दुर्गा पूजा 2026: षष्ठी से दशमी तक, 16 से 20 अक्टूबर

बंगाल की दुर्गा पूजा 2026 में 16 से 20 अक्टूबर चलती है। 10 अक्टूबर महालया, षष्ठी पर बोधन, नवपत्रिका स्नान, 19 अक्टूबर को 10:28 से 11:16 तक संधि पूजा और 20 अक्टूबर को दशमी, सिंदूर खेला तथा विसर्जन। इस बार सप्तमी की वृद्धि बीच के दिन क्यों खिसका देती है, वह भी तालिका के साथ।

बंगाल की दुर्गा पूजा और उत्तर की नवरात्रि एक ही तिथियों पर चलती हैं, फिर भी एक त्योहार नहीं हैं। उत्तर में नौ रातों का व्रत है और अंत रावण दहन पर। बंगाल में मिट्टी की प्रतिमा के चारों ओर पाँच दिन का कर्म है, जो असमय जगाने से शुरू होकर प्रतिमा को जल में उतारने पर खत्म होता है। 2026 में ये पाँच दिन 16 से 20 अक्टूबर के बीच पड़ते हैं, और इस बार तिथि तालिका में एक गाँठ है जो बीच के दिनों को खिसका देती है।

नीचे के सारे आँकड़े हमारे पंचांग इंजन से हैं, दिल्ली के लिए और भारतीय समय में। जहाँ संख्या पढ़ी नहीं, निकाली गई है, वहाँ साफ़ लिख दिया है।

बंगाल के पाँच दिन, 2026 की तिथि तालिका पर

दिनांकसूर्योदय के समय तिथितिथि की अवधिसूर्योदयचंद्रोदयबंगाल का कर्म
शनिवार 10 अक्टूबरअश्विन कृष्ण अमावस्या9 अक्टूबर 21:36:48 से 10 अक्टूबर 21:20:4306:1905:48महालया, तर्पण
शुक्रवार 16 अक्टूबरशुक्ल षष्ठी16 अक्टूबर 03:26:02 से 17 अक्टूबर 05:54:5806:2311:34कल्पारंभ, बोधन, आमंत्रण, अधिवास
शनिवार 17 अक्टूबरशुक्ल सप्तमी17 अक्टूबर 05:54:58 से 18 अक्टूबर 08:28:2806:2412:22सप्तमी का पहला सूर्योदय
रविवार 18 अक्टूबरशुक्ल सप्तमीवही अवधि06:2413:05सप्तमी का दूसरा सूर्योदय, नवपत्रिका स्नान
सोमवार 19 अक्टूबरशुक्ल अष्टमी18 अक्टूबर 08:28:28 से 19 अक्टूबर 10:52:0406:2513:44अष्टमी पूजा, संधि पूजा, नवमी आरंभ
मंगलवार 20 अक्टूबरशुक्ल नवमीनवमी 12:50:40 तक, फिर दशमी06:2514:18दशमी के कर्म, सिंदूर खेला, विसर्जन

तिथि की सीमाएँ, सूर्योदय और चंद्रोदय इंजन से दिल्ली के लिए पढ़े गए हैं। आख़िरी स्तंभ बंगाल का क्रम है, जो इन पर रखा गया है, इंजन का उत्तर नहीं।

महालया, 10 अक्टूबर: बुलावा है, शुरुआत नहीं

महालया अश्विन अमावस्या पर पड़ता है, जो 9 अक्टूबर को 21:36 से 10 अक्टूबर को 21:20 तक रहती है। 10 अक्टूबर का सूर्योदय 06:19 है, इसलिए उसी शनिवार अमावस्या उदय में है और वही तर्पण का दिन है। इसी के साथ पितृ पक्ष बंद होकर पखवाड़ा देवी पक्ष को सौंप दिया जाता है। यह पूजा का पहला दिन नहीं है; 2026 में महालया और षष्ठी के बीच लगभग एक हफ़्ता है। भोर में जो महिषासुरमर्दिनी सुनकर बंगाल जागता है, वह 1931 में पहली बार प्रसारित रेडियो कार्यक्रम है, प्रिय है पर शास्त्र नहीं, और ग्रंथ इसका विधान नहीं देते।

