12:11
दिल्ली06:1118:1310:42 – 12:12
जयपुर06:1718:1910:48 – 12:18
पुणे06:2418:2710:55 – 12:26
मुंबई06:2818:3110:59 – 12:30
अहमदाबाद06:3018:3211:00 – 12:31

कोलकाता में सूर्योदय अहमदाबाद से 64 मिनट पहले है, और वहाँ राहु काल भी 63 मिनट पहले शुरू होकर अहमदाबाद का राहु काल शुरू होने तक दो-तिहाई से ज़्यादा बीत चुका होता है। ऊपर दिए सभी समय दिल्ली/भारतीय मानक समय के हैं जब तक शहर का नाम न लिखा हो; समय तय करने से पहले अपने शहर का पंचांग और राहु काल ज़रूर देखें।

निर्माल्य — इसे पानी में क्यों नहीं डालना चाहिए

निर्माल्य वह सब है जो पहले चढ़ाया जा चुका है: फूल, माला, दूर्वा, बेलपत्र, इस्तेमाल किया कपड़ा, कुंकुम, बचा नैवेद्य। यहाँ एक असली शास्त्रीय नियम है और उसे ठीक-ठीक कहना चाहिए। निर्माल्य को दोबारा इस्तेमाल नहीं करना, उस पर पैर नहीं पड़ने देना, और घर के कूड़े में नहीं डालना। नियम बस इतना है। नदी के बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया।

यह आदत उस पुरानी दुनिया से आई है जहाँ चढ़ावा सिर्फ़ पत्ते और फूल थे और पानी बहती नदी का था। आज एक माला में रंगा धागा, पिन, प्लास्टिक की जाली और अक्सर पॉलीथीन की पन्नी होती है, और ज़्यादातर शहरों में "नदी" असल में झील या नगरपालिका का कुंड है। फूल डूबकर सड़ते हैं; प्लास्टिक नहीं सड़ता। मुंबई, पुणे, नागपुर और कई शहरों के घाटों पर रखे निर्माल्य कलश इसी के लिए हैं, और उनकी सामग्री की खाद बनती है।

  1. जैविक चीज़ें — फूल, पत्ते, दूर्वा, फल — धागे, तार, पिन, प्लास्टिक और थर्मोकोल से अलग करें।
  2. जैविक हिस्सा निर्माल्य कलश में डालें, या घर पर मिट्टी के गमले में खाद बना दें।
  3. सूती पूजा वस्त्र और जनेऊ: सुखाकर या तो खाद में मिलाएँ या पेड़ की जड़ में दबा दें।
  4. जो सजावट सड़ती नहीं, वह साधारण सूखे कचरे में जाएगी। यह अनादर नहीं है — वह कभी निर्माल्य थी ही नहीं।

कोई कहे कि शास्त्र में फूल नदी में डालने का विधान है, तो उससे श्लोक पूछ लीजिए। ऐसा कोई श्लोक नहीं है।

इको-फ्रेंडली विसर्जन जो सचमुच विसर्जन हो

विसर्जन का अर्थ है घुल जाना। शर्त यही है कि उत्तर पूजा और संकल्प के बाद मूर्ति जल में घुले। विधि में कहीं नदी की शर्त नहीं है।

तरीक़ाकिसके लिएक्या चाहिएबाद में पानी
घर पर बाल्टी या ड्रमशाडू मिट्टी की मूर्ति, लगभग 9–12 इंच तकइतना गहरा बर्तन कि मूर्ति पूरी डूबे; छोटी मूर्ति के लिए 20 लीटर की बाल्टी काफ़ीआपको ही सँभालना है — नीचे देखें
कृत्रिम कुंडकिसी भी आकार की मिट्टी की मूर्तिपास का नगरपालिका या सोसाइटी कुंड, साथ में निर्माल्य कलशनगर निकाय सँभालता है
काग़ज़ की लुगदी या बीज वाली मूर्तिजहाँ बाहर जगह नहीं हैचौड़ा बर्तन और एक गमलागमले में डालें; बीज उग आते हैं
प्राकृतिक जलाशयसिर्फ़ बिना रंग वाली मिट्टी, जहाँ अनुमति होस्थानीय अनुमति; निर्माल्य पहले अलगआपके हाथ में नहीं

घर पर विसर्जन इस तरह करें: बाल्टी में साफ़ पानी भरें, उत्तर पूजा और क्षमा प्रार्थना करें, फिर आरती के साथ दोनों हाथों से मूर्ति को धीरे-धीरे पानी में उतारें। इसके बाद उसे छेड़ें नहीं। शाडू मिट्टी कुछ घंटों में नरम पड़ जाती है और अगली सुबह तक बैठ जाती है; गाढ़े रंग वाली मूर्ति ज़्यादा समय लेती है और प्लास्टर ऑफ़ पेरिस शायद पूरी तरह घुले ही नहीं। आधी घुली मूर्ति वापस बाहर न निकालें।

बचे हुए पानी का क्या करें

यह वह सवाल है जिसका जवाब कोई नहीं देता। मूर्ति घुल जाने के बाद आपके पास मटमैले पानी की एक बाल्टी बचती है — और वह तीर्थ है, कचरा नहीं।

  • रातभर मिट्टी को नीचे बैठने दें।
  • पानी तुलसी, किसी पेड़ की जड़ या बग़ीचे की क्यारी में डालें। वह वापस धरती में जाता है, विसर्जन का अर्थ यही है।
  • नीचे बैठी मिट्टी को गमले की मिट्टी में मिला दें। कुछ परिवार थोड़ी मिट्टी बचाकर अगले साल की मूर्ति में मिलाते हैं।
  • नाली में डालने से बचें, और अगर मूर्ति रंगी हुई थी तो बरसाती नाले में तो कभी नहीं।

अगर मूर्ति प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की थी, तो वह पानी मिट्टी में भी न डालें। उसे बैठने दें, ठोस हिस्सा नगरपालिका के संग्रह केंद्र को दें, और अगले साल शाडू मिट्टी की मूर्ति लें।

कुछ सीधे जवाब

  • क्या विसर्जन सूर्यास्त के बाद हो सकता है? हाँ। बड़े जुलूसों में शाम और रात का विसर्जन ही सामान्य है, कोई निषेध नहीं है।
  • क्या धातु या पत्थर की स्थायी गणेश मूर्ति का विसर्जन होता है? नहीं। वे नित्य पूजा के लिए हैं। विसर्जन सिर्फ़ उत्सव के लिए स्थापित मूर्ति का होता है।
  • एक दिन देर से कर सकते हैं? एक दिन पहले करना बेहतर है, बाद में नहीं। छूट जाए तो उत्तर पूजा करके अगली सुबह विसर्जन कर दें — नया प्रायश्चित गढ़ने की ज़रूरत नहीं।

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