कार्तिक पूर्णिमा 2026: 24 नवंबर, देव दिवाली, स्नान-दान और दीपदान
कार्तिक पूर्णिमा 2026 मंगलवार 24 नवंबर को है। दिल्ली में पूर्णिमा 23 नवंबर रात 11:42 से 24 नवंबर रात 8:23 तक रहेगी। तिथि का पूरा समय, स्नान और दीपदान एक ही दिन क्यों, त्रिपुरासुर की कथा, काशी की देव दिवाली और गुरु नानक जयंती — सब एक जगह।
कार्तिक पूर्णिमा 2026 मंगलवार, 24 नवंबर को है। यह कार्तिक मास का आखिरी दिन है — वह पूर्णिमा जिस पर काशी के घाट दीपों की सीढ़ी बन जाते हैं, और वह दिन जब महीने भर चला कार्तिक स्नान का व्रत पूरा होकर रखा जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा 2026 कब है — पूरी तिथि
पूर्णिमा तिथि सोमवार, 23 नवंबर 2026 की रात 11:42 बजे लगती है और मंगलवार, 24 नवंबर 2026 की रात 8:23 बजे समाप्त होती है। यहाँ दिए सभी समय दिल्ली (भारतीय मानक समय) के हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं, इसलिए अपनी घड़ी का समय तय करने से पहले अपने शहर का पंचांग देख लें।
व्रत का दिन आम तौर पर उसी तिथि से तय होता है जो सूर्योदय के समय चल रही हो। 24 नवंबर को सूर्योदय (सुबह 6:51) के समय पूर्णिमा चल रही है — वह सात घंटे से कुछ अधिक पहले ही लग चुकी थी। इसलिए स्नान, दान, व्रत और दीपदान — चारों 24 नवंबर के ही हैं। इस बार कोई बँटवारा नहीं है।
24 नवंबर 2026 का पंचांग
| विवरण | 24 नवंबर 2026 (दिल्ली, भारतीय मानक समय) |
|---|---|
| वार | मंगलवार |
| तिथि | कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा |
| पूर्णिमा आरंभ | 23 नवंबर 2026, रात 11:42:52 |
| पूर्णिमा समाप्त | 24 नवंबर 2026, रात 8:23:05 |
| नक्षत्र | कृत्तिका (प्रथम चरण) |
| योग | परिघ |
| सूर्योदय | सुबह 6:51 |
| सूर्यास्त | शाम 5:23 |
| चंद्रोदय | शाम 4:56 |
| चंद्रास्त | सुबह 7:35 |
| राहु काल | दोपहर 2:45 – शाम 4:04 |
| प्रदोष काल (निकाला हुआ) | लगभग शाम 5:23 – रात 7:47 |
तिथि, नक्षत्र, योग, सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय, चंद्रास्त और राहु काल — ये सब दिल्ली के लिए एस्ट्रोवेदांश पंचांग इंजन से सीधे लिए गए हैं। प्रदोष काल इंजन का मान नहीं है, वह सूर्यास्त से निकाला गया अनुमान है। तालिका में दिया चंद्रास्त 24 नवंबर के कैलेंडर दिन का मान है, यानी 23 नवंबर की शाम उगे चंद्रमा का अस्त। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं।
इस बार तारीख पर कोई विवाद क्यों नहीं
कार्तिक पूर्णिमा उन गिने-चुने पर्वों में है जिन्हें तिथि एक ही दिन में दो बार चाहिए। स्नान और दान को सूर्योदय के समय पूर्णिमा चाहिए। दीपदान को शाम के प्रदोष काल में पूर्णिमा चाहिए। जिन वर्षों में पूर्णिमा एक दिन देर रात लगती है और अगले दिन दोपहर तक ही रहती है, ये दोनों हिस्से अलग-अलग तारीखों पर चले जाते हैं — और पंचांग आपस में भिड़ जाते हैं।
2026 में ऐसा नहीं है। 23 नवंबर की शाम को तिथि अभी चतुर्दशी ही चल रही है; पूर्णिमा तो रात 11:42 बजे लगती है, दीप जलाने के समय से बहुत बाद। 24 नवंबर की शाम को पूर्णिमा चल ही रही है — सूर्यास्त शाम 5:23 पर है और तिथि रात 8:23 तक टिकी है। दोनों खिड़कियाँ एक ही दिन पर बैठती हैं।
इस साल के आँकड़ों में एक छोटी-सी सुंदरता भी है। चंद्रोदय शाम 4:56 पर है, यानी सूर्यास्त से सत्ताईस मिनट पहले। पहला दीया नदी तक पहुँचने से पहले ही पूर्ण चंद्रमा आकाश में होगा।
त्रिपुरारी पूर्णिमा और त्रिपुरासुर की कथा
इस दिन का पुराना नाम त्रिपुरारी पूर्णिमा है, और यह नाम विष्णु का नहीं, शिव का है।