षष्ठी, 16 अक्टूबर: कल्पारंभ, बोधन, आमंत्रण, अधिवास

षष्ठी 16 अक्टूबर को 03:26:02 पर लगती है और अगली सुबह 05:54:58 तक रहती है, यानी पूरा शुक्रवार उसी के भीतर है। सुबह कल्पारंभ, यानी संकल्प का कर्म। शाम को बोधन, यानी देवी को जगाना। देवी अपनी ऋतु से बाहर जगाई जाती हैं, इसीलिए बंगाल इसे अकाल बोधन कहता है। राम के असमय आवाहन की कथा बांग्ला कृत्तिवासी रामायण से आती है; वाल्मीकि के पाठ में यह प्रसंग नहीं मिलता। संध्या पर आमंत्रण और अधिवास, परंपरा से बेल वृक्ष के नीचे। उस दिन राहुकाल 10:40 से 12:06 है।

सप्तमी और कोला बउ: इस बार सप्तमी के दो सूर्योदय क्यों हैं

सप्तमी 17 अक्टूबर को 05:54:58 पर लगती है और 18 अक्टूबर को 08:28:28 पर छूटती है। दोनों सुबह सूर्योदय 06:24 है, इसलिए तिथि लगातार दो दिन उदय में मिलती है। यही वृद्धि तिथि है, जिसे एक अतिरिक्त दिन मिल गया, और इसी से आगे के दिन सिमट जाते हैं: इंजन अष्टमी और नवमी दोनों को 19 अक्टूबर पर रखता है।

सप्तमी की सुबह नवपत्रिका की है। नौ पौधे, बीच में केला, अपराजिता की लता से बाँधे जाते हैं, पूजा से पहले स्नान कराया जाता है और लाल किनारी की साड़ी पहनाकर गणेश की दाहिनी ओर बिठाया जाता है। कोला बउ नाम और उन्हें गणेश की पत्नी मान लेना लोक-प्रथा है। कर्मकांड के ग्रंथ नौ पौधे, स्नान और उन नौ देवियों के नाम देते हैं; विवाह का कोई उल्लेख नहीं देते। इस बिंदु पर शास्त्र चुप है, और हम उस चुप्पी को अपनी तरफ़ से नहीं भरेंगे।

तो महासप्तमी किस सुबह? नियम सिर्फ़ इतना है कि नवपत्रिका स्नान के समय सप्तमी चल रही हो, और दोनों सुबहें इस शर्त पर खरी उतरती हैं। पंजिकाएँ यह गुत्थी क्रम को अटूट रखकर सुलझाती हैं, जिससे महासप्तमी 18 अक्टूबर पर बैठती है और अष्टमी की पूजा ठीक अगली सुबह। बंगाल के लिए एक दूसरा कारण भी है: षष्ठी 05:54:58 पर छूटती है, और यह क्षण पूर्वी भारत में सूर्योदय के बाद का है, इसलिए कोलकाता की पंजिका 17 अक्टूबर को उदय में षष्ठी दिखा सकती है जहाँ दिल्ली की तालिका सप्तमी। यह तुलना तिथि के क्षण और कोलकाता के देशांतर से निकाली गई है, इंजन से पढ़ी नहीं गई। आपके पाड़े की कमेटी 17 अक्टूबर से शुरू करती है तो वह गणना का चुनाव है, गलती नहीं।

अष्टमी और संधि पूजा: 19 अक्टूबर, 10:28 से 11:16

अष्टमी 18 अक्टूबर 08:28:28 से 19 अक्टूबर 10:52:04 तक है। संधि पूजा अष्टमी के आख़िरी 24 और नवमी के पहले 24 मिनट में होती है, इसलिए 2026 में यह सोमवार 19 अक्टूबर को 10:28 से 11:16 तक पड़ती है। 48 मिनट, 108 दीये, 108 कमल, और पाँचों दिनों का सबसे ऊँचा ढाक।

इस खिड़की की एक बात बाक़ी मुहूर्तों से उलटी है। तिथि एक ही क्षण पर छूटती है, जो चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोण से तय होता है, और वह क्षण कोलकाता, दिल्ली और लंदन में एक ही है। सूर्योदय शहर बदलने पर खिसकता है; 10:52:04 नहीं खिसकता। इस पूरे पन्ने पर संधि पूजा अकेली ऐसी प्रविष्टि है जिसे बिना शहर का हिसाब लगाए साझा कैलेंडर में डाला जा सकता है। 19 अक्टूबर का राहुकाल 07:50 से 09:15 है, यानी इस खिड़की से पहले ही निकल जाता है।

