नवरात्रि 2026 चौथा दिन, 14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा पूजा विधि, भोग, मंत्र और रंग
नवरात्रि 2026 का चौथा दिन बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को है। इस दिन आश्विन शुक्ल चतुर्थी रहती है, जो 13 अक्टूबर की रात 11:28 बजे से 15 अक्टूबर को 01:14 बजे तक चलती है। मां कूष्मांडा की पूजा विधि, मालपुए का भोग, मंत्र, दिल्ली के साफ़ मुहूर्त और शहरवार सूर्योदय — सब एक जगह।
नवरात्रि 2026 का चौथा दिन बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को है। इस दिन आश्विन शुक्ल चतुर्थी रहती है और मां कूष्मांडा की उपासना होती है — वही स्वरूप जिसके बारे में परंपरा कहती है कि उन्होंने सृष्टि किसी अस्त्र से नहीं, किसी युद्ध के बाद नहीं, बल्कि एक मुस्कान से रची।
इस पृष्ठ के सारे समय दिल्ली के लिए और भारतीय मानक समय में हैं। भारत के पूर्वी और पश्चिमी छोर के बीच सूर्योदय में एक घंटे से ज़्यादा का अंतर है, और सूर्योदय पर टिका हर मुहूर्त उसी के साथ खिसकता है। इसलिए नीचे दी गई शहरवार तालिका में अपना शहर ज़रूर देखें।
नवरात्रि 2026 का चौथा दिन कब है
शारदीय नवरात्रि 2026 का आरंभ घटस्थापना के साथ रविवार, 11 अक्टूबर को हुआ। आगे गिनने पर चौथा दिन बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को पड़ता है।
तिथि को ध्यान से पढ़िए, क्योंकि असली भ्रम यहीं से शुरू होता है। आश्विन शुक्ल चतुर्थी 13 अक्टूबर की रात 11:28 बजे लगती है और 15 अक्टूबर को तड़के 01:14 बजे समाप्त होती है। यह समाप्ति का समय आधी रात के बाद का है, इसलिए कई छपे हुए कैलेंडर "चतुर्थी 15 अक्टूबर तक" दिखाते हैं और पाठक पूछने लगते हैं कि पूजा 14 को करें या 15 को।
पूजा 14 अक्टूबर को ही है। व्रत का दिन इस बात से तय होता है कि तिथि किस सूर्योदय को स्पर्श कर रही है, इससे नहीं कि वह घड़ी के हिसाब से किस तारीख तक खिंच गई। 14 अक्टूबर को दिल्ली के सूर्योदय (प्रातः 06:22) के समय चतुर्थी चल रही है। 15 अक्टूबर के सूर्योदय तक वह समाप्त हो चुकी होती है और पंचमी लग जाती है। इसलिए पूरे भारत में चौथा दिन 14 अक्टूबर ही है। 01:14 का आंकड़ा सिर्फ़ एक काम की बात बताता है — उस रात कितनी देर तक चतुर्थी का संकल्प तकनीकी रूप से वैध रहेगा। तिथि के आरंभ-अंत की गणना समझनी हो तो हमारा तिथि पृष्ठ देखें।
एक बात और, ताकि पूरा सप्ताह ठीक से बैठे: 2026 में नवरात्रि को नौ सीधी-सादी तारीखें नहीं मिलतीं। सप्तमी दो लगातार सूर्योदयों को छूती है, इसलिए छठे दिन के बाद दिन-गणना और कैलेंडर की तारीख अलग-अलग चलने लगती हैं। पूरा क्रम हमारे नवरात्रि 2026 नौ दिन के कैलेंडर में है, और अष्टमी-नवमी की उलझन दुर्गा अष्टमी और महानवमी 2026 में। चौथे दिन को लेकर कोई दुविधा नहीं है।
14 अक्टूबर 2026 का पंचांग (दिल्ली)
| अंग | मान (भा.मा.स., दिल्ली) |
|---|---|
| तिथि | आश्विन शुक्ल चतुर्थी, 13 अक्टूबर रात्रि 11:28 से 15 अक्टूबर प्रातः 01:14 तक |