कथा शिव पुराण और मत्स्य पुराण के त्रिपुर-दहन प्रसंगों में मिलती है। तारकासुर के तीन पुत्र — तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष — ने कठोर तप किया और तीन चलते हुए नगर पाए: एक सोने का, एक चाँदी का, एक लोहे का, जो क्रमशः आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर विचरते थे। वरदान अपनी शर्त के साथ आया। तीनों का नाश केवल एक ही बाण से हो सकता था, और केवल उस एक क्षण में जब तीनों एक सीध में आ जाएँ। शिव ने उस क्षण की प्रतीक्षा की और बाण छोड़ा। तभी से वे त्रिपुरारी हैं — तीन नगरों के शत्रु।
दो बातें ईमानदारी से। पहली, त्रिपुर-दहन किस तिथि को हुआ, इस पर पुराण एकमत नहीं हैं; कार्तिक पूर्णिमा से इसका जुड़ाव परंपरा में मजबूत है, पर हर ग्रंथ में एक जैसा नहीं। दूसरी, कथा कथा है — यह दिन को उसका नाम और उसका भाव देती है, इतिहास का लेखा-जोखा नहीं है।
काशी के घाट क्यों जलते हैं — देव दिवाली
काशी इस रात को देव दिवाली कहती है — देवताओं की दिवाली। स्थानीय परंपरा का तर्क सीधा है: जब शिव ने त्रिपुर का नाश किया, देवता उत्सव मनाने काशी उतरे, और नगर ने उनके स्वागत में दीप जलाए। दिवाली मनुष्यों की है; सोलह दिन बाद की यह रात मेहमानों की है।
होता यह है कि रविदास घाट से आदि केशव घाट तक हर घाट साँझ ढलते ही मिट्टी के दीयों से भर जाता है, और नदी हजारों और दीये लेकर बहती है। यहाँ दो चीजें अलग करना जरूरी है। काशी में कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान पुराना है और ग्रंथों में आधारित है। पूरे नगर में घाट-दर-घाट जो दृश्य आज बनता है, वह नया है — यह पंचगंगा घाट की रोशनी से फैला और हमारी ही स्मृति के भीतर उस बड़े आयोजन में बदला जो हर साल खबरों में छाया रहता है। दोनों सच हैं। प्राचीन उनमें से एक ही है।
गंगा स्नान और कार्तिक स्नान का पुण्य
कार्तिक स्नान एक दिन का नहीं, पूरे महीने का व्रत है। यह शरद पूर्णिमा से लिया जाता है — इस बार 25 अक्टूबर 2026 — और कार्तिक पूर्णिमा तक हर दिन रखा जाता है: सूर्योदय से पहले नदी या सरोवर में स्नान, फिर दीप और एक छोटा पाठ। कार्तिक पूर्णिमा वह दिन है जिस पर यह व्रत पूरा होता है, और जिस दिन सबसे ज्यादा लोग स्नान करते हैं।
यदि नदी पहुँच में न हो तो परंपरा इसे चूक नहीं मानती। सूर्योदय से पहले घर पर, पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर किया गया स्नान स्वीकृत विकल्प है और व्रत की पोथियों में उसका नाम से उल्लेख है। कार्तिक का व्रत इस मान्यता पर कभी नहीं लिखा गया था कि हर कोई किसी तीर्थ के पास ही रहता है।
स्कंद पुराण और पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य वाले हिस्से इस स्नान के पुण्य पर बहुत उदार हैं, और कार्तिक पूर्णिमा पूरे महीने का सबसे भारी दिन मानी गई है। पर वे ग्रंथ यह नहीं बताते कि ऐसा क्यों है। वे पुण्य की घोषणा करते हैं, उसके पक्ष में तर्क नहीं देते। हमें भी उतना ही साफ रहना चाहिए: नवंबर के अंत में ठंडे पानी के स्नान से कोई चिकित्सकीय लाभ होता है, ऐसा कोई शास्त्रीय दावा नहीं है — और जो परंपरा के नाम पर ऐसा दावा गढ़ता है, वह परंपरा को उद्धृत नहीं कर रहा।
दान और दीपदान — दिन के दो हिस्से
इस दिन का दान ग्रंथों में असामान्य रूप से स्पष्ट है और असामान्य रूप से सादा। जो नाम लेकर आता है वह अन्न है — अनाज, घी, तिल, और आती हुई ठंड के सामने एक कंबल — और दीप का दान। सोना-चाँदी बाद की सूचियों में जुड़े; वे मूल बात नहीं हैं। क्रम परंपरा में यही है: पहले स्नान, फिर दान, फिर व्रत का समापन — और दान उसी सुबह का है, टाला हुआ नहीं।
दीपदान शाम का हिस्सा है। आटे या मिट्टी का दीया, रुई की बत्ती, घी या तिल का तेल — नदी या सरोवर में प्रवाहित किया जाए, और जहाँ जल न हो वहाँ तुलसी के पास या द्वार पर रख दिया जाए। परंपरागत संख्याएँ ग्यारह, इक्कीस या एक सौ आठ हैं; ध्यान से अर्पित किया गया एक अकेला दीया छोटा नहीं माना जाता।