नवमी: 19 और 20 अक्टूबर के बीच बँटी हुई

नवमी 19 अक्टूबर को 10:52:04 पर लगती है, ठीक उसी क्षण जब संधि का पहला आधा हिस्सा पूरा होता है, और 20 अक्टूबर को 12:50:40 तक चलती है। सप्तमी ने दो सूर्योदय ले लिए, इसलिए अष्टमी और नवमी एक ही तारीख़ में दब गईं; उत्तर भारत के पंचांग के लिए यही टकराव हमने अष्टमी और नवमी एक ही दिन क्यों में खोला है। बंगाल में नवमी पूजा और होम प्रायः 19 अक्टूबर की दोपहर, संधि के तुरंत बाद होते हैं; 20 अक्टूबर वह दिन है जब नवमी उदय में मिलती है, और जो घर होम को उदया तिथि से जोड़ते हैं वे उसी दिन, दशमी लगने से पहले करेंगे।

दशमी, 20 अक्टूबर: दर्पण विसर्जन, सिंदूर खेला, विसर्जन

दशमी 20 अक्टूबर को 12:50:40 पर लगती है और 21 अक्टूबर को 14:11:35 तक रहती है। विजयादशमी अपराह्न में दशमी की उपस्थिति से तय होती है, यानी दिन के पाँच बराबर हिस्सों में से चौथा। 20 अक्टूबर के सूर्योदय 06:25 और सूर्यास्त 17:45 से अपराह्न लगभग 13:13 से 15:29 बनता है; यह विभाजन इंजन के सूर्योदय-सूर्यास्त से निकाला गया है, पढ़ा नहीं गया। दशमी इस पूरे खंड में चल रही है, इसलिए दिन 20 अक्टूबर ही है। 21 अक्टूबर को भी दशमी 14:11 तक अपराह्न को छूती है, पर नियम पहला दिन लेता है। इस पर मुहूर्त का पूरा ब्योरा विजयादशमी 2026 के लेख में है।

क्रम तय है। पहले बिसर्जन या दर्पण पूजा, जिसमें जल के पात्र पर रखे दर्पण में देवी के प्रतिबिंब की पूजा होती है और प्रतिमा नहीं, प्रतिबिंब विसर्जित किया जाता है। फिर अपराजिता पूजा, फिर सिंदूर खेला और बरण, और उसके बाद ही जल तक की यात्रा। बंगाल इस दिन रावण नहीं जलाता; वह उत्तर का अंत है।

बंगाली पंजिका और उत्तर का पंचांग अलग क्यों पड़ जाते हैं

दोनों परंपराएँ अश्विन शुक्ल पक्ष की एक ही तिथियाँ लेती हैं और उनसे अलग सवाल पूछती हैं। उत्तर पूछता है कि प्रतिपदा पर घटस्थापना कब हो और नौ रातों का व्रत कन्या पूजन तक कैसे चले; वही क्रम हमने शारदीय नवरात्रि 2026 के कैलेंडर में रखा है। बंगाल सिर्फ़ यह पूछता है कि प्रतिमा पूजा के पाँच दिन कहाँ बैठते हैं, और षष्ठी से दशमी को एक ही अखंड कर्म मानता है। बंगाल की अपनी पंजिकाएँ भी आपस में सहमत नहीं: विशुद्धसिद्धांत आधुनिक दृक गणना पर चलती है, गुप्त प्रेस की परंपरा पुराने सिद्धांत मान रखती है, और कुछ वर्षों में दोनों एक ही कर्म के लिए अलग दिन छापती हैं।

समय दिल्ली के हैं, अपने शहर का पंचांग देखिए

सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय देशांतर और अक्षांश से बदलते हैं; तिथि के क्षण नहीं बदलते। अक्टूबर के मध्य में कोलकाता का सूर्योदय दिल्ली से मोटे तौर पर पौन घंटा पहले होता है; यह देशांतर से लगाया अनुमान है, इंजन से पढ़ा हुआ नहीं, और इतना अंतर 17 अक्टूबर जैसे दिन पर उदय की तिथि बदलने के लिए काफ़ी है। तारीख़ तय करने से पहले अपने शहर के आँकड़े दैनिक पंचांग पर देख लीजिए।

दुर्गा पूजा 2026 के जो बिंदु नहीं हिलते, वे तिथि की सीमाओं ने बाँध रखे हैं: 16 अक्टूबर की शाम बोधन, 19 अक्टूबर को 10:28 से 11:16 तक संधि पूजा, और 20 अक्टूबर को दशमी के साथ विसर्जन। इनके बीच का बाकी सब आपकी पंजिका का चुनाव है।

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