| वार | बुधवार |
| नक्षत्र | अनुराधा, प्रथम चरण (स्वामी शनि, देवता मित्र) |
| योग | आयुष्मान |
| करण | वणिज |
| सूर्योदय / सूर्यास्त | प्रातः 06:22 / सायं 05:51 |
| चंद्रोदय / चंद्रास्त | प्रातः 09:44 / रात्रि 08:01 |
| ब्रह्म मुहूर्त | प्रातः 04:46 से 05:34 |
| अभिजित मुहूर्त | प्रातः 11:44 से दोपहर 12:30 |
| राहुकाल | दोपहर 12:07 से 01:33 |
| यमगंड | प्रातः 07:48 से 09:14 |
| गुलिक काल | प्रातः 10:40 से दोपहर 12:07 |
दो छोटे संयोग जो देखने में अच्छे लगते हैं: इस वर्ष चौथे दिन का योग आयुष्मान है, जिसका अर्थ ही दीर्घायु है, और कूष्मांडा वही स्वरूप हैं जिनसे आयु और आरोग्य की प्रार्थना की जाती है। दूसरा, चतुर्थी तिथि के अधिपति गणेश हैं, इसीलिए बहुत से घरों में चौथे दिन की देवी-पूजा गणेश स्मरण से शुरू होती है। इनसे विधि में कोई परिवर्तन नहीं होता। ये सुखद हैं, अनिवार्य नहीं।
असल में साफ़ मुहूर्त कौन-से हैं
पंचांग की तालिकाएं शुभ समय एक कॉलम में और अशुभ समय दूसरे में छाप देती हैं, और यह पहचानना आप पर छोड़ देती हैं कि दोनों कहां टकरा रहे हैं। 14 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में दो जगह टकराव है, और वह मायने रखता है।
| अवधि (दिल्ली) | चौघड़िया | निष्कर्ष |
|---|---|---|
| प्रातः 06:22 – 07:48 | लाभ | साफ़ — सुबह का सर्वोत्तम समय |
| प्रातः 07:48 – 09:14 | अमृत | यमगंड से बिल्कुल मेल खा रहा है |
| प्रातः 10:40 – दोपहर 12:07 | शुभ | गुलिक काल से बिल्कुल मेल खा रहा है |
| दोपहर 12:07 – 01:33 | रोग | राहुकाल — टालें |
| सायं 04:25 – 05:51 | लाभ | साफ़ — सूर्यास्त पर समाप्त, संध्या आरती के लिए |
यानी चौथे दिन दो ही निर्विवाद अवधियां हैं — दिन की पहली चौघड़िया और सूर्यास्त से ठीक पहले वाली। अभिजित मुहूर्त प्रातः 11:44 से 12:30 तक है, पर शास्त्रीय नियम बुधवार को अभिजित को छोड़ देता है और 14 अक्टूबर बुधवार ही है। यह बात यहां पूर्णता के लिए है, बाधा के रूप में नहीं — नवरात्रि की दैनिक पूजा नित्य कर्म है, वह मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं करती। राहुकाल की गणना का आधार जानना हो तो राहुकाल पृष्ठ देखें।
मां कूष्मांडा कौन हैं
नाम तीन टुकड़ों में खुलता है। कु यानी थोड़ा। ऊष्मा यानी ताप। अंड यानी अंडा — यहां ब्रह्मांड। तीनों मिलाकर अर्थ हुआ: जिन्होंने थोड़ी-सी ऊष्मा से ब्रह्मांड रच दिया।
स्तुति-परंपरा वह ब्योरा जोड़ती है जिससे चित्र पूरा बनता है। सृष्टि से पहले चारों ओर अंधकार था, और देवी ने मंद हास किया — बस एक हल्की मुस्कान — और उस मुस्कान की ऊष्मा ब्रह्मांड को जन्म देने के लिए पर्याप्त थी। यह कल्पना इसलिए विशेष है कि इसमें से क्या-क्या हटा दिया गया है। न मंथन, न तप, न युद्ध, न कोई मूल्य चुकाना। सृष्टि यहां परिश्रम नहीं, अतिरेक है।