24 नवंबर का समय: प्रदोष से शुरू करें, लगभग शाम 5:23 से, और रात 8:23 से पहले पूरा कर लें, जब तिथि समाप्त हो जाती है। दिन की पूजा राहु काल में न रखें — दिल्ली में यह दोपहर 2:45 से शाम 4:04 तक है। अपने शहर का राहु काल अलग से देख लें, दिल्ली का उधार न लें।
उसी दिन गुरु नानक जयंती
कार्तिक पूर्णिमा गुरु नानक जयंती भी है — गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व। इसलिए 24 नवंबर 2026 पर दोनों पर्व एक साथ पड़ते हैं। गुरुद्वारों में अखंड पाठ उसी सुबह संपन्न होता है, उससे पहले के दिनों में प्रभात फेरियाँ निकलती हैं, और दिन भर लंगर चलता है।
एक बात सटीकता की: सिख पंचांग अपनी गणना से यह तिथि तय करता है, इसलिए प्रकाश पर्व की घोषित तारीख हिंदू पंचांग से अनुमान लगाने के बजाय स्थानीय गुरुद्वारे या शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के कैलेंडर से लेना ठीक रहता है। 2026 में दोनों कार्तिक पूर्णिमा पर सहमत हैं। यह सहमति हर साल अपने-आप नहीं होती।
कार्तिक मास 2026: शुरू से अंत तक
व्रत इस दिन छोड़ा नहीं, समाप्त किया जाता है। जिन्होंने पूरा महीना रखा, वे आखिरी स्नान, दीपदान और अन्न के दान के साथ इसे पूरा करते हैं, और जिन परिवारों में परंपरा है वहाँ उद्यापन भी — महीने भर काम आया दीपक और पात्र दान कर देना। जिन्होंने महीने का कुछ हिस्सा ही रखा, उनसे इससे अधिक कुछ नहीं कहा गया।
| तारीख | वार | पर्व | तिथि (दिल्ली) |
|---|---|---|---|
| 25 अक्टूबर 2026 | रविवार | शरद पूर्णिमा — कार्तिक स्नान आरंभ | आश्विन शुक्ल पूर्णिमा सुबह 11:56 से |
| 27 अक्टूबर 2026 | मंगलवार | कार्तिक मास आरंभ (पूर्णिमांत) | कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा |
| 8 नवंबर 2026 | रविवार | नरक चतुर्दशी और दिवाली (लक्ष्मी पूजा) | अमावस्या सुबह 11:28 से |
| 10 नवंबर 2026 | मंगलवार | गोवर्धन पूजा | कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा |
| 11 नवंबर 2026 | बुधवार | भाई दूज | कार्तिक शुक्ल द्वितीया |
| 20 नवंबर 2026 | शुक्रवार | देव उठनी एकादशी | एकादशी सुबह 7:14 से |
| 21 नवंबर 2026 | शनिवार | तुलसी विवाह | कार्तिक शुक्ल द्वादशी सुबह 6:30 से |
| 24 नवंबर 2026 | मंगलवार | कार्तिक पूर्णिमा / देव दिवाली — कार्तिक स्नान समाप्त | पूर्णिमा रात 8:23 तक |
तारीखें, तिथि समय और 27 अक्टूबर को मास बदलने की जानकारी दिल्ली के लिए पंचांग इंजन से ली गई है, और पर्वों के नाम भी इंजन के ही हैं। कार्तिक स्नान के आरंभ और समाप्त वाली टिप्पणी परंपरा की है, इंजन का मान नहीं।
जो शास्त्र कहता है, और जो नहीं कहता
तारीख गणित है और वह पक्की है: पूर्णिमा 23 नवंबर की रात 11:42 से 24 नवंबर की रात 8:23 तक, और पर्व 24 तारीख का। ग्रहों की स्थिति गणना से निकलती है, वह किसी की राय नहीं है।
बाकी सब परंपरा है, और उसे परंपरा कहकर ही बताना चाहिए। पुराण कहते हैं कि कार्तिक स्नान का पुण्य बड़ा है, और यह नहीं कहते कि क्यों। काशी के घाट इसलिए जलते हैं क्योंकि नगर ने लंबे समय में यह तय किया कि देवताओं का स्वागत ऐसे किया जाता है। इन दोनों को किसी वैज्ञानिक पॉलिश की जरूरत नहीं है, और उसे जोड़ने से बात कम भरोसेमंद ही होती है। स्नान, दीप और दान रखिए; तारीख पंचांग से लीजिए; और व्याख्याओं को वहीं छोड़ दीजिए जहाँ ग्रंथों ने छोड़ा है।
अपने शहर का 24 नवंबर का पूरा पंचांग यहाँ देख सकते हैं। महीने के बाकी हिस्से के लिए 8 नवंबर की दिवाली 2026 और पूर्णिमा की तारीख कैसे तय होती है — ये दोनों लेख काम आएँगे।