नवरात्रि 2026: दुर्गा अष्टमी और महानवमी एक ही दिन, 19 अक्टूबर — पूरा गणित और समय

दुर्गा अष्टमी और महानवमी दोनों सोमवार 19 अक्टूबर 2026 को हैं। सूर्योदय पर अष्टमी चल रही है और सुबह 10:52 बजे नवमी शुरू हो जाती है। संधि पूजा का समय, दोनों देवियों का भोग-मंत्र और व्रत रखने वालों के लिए पूरा हिसाब।

शारदीय नवरात्रि 2026 का अंत एक ऐसे मोड़ पर है जो हर साल नहीं आता — आठवाँ और नौवाँ दिन, दोनों एक ही तारीख पर। सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में सूर्योदय सुबह 6:25 बजे है और उस समय अष्टमी तिथि चल रही है। अष्टमी उसी सुबह 10:52 बजे समाप्त होती है और ठीक उसी क्षण नवमी शुरू हो जाती है। इसलिए दुर्गा अष्टमी और महानवमी दोनों 19 अक्टूबर को मनाई जाएँगी और विजयादशमी 20 अक्टूबर को। कैलेंडर में गलती नहीं है। नीचे पूरा हिसाब है — संधि पूजा का सही समय, और व्रत रखने वालों के लिए इसका मतलब।

19 अक्टूबर को असल में हो क्या रहा है

तिथि दिन नहीं होती। तिथि वह अवधि है जिसमें चंद्रमा सूर्य से बारह अंश आगे निकलता है — कभी लगभग 22 घंटे, कभी लगभग 26, जबकि कैलेंडर का दिन हमेशा 24 घंटे का है। इसलिए लंबी तिथि लगातार दो सूर्योदय पकड़ लेती है और छोटी तिथि किसी सूर्योदय को छू ही नहीं पाती। त्योहार की तारीख इससे तय होती है कि नियत समय पर — प्रायः सूर्योदय, कहीं मध्याह्न या अपराह्न — कौन-सी तिथि चल रही है। एक लंबी तिथि आगे का पूरा क्रम बदल देती है।

इस बार नवरात्रि के उत्तरार्ध में यही हुआ। शुक्ल सप्तमी 17 अक्टूबर को सुबह 5:55 बजे शुरू होकर 18 अक्टूबर को सुबह 8:28 बजे तक चली — 26 घंटे 33 मिनट, यानी लगातार दो सूर्योदय, इसलिए सप्तमी ने दो तारीखें ले लीं। अष्टमी 18 अक्टूबर को 8:28 बजे, उस सुबह के सूर्योदय के बाद शुरू हुई, इसलिए उसे अपनी एक ही तारीख मिली — 19 अक्टूबर। नवमी 19 अक्टूबर को 10:52 बजे शुरू होकर अगले दिन तक चलती है, पर 20 अक्टूबर पर दशमी का अधिकार है: उस दिन के अपराह्न में दशमी रहती है, इसलिए विजयादशमी 20 अक्टूबर की है।

नतीजा यह कि महानवमी की पूजा 19 अक्टूबर पर लौट आती है — वही एक दिन जब नवमी पूरे मध्याह्न और पूरे अपराह्न में मौजूद है, और नवमी पूजा तथा हवन परंपरा से इन्हीं कालों में होते हैं। पर्व छोटा नहीं हुआ: घटस्थापना 11 अक्टूबर को थी, इसलिए नवरात्रि पूरे नौ दिन चली — अनियमित दिनों की गिनती नहीं, उनके भीतर तिथियों का क्रम है।

सारे समय एक ही तालिका में

घटनातारीखसमय (दिल्ली)
सप्तमी समाप्त, अष्टमी आरंभ18 अक्टूबरसुबह 8:28
सूर्योदय19 अक्टूबरसुबह 6:25
राहु काल19 अक्टूबरसुबह 7:50 – 9:15
संधि पूजा आरंभ19 अक्टूबरसुबह 10:28
अष्टमी समाप्त, नवमी आरंभ19 अक्टूबरसुबह 10:52
मध्याह्न आरंभ19 अक्टूबरसुबह 10:57
संधि पूजा समाप्त19 अक्टूबरसुबह 11:16
अभिजित मुहूर्त19 अक्टूबरसुबह 11:43 – दोपहर 12:28
अपराह्न19 अक्टूबरदोपहर 1:14 – 3:30
सूर्यास्त19 अक्टूबरशाम 5:46
नवमी समाप्त, दशमी आरंभ20 अक्टूबरदोपहर 12:50
विजयादशमी20 अक्टूबरपूरा दिन

