शीतला सातम 2026: 3 सितंबर, बासोड़ा और ठंडा खाना क्यों खाते हैं

शीतला सातम 2026 गुरुवार, 3 सितंबर को है — सूर्योदय पर कृष्ण सप्तमी। खाना बुधवार को बनता है और अगले दिन ठंडा खाया जाता है, चूल्हा नहीं जलता। इस साल षष्ठी तिथि का क्षय है। साथ में यह भी कि कौन-सी बात शास्त्र है और कौन-सी लोकस्मृति।

शीतला सातम इस साल गुरुवार, 3 सितंबर 2026 को है। जो खाना उस दिन खाया जाएगा वह एक दिन पहले — बुधवार 2 सितंबर को — बनेगा, और अगले दिन ठंडा ही खाया जाएगा। सातम के दिन घर में चूल्हा नहीं जलता।

व्रत इतना ही है। आगे यह है कि तारीख़ यहीं क्यों पड़ती है, और शीतला माता की कहानी में कौन-सा हिस्सा शास्त्र है और कौन-सा लोकस्मृति।

तारीख़: गुरुवार, 3 सितंबर 2026

शीतला सातम कृष्ण पक्ष की सप्तमी को रखी जाती है, और नियम वही सामान्य है — जो तिथि सूर्योदय पर चल रही हो, दिन उसी का। हमारे इंजन के अनुसार, दिल्ली के लिए:

  • सप्तमी आरंभ — गुरुवार 3 सितंबर, 04:26
  • सप्तमी समाप्त — शुक्रवार 4 सितंबर, 02:26
  • दिल्ली में 3 सितंबर का सूर्योदय — 06:01

सप्तमी केवल गुरुवार के सूर्योदय पर चल रही है, इस पूरे पक्ष में और किसी सूर्योदय पर नहीं। इसलिए तारीख़ 3 सितंबर, बिना किसी विवाद के — इस त्योहार में हर साल इतनी सफ़ाई नहीं मिलती।

नाम की एक बात समझ लीजिए। गुजरात में यह श्रावण वद सातम है; उत्तर भारत का पंचांग इसी तिथि को भाद्रपद कृष्ण सप्तमी लिखेगा। दोनों सही हैं। गुजरात में महीना अमावस्या पर ख़त्म होता है, इसलिए यह पक्ष श्रावण का आख़िरी हिस्सा है; पूर्णिमांत गणना में महीना पूर्णिमा पर ख़त्म होता है, और श्रावण पूर्णिमा 28 अगस्त 2026 को बीत चुकी, इसलिए यही पक्ष भाद्रपद का पहला हिस्सा बनता है। हमारा दैनिक पंचांग श्रावण कहता है, त्योहार इंजन भाद्रपद।

2026 में षष्ठी तिथि का क्षय

गुजरात में सातम से पहले वाला दिन रंधन छठ कहलाता है — खाना पकाने की छठ, नाम षष्ठी पर। इस साल यह नाम आकाश से मेल नहीं खाता।

षष्ठी बुधवार 2 सितंबर को 06:12 से शुरू होकर गुरुवार 3 सितंबर को 04:26 पर समाप्त हो जाती है, जबकि दिल्ली में बुधवार का सूर्योदय 06:00 और गुरुवार का 06:01 है। यानी वह एक सूर्योदय के बारह मिनट बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पिच्यानवे मिनट पहले ख़त्म हो जाती है — किसी सूर्योदय को छूती ही नहीं। इसे तिथि क्षय कहते हैं। चंद्रमा इतना तेज़ चला कि एक पूरा सूर्योदय छूट गया, और पक्ष तेरह दिन का रह गया।

तो जिस दिन को सब रंधन छठ कहेंगे, उसके सूर्योदय पर पंचमी चल रही होगी। व्यवहार में कुछ नहीं बदलता — यह परंपरा सातम की पूर्व-संध्या से जुड़ी है, षष्ठी के सूर्योदय से नहीं, और खाना बुधवार को ही बनेगा। पर उस दिन पंचमी दिखाता पंचांग ग़लत नहीं है। तिथि पृष्ठ पर एक लेबल नहीं, आरंभ और समाप्ति का समय मिलता है।