वे अष्टभुजा हैं, और नवदुर्गा में आठ भुजाओं वाला पहला स्वरूप वही हैं। सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा हैं। आठवें हाथ में जपमाला है, और ग्रंथ उसी को अलग से रेखांकित करते हैं — कहा जाता है कि यही माला आठ सिद्धियां और नौ निधियां देती है। इनका वाहन सिंह है।
सूर्य के भीतर निवास का अर्थ
कूष्मांडा का धाम किसी स्वर्ग या पर्वत पर नहीं, सूर्यमंडल के भीतर बताया गया है। कारण सीधा दिया जाता है — वहां रहने का तेज किसी और में नहीं। कहा जाता है कि सूर्य की दिशा और दीप्ति इन्हीं के शरीर से आती है, और दसों दिशाएं इन्हीं के तेज से प्रकाशित हैं।
यह खगोल-विज्ञान का दावा नहीं है, और परंपरा इसे उस रूप में प्रस्तुत भी नहीं करती। यह इस बात का कथन है कि एक विशेष प्रकार की शक्ति कहां स्थित मानी गई है — वह शक्ति जो लगातार देती है पर घटती नहीं। चौथा दिन यही गुण मांगता है, और इसीलिए इनकी उपासना धन या रक्षा से नहीं, स्वास्थ्य, ओज और यश से जोड़ी जाती है।
रंग का सवाल: सीधी बात
14 अक्टूबर 2026 को आप एक अख़बार की नवरात्रि रंग-सूची में हरा पाएंगे और दूसरे में नारंगी। दोनों पूरे आत्मविश्वास से लिखे होंगे। दोनों में कोई स्रोत नहीं होगा।
कारण यह है कि स्रोत है ही नहीं। नौ दिन के नौ रंगों वाली सूची आधुनिक चलन है — यह गुजराती गरबा संस्कृति से निकली और पिछले कुछ दशकों में मराठी और हिंदी अख़बारों ने इसे मानक रूप दिया। यह हर वर्ष और हर प्रकाशन में बदलती है, क्योंकि इसका आधार देवी नहीं, वार है। पुराण कूष्मांडा के लिए कोई रंग निर्धारित नहीं करते।
हम इसे साफ़ कह देना बेहतर समझते हैं, बजाय कोई कारण गढ़ने के। यदि आपको ऐसा रंग चाहिए जिसके पीछे सचमुच एक तर्क हो, तो सूर्यमंडल का केसरिया-नारंगी लीजिए, जिसके भीतर उनका निवास कहा गया है। वह पहनना उस चार्ट का नहीं, उनकी अपनी प्रतिमा-कल्पना का अनुसरण है।
भोग: मालपुआ और नाम में छिपा कूष्मांड
चौथे दिन का प्रचलित भोग मालपुआ है, जो अर्पित करने के बाद प्रायः ब्राह्मण को दिया जाता है या प्रसाद रूप में बांटा जाता है। परंपरा यह नहीं बताती कि मालपुआ ही क्यों, और हम कोई कारण गढ़कर नहीं जोड़ेंगे। यह घी में बना समृद्ध मिष्ठान्न है और ऐश्वर्य से जुड़े स्वरूप के अनुकूल है — स्रोत इससे आगे कुछ नहीं कहते।
पर स्रोत जो जोड़ते हैं, वह अधिक सूक्ष्म और अधिक रोचक है। संस्कृत में कूष्मांड पेठे का भी नाम है — कुम्हड़ा, सफ़ेद कद्दू। दुर्गा पूजा में यही पेठा बलि के स्थान पर दिया जाने वाला शास्त्रीय प्रतिस्थापन है। यानी जिस फल का नाम देवी के नाम में है, वही फल एक प्राण के बदले चढ़ने वाला अर्घ्य भी है। थाली में मालपुए के अलावा कुछ एक ही रखना हो तो पेठे का एक टुकड़ा रखिए।
इसके अतिरिक्त: लाल पुष्प, विशेषतः गुड़हल या लाल गुलाब; सिंदूर; नारियल; ऋतु-फल; और धूप। इनमें से कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
चौथे दिन के मंत्र
तीन स्तर, जितना आप सहज धारण कर सकें।
- सबसे सरल: ॐ देवी कूष्मांडायै नमः — 108 बार जप।
- सप्तशती का रूप: या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
- ध्यान श्लोक: सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे॥
ध्यान श्लोक में उन्हें कमल जैसे हाथों में अमृत का कलश धारण किए बताया गया है। वही मंत्र चुनिए जिसका उच्चारण आप बिना अटके कर सकें — स्क्रीन से अटक-अटककर पढ़े गए मंत्र से एक सरल मंत्र, ध्यान से कहा गया, अधिक मूल्यवान है।
पूजा विधि
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूर्व या ईशान की ओर मुख करके बैठें।
- कलश और देवी के चित्र के सामने दीप जलाएं। घटस्थापना पर कलश स्थापित किया था तो चौथे दिन की पूजा उसी स्थान पर आगे बढ़ती है — न कुछ हटाना है, न फिर से आरंभ करना है।
- गणेश स्मरण से शुरुआत करें, जो किसी भी चतुर्थी को उपयुक्त है।
- संकल्प लें और दिन का नाम लें — आश्विन शुक्ल चतुर्थी, शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन।
- मां कूष्मांडा को जल, अक्षत, लाल पुष्प, सिंदूर और धूप अर्पित करें।
- मंत्र का जप करें, हो सके तो 108 बार।
- मालपुए का भोग पेठे के एक टुकड़े के साथ अर्पित करें।
- कूष्मांडा स्तुति का पाठ या श्रवण करें, फिर आरती करें।
- प्रसाद वितरित करें। व्रत रखने वाले केवल फलाहार लें।
संध्या आरती किसी साफ़ अवधि में करनी हो तो दिल्ली में सायं 04:25 से 05:51 की लाभ चौघड़िया इसके लिए ठीक बैठती है।
शहरवार सूर्योदय, सूर्यास्त और राहुकाल
असल में शहर के हिसाब से यही आंकड़े बदलते हैं। तिथि नहीं बदलती — चतुर्थी पूरे भारत में एक ही क्षण लगती और उतरती है — पर सूर्योदय से निकलने वाला हर मुहूर्त खिसक जाता है। 14 अक्टूबर को गुवाहाटी का सूर्योदय अहमदाबाद से 74 मिनट पहले हो जाता है।
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त | राहुकाल |
|---|---|---|---|
| दिल्ली | 06:22 | 17:51 | 12:07 – 13:33 |
| मुंबई | 06:33 | 18:15 | 12:24 – 13:52 |
| कोलकाता | 05:33 | 17:11 | 11:22 – 12:49 |
| बेंगलुरु | 06:10 | 18:00 | 12:05 – 13:34 |
| चेन्नई | 06:00 | 17:49 | 11:54 – 13:23 |
| अहमदाबाद | 06:36 | 18:14 | 12:25 – 13:52 |
| जयपुर | 06:26 | 17:58 | 12:12 – 13:39 |
| लखनऊ | 06:06 | 17:38 | 11:52 – 13:18 |
| पटना | 05:48 | 17:22 | 11:35 – 13:02 |
| गुवाहाटी | 05:22 | 16:55 | 11:08 – 12:35 |
यहां जो शहर नहीं है, उसके लिए दैनिक पंचांग पर अपना स्थान चुना जा सकता है।
आरोग्य और तेज
स्तुति स्पष्ट कहती है कि कूष्मांडा की उपासना से क्या मिलता है — आयु, यश, बल और आरोग्य, तथा रोग और शोक का नाश। साधक चौथे दिन को नवरात्रि साधना-क्रम में अनाहत चक्र से भी जोड़ते हैं।
ये परंपरा के अपने कथन हैं और उसी रूप में यहां दिए गए हैं। ये भक्ति के वचन हैं, चिकित्सा के नहीं, और यह लेख इन्हें कुछ और बनाकर पेश नहीं करेगा। यह दिन जो सचमुच देता है वह एक चित्र है, जिसके साथ कुछ मिनट बैठा जा सकता है — कि सृष्टि हिंसा या श्रम से नहीं, ऊष्मा के एक क्षण से आरंभ हुई, और जिसने उसे रचा वह आज भी सूर्य के भीतर जल रहा है, हर दिन प्रकाश देता हुआ, और कभी चुकता नहीं।