19 अक्टूबर को नक्षत्र उत्तराषाढ़ा और योग धृति है। किसी और तारीख की चलती तिथि और उसका आरंभ-अंत हमारे तिथि पेज पर है, और उस दिन का राहु काल राहु काल पेज पर।

संधि पूजा: सुबह 10:28 से 11:16 तक

नवरात्रि में संधि पूजा अकेला ऐसा कर्म है जिसका सूर्योदय से कोई लेना-देना नहीं। यह दो तिथियों की संधि पर टिकी है — अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट, कुल 48 मिनट। पुरानी गणना में 24 मिनट की एक घटी होती है, यानी विधान बस इतना है कि संधि के दोनों ओर एक-एक घटी। ग्रंथ माप बता देते हैं, कारण नहीं बताते — और हम कोई कारण गढ़ेंगे नहीं।

यह संधि 10:52:04 बजे पड़ती है, इसलिए संधि पूजा सोमवार 19 अक्टूबर, सुबह 10:28 से 11:16 बजे तक है। बंगाल की परंपरा में यही वह क्षण है जब देवी चामुंडा रूप लेकर चंड और मुंड का अंत करती हैं; वहाँ 108 दीप और 108 कमल अर्पित होते हैं। उत्तर भारत में यह सादा रहता है — 10:28 पर दीप, लाल फूल, और पूरे समय दुर्गा सप्तशती या अर्गला स्तोत्र का पाठ।

एक काम की बात: यह अवधि तिथि की संधि से तय होती है, सूर्योदय से नहीं। इसलिए भारतीय मानक समय में यह हर जगह एक ही है — कोलकाता, चेन्नई और अहमदाबाद में भी सुबह 10:28 से 11:16। राहु काल 9:15 पर खत्म हो जाता है, इसलिए वह इससे टकराता नहीं।

आठवीं रात — माँ महागौरी

महागौरी नवदुर्गा का आठवाँ रूप हैं; नाम का अर्थ है अत्यंत गौर। कथा है कि कठोर तप से पार्वती का वर्ण श्याम पड़ गया, फिर शिव ने गंगाजल से स्नान कराया और कांति लौटी। वे श्वेत वस्त्र में वृषभ पर विराजमान हैं, हाथों में त्रिशूल और डमरू, तथा अभय और वरद मुद्रा। इनकी उपासना संचित दोषों के शमन से जोड़ी जाती है, नई प्राप्ति से नहीं।

  • भोग: नारियल — साबुत या नारियल की बर्फी।
  • नाम मंत्र: ॐ देवी महागौर्यै नमः
  • ध्यान श्लोक: श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

नवीं रात — माँ सिद्धिदात्री

सिद्धिदात्री नवाँ और अंतिम रूप हैं — कमल पर विराजमान, चतुर्भुजा, हाथों में गदा, चक्र, शंख और कमल। ये सिद्धियों की दात्री हैं। सामान्य वर्ष में इनकी पूजा नवरात्रि को अपने अलग दिन पर पूर्ण करती है; 2026 में वह महागौरी की पूजा के कुछ घंटे बाद उसी दिन होगी।

  • भोग: तिल — प्रायः तिल के लड्डू, कन्या भोज की पूरी, चना और हलवे के साथ।
  • नाम मंत्र: ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः
  • ध्यान श्लोक: सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

एक बात हर साल पूछी जाती है, इसलिए साफ कह दें: नौ रंगों की जो सूची घूमती है, वह अखबारी चलन है, शास्त्रीय विधान नहीं। जो आपके घर में पहना जाता है, वही पहनिए।

अष्टमी का व्रत और नवमी का व्रत

ज्यादातर घरों में दोनों में से एक ही व्रत रखा जाता है। इस बार दोनों 19 अक्टूबर को हैं, इसलिए फर्क तारीख का नहीं, घड़ी का रह जाता है।

विवरणअष्टमी व्रतनवमी व्रत
देवीमाँ महागौरीमाँ सिद्धिदात्री
2026 में तारीखसोम, 19 अक्टूबरसोम, 19 अक्टूबर
पूजा की अवधिसुबह 6:25 – 10:52सुबह 10:52 के बाद
सबसे साफ समयसुबह 9:15 – 10:28सुबह 10:57 – दोपहर 3:30
भोगनारियलतिल

अष्टमी का व्रत रखने वालों को पूजा 10:52 से पहले पूरी करनी होगी, क्योंकि उसके बाद अष्टमी रहती ही नहीं; सबसे साफ समय सुबह 9:15 से 10:28 है — राहु काल के बाद, संधि पूजा से पहले। नवमी का व्रत भी इसी दिन है, पर पूजा दोपहर की: मध्याह्न 10:57 बजे खुलता है, अपराह्न 3:30 बजे बंद होता है, और नवमी दोनों में मौजूद है।

कन्या पूजन कब बिठाएँ

अष्टमी को कन्या पूजन करने वाले और नवमी को करने वाले, दोनों इस बार एक ही सुबह रसोई में होंगे। कन्याओं को एक ही बार बिठाना हो तो व्यावहारिक उत्तर है — संधि पूजा के बाद, यानी सुबह 11:16 के बाद: भोज नवमी के भीतर पड़ता है और अष्टमी पूजा पहले ही पूरी हो चुकी होती है। जो घर दोनों अलग रखना चाहते हैं, वे अष्टमी का पूजन 10:52 से पहले कर लें और कन्या भोज 11:16 के बाद।

नवरात्रि व्रत का पारण कब

जिन्होंने पूरे नौ दिन व्रत रखा है, उनके लिए पुराना नियम है कि पारण नवमी तिथि समाप्त होने के बाद हो — यानी मंगलवार 20 अक्टूबर को दोपहर 12:50 के बाद। बहुत से परिवार 19 अक्टूबर को ही, नवमी पूजा और कन्या भोज के बाद पारण कर लेते हैं। दोनों प्रचलित हैं; अपने घर का नियम अपने पंचांग या पुरोहित से तय कीजिए।

जहाँ परिवारों में फर्क रहेगा

एक असली मतभेद छिपाने के बजाय कह देना बेहतर है। 20 अक्टूबर को सूर्योदय के समय भी नवमी चल रही है, दोपहर 12:50 तक। इसलिए जो घर केवल उदया तिथि से त्योहार तय करते हैं, वे नवमी पूजा उसी सुबह रख सकते हैं। अधिकांश पंचांग ऐसा नहीं करते, क्योंकि अपराह्न के नियम से 20 अक्टूबर विजयादशमी है। आपका पंचांग 20 अक्टूबर कहे तो वह गलत नहीं — वह उन्हीं आँकड़ों पर दूसरा नियम लगा रहा है। पूरे नौ दिन का विवरण हमारे नवरात्रि 2026 कैलेंडर में है।

आपके शहर का सूर्योदय दिल्ली जैसा नहीं है

ऊपर के सारे समय दिल्ली के लिए, भारतीय मानक समय में हैं। भारत में सूर्योदय बहुत खिसकता है — गुवाहाटी में सूरज कच्छ से लगभग डेढ़ घंटा पहले निकलता है — इसलिए सूर्योदय, सूर्यास्त, मध्याह्न और अपराह्न आपके शहर में बदलेंगे। तिथि नहीं बदलेगी: 10:52:04 पूरे देश में एक ही क्षण है, इसीलिए संधि पूजा की अवधि इस लेख की अकेली ऐसी संख्या है जिसे बिना बदले इस्तेमाल किया जा सकता है। अपने शहर के लिए दैनिक पंचांग देखिए।

सभी लेख / All articles · आज का राशिफल · आज का पंचांग