खाना एक दिन पहले क्यों बनता है

नियम खाने का नहीं, चूल्हे का है। सातम के दिन चूल्हा नहीं जलता — न पकाना, न गरम करना, कड़े घरों में चाय तक नहीं।

इसीलिए रंधन छठ। पिछली शाम रसोई जमकर चलती है, और रात का आख़िरी काम होता है चूल्हा साफ़ करके ठंडा छोड़ देना। कई गुजराती घरों में चूल्हे की पूजा करके उसे ठंडा किया जाता है — इसी से दिन का असल अर्थ खुलता है। आग को विश्राम दिया जा रहा है, और शीतलता की देवी को ऐसे घर में बुलाया जा रहा है जिसमें कोई ताप बचा ही नहीं।

खाने की सूची किसी विधान से नहीं, इसी बंदिश से निकलती है — वही बनता है जो बिना फ़्रिज के रात काट ले और ठंडा भी अच्छा लगे: बाजरा ना रोटला, थेपला, पूरी, ढेबरा, मुठिया, सूखी सब्ज़ी, लाडू, कंसार। कोई तय सूची नहीं।

शहरवार सूर्योदय और राहु काल, 3 सितंबर 2026

पूजा सूर्योदय पर या उसके थोड़ी देर बाद होती है, इसलिए असल में सिर्फ़ अपने शहर का सूर्योदय मायने रखता है — एक ही सुबह वाराणसी और राजकोट में इक्यावन मिनट का फ़र्क़ है।

शहरसूर्योदयसूर्यास्तराहु काल
दिल्ली06:0118:3913:55 – 15:30
अहमदाबाद06:2318:5414:12 – 15:46
राजकोट06:3119:0114:19 – 15:53
सूरत06:2318:5214:11 – 15:45
जयपुर06:0818:4414:00 – 15:35
उदयपुर06:1718:5014:08 – 15:42
लखनऊ05:4718:2313:40 – 15:14
वाराणसी05:4018:1413:31 – 15:05
मुंबई06:2418:5014:10 – 15:44

सभी समय भारतीय मानक समय में। सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए सीमा पर पड़ने वाला मामला अपने पंचांग में देखिए, किसी और देशांतर की तालिका पर नहीं। राहु काल सिर्फ़ जानकारी के लिए है; सुबह की पूजा उसमें नहीं पड़ती।

शीतला माता और चेचक वाला सवाल

शीतला माता का सबसे प्रचलित रूप शीतलाष्टक से आता है — आठ श्लोकों का स्तोत्र, जो परंपरा से स्कंद पुराण का माना जाता है। स्वरूप विशिष्ट है: वे गर्दभ पर सवार हैं, हाथ में मार्जनी यानी झाड़ू, सूप, और शीतल जल का कलश। नाम का अर्थ ही है शीतल, और स्तोत्र उनसे ताप हरने की प्रार्थना करता है — ज्वर का ताप, देह की जलन, त्वचा पर उठे दाने।

उन्हें आमतौर पर चेचक की देवी भी कहा जाता है। यह पहचान सच्ची है, पुरानी है, और उत्तर तथा पश्चिम भारत में गहरी उतरी हुई है — पर यह लोकस्मृति है, शास्त्र नहीं। किसी पुराण में चेचक का नाम लेकर उसे शीतला से नहीं जोड़ा गया। शास्त्र एक समूह देते हैं: ताप, ज्वर, दाने, जलन। उस समूह को एक ख़ास बीमारी से बाँध देना गाँव की जीवित परंपरा का काम है, जिसे औपनिवेशिक काल के नृवंशीय और चिकित्सा-लेखन ने पक्का लेबल बना दिया।

यह फ़र्क़ बाल की खाल निकालना नहीं है। भारत में चेचक का आख़िरी मामला 1975 में दर्ज हुआ, और उसके बाद भी शीतला के मंदिर बंद नहीं हुए। स्त्रियाँ आज भी यह व्रत रखती हैं, और लगभग हमेशा बच्चों की कुशलता के लिए।

गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश

गुजरात में यह दिन सबसे मज़बूती से मनाया जाता है, और तीन दिन की कड़ी में बैठता है — बुधवार को रंधन छठ, गुरुवार को शीतला सातम, शुक्रवार 4 सितंबर को कृष्ण जन्माष्टमी। स्त्रियाँ भोर से पहले उठती हैं, ठंडे जल से स्नान करती हैं, और ठंडा भोजन तथा शीतल जल लेकर शीतला माता के स्थान पर जाती हैं। व्रत प्रायः संतान के लिए रखा जाता है।

राजस्थान में यह कई परिवारों में रखी जाती है, पर साल का बड़ा शीतला दिन चैत्र वाला है। उत्तर प्रदेश और ब्रज में यह बात और मज़बूती से लागू होती है, और सितंबर की यह तारीख़ जहाँ रखी भी जाती है वहाँ घर-भर का शांत आयोजन रहती है।

चैत्र की शीतला अष्टमी इससे अलग है

इन दोनों में लगातार भ्रम होता है, इसलिए सीधे-सीधे:

  • शीतला सातम — कृष्ण सप्तमी, अगस्त–सितंबर के आसपास। यह गुजरात का दिन है। 2026 में 3 सितंबर।
  • शीतला अष्टमी — चैत्र कृष्ण अष्टमी, होली के आठ दिन बाद, मार्च–अप्रैल के आसपास। यह उत्तर भारत का दिन है।

अलग मास, अलग तिथि। दोनों में ठंडा भोजन है, दोनों शीतला माता के लिए हैं, और बोलचाल में दोनों को बासोड़ा कहा जाता है — भ्रम की जड़ यहीं है। बासी यानी एक दिन पुराना; बासोड़ा भोजन का नाम है, तिथि का नहीं।

जो हम नहीं कहेंगे

आपको पढ़ने को मिलेगा कि साल के इस मोड़ पर ठंडा भोजन मौसम या विज्ञान के हिसाब से लाभदायक है। शास्त्र ऐसा कुछ नहीं कहते। वे भक्ति-कारण देते हैं: देवी शीतल की जाती हैं, इसलिए घर भी शीतल होता है। स्तोत्र में कोई आहार-तर्क नहीं, व्रत-साहित्य में कोई स्वास्थ्य-कारण नहीं — और जहाँ परंपरा कारण नहीं देती वहाँ कारण गढ़ देना उसका सम्मान नहीं।

दूसरी तरफ़ की ईमानदार बात भी कहनी चाहिए। सितंबर की उमस में बिना फ़्रिज के रखा एक दिन पुराना भोजन जोखिम-रहित नहीं है, और जो घर यह व्रत रखते हैं वे सूखी, कम नमी वाली चीज़ें बिना वजह नहीं बनाते। घर में छोटा बच्चा, बुज़ुर्ग या नाज़ुक पेट हो तो समझदारी से काम लीजिए।

दिन कैसे रखें

  1. बुधवार 2 सितंबर की शाम को खाना बना लें। रात का आख़िरी काम — चूल्हा साफ़ करके ठंडा छोड़ना।
  2. गुरुवार 3 सितंबर को सूर्योदय से पहले उठें — दिल्ली में 06:01, गुजरात में कुछ बाद।
  3. ठंडे जल से स्नान करें। आग बिल्कुल न जलाएँ।
  4. ठंडा भोजन और शीतल जल का कलश शीतला माता के स्थान पर, या घर में उनके चित्र के आगे अर्पित करें। परंपरा हो तो शीतलाष्टक पढ़ें।
  5. वही ठंडा भोजन सबके साथ बैठकर खाएँ। यही बाँटना व्रत है।

कोई मुहूर्त पकड़ने की ज़रूरत नहीं — शीतला पूजा प्रातःकालीन नित्य-प्रकार का कर्म है, मुहूर्त-बद्ध संस्कार नहीं। जानकारी के लिए, हमारे इंजन के अनुसार गुरुवार के सूर्योदय पर करण विष्टि (भद्रा) है। भद्रा नए आरंभ के लिए टाली जाती है, पर किसी व्रत-ग्रंथ में इसे इस पूजा पर रोक नहीं कहा गया; जो परिवार इसे कड़ाई से मानता है वह अपना पंचांग देख ले। सूर्योदय पर नक्षत्र कृत्तिका, चंद्र राशि मेष, सूर्य राशि सिंह